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कोरोना और विज्ञापन

डॉ. अनंत श्रीमाली। ये तो अच्‍छा है कि कोरोना खत्‍म हो रहा है। तभी गुलजार साहब ने लिखा कि- ‘बाजार खुल रहे हैं, आओ मुलाकात करेंगे, तुम अपना मोबाइल बंद रखना, हम बात करेंगे।’ अब मास्‍क हटाकर, एक-दूसरे को पहचानकर बात कर रहे हैं। किसी की बड़ी अच्‍छी टिप्‍पणी है कि- आपको तो बस केवल कोरोना हुआ, मेरी तो शादी हो गई। पर वो समय भी था जब कोरोना का रोना था, टीवी और बीवी को ही सुनना था। कई मायनों में टीवी बेहतर था, पर यहां भी बीवी की तरह बेतुकापन ही देखने को मिला। किसान चक्‍का जाम कर रहे थे और टीवी पर विज्ञापन था- आगे बढ़ता इंडिया। कोरोना से हम डरे हुए थे कि एक बीमा कंपनी का विज्ञापन देख-सुनकर ही हम सिर तक चद्दर ओढ़ लेते थे- मान लो तुम मर गए… (अरे कोरोना में तो वैसे ही मरे हुए थे, पहले कितने गुलछर्रे उड़ाते थे) किसानों के साथ होलसेल वार्ताएं होने के बाद भी किसान मर गए। टीवी पर लाख विज्ञापन आ जाए कि मिले सुर मेरा तुम्‍हारा… पर सरकार और किसानों का सुर कभी नहीं मिला।

कोरोना के बाद मरने के प्रति श्रद्धा बढ़ गई और जीने की आस्‍था खत्‍म हो गई। एक विज्ञापन आता था- जो बीवी से करे प्‍यार… कितनी घटिया बात है, प्‍यार वो भी बीवी से? घटियापन का भी स्‍तर होना चाहिए, पर कोरोना ने बीवी का प्‍यार भी छीन लिया। मास्‍क पहनो तो बीवी शक करती थी। विज्ञापन की अगली पंक्ति थी- वो प्रेस्टिज से वैâसे करे इंकार, इंकार करे तो फटकार मिले। दूध-सी सफेदी… जब दूध नकली है तो चमकार भी नकली ही होगी ना… तो सर्फ एक्‍सल है ना, अरे पर पैसा भी तो होना चाहिए ना… एक विज्ञापन था- चल मेरी लूना, कोरोना में तो चल मेरे लोन…वाला मामला ही बना रहा…
…की गोली लो, खिच-खिच दूर करो। कोरोना में तो खिच-खिच हुई कि किच-किच शुरू, लोग वैसे ही खींचने लगते कि कहीं भगवान हमारी सांस न खींच ले। कोरोना के स्‍वर्णिम काल में इस विज्ञापन ने खूब चिढ़ाया कि… मलिए, काम पर चलिए। काम ही नहीं था सिवाय घर में झाड़ू लगाने और बर्तन धोने के। अब ब्रि‍टानिया वालों को क्‍या मालूम कि स्‍वस्‍थ खाओ-तन मन जगाओ… पहले खाने को तो मिले, तन-मन तो अपने आप जग जाएगा। ‘पहलवान जैसी ताकत’ तो खाने के बाद ही आ सकती है। अब ये दिल मांगे मोर… कुछ ‘खानों’ के कारण दिल तरस गया मोर देखने को।
विज्ञापन ने अद्भुत काम किए। मियां मुंह में पान दबाए थे, गलती से आय लव यू रचना बोल गए। पत्‍नी ने पंजाब चुनाव रिजल्‍ट की तरह धो दिया। पता चला रचना पड़ोसन का नाम है। विज्ञापन एजेंसी में कार्यरत दामाद से ससुर ने सस्‍वर पूछा- बेटी नेन्‍सी वैâसी है? तो जवाब मिला- जैसी है, वैसी ही है और गुस्‍से में बुदबुदाया- ऐसी की तैसी। ससुर ने पूछा- तुम्‍हारे यहां चक्रवात वैâसा है? तो दामाद बोला- अभी खाना बना रही है, थोड़ी देर में बात कराता हूं। मतलब कोरोना में आदमी पगला-सा गया। अब ये विज्ञापन किसान आंदोलन के परिप्रेक्ष्‍य में था या सरकार के संदर्भ में… समझ नहीं आया-धोया, निचोड़ा और हो गया…
नई पीढ़ी पर विज्ञापनों का ऐसा पाला-ओला पड़ा कि वे कोका कोला या कूल-कूल का पर्यायवाची शब्‍द ठंडा ढूंढते हैं। हमारे कुल दीपक सिरे से हिंदी और हिंदी शब्‍दकोश को खारिज करने में लगे पड़े हैं। इंदौर की एक कंपनी का दिव्‍य गरम मसाले की टैग लाइन थी- सास-बहू का झगड़ा मिटानेवाला… अब गरम मिजाज की सिरफिरी सास को मसाला वैâसे ठंडा कर सकता है? मन है कि उस पर ठंडा कोला डाल दें, काम न बने तो डंडा ही चला दें। विज्ञापनों ने ठंडे की तासीर बदल दी, अब ठंडा तूफानी और ताजगी सनसनाती होने लगी है। हिंदी का छात्र पहले से हिंदी विषय को लेकर कन्‍फ्यूज है… पर भाई लोगों, निवेदन है कि होली पर मुंह और मास्‍क का फेविकॉल जैसा जोड़ बनाए रखें क्‍योंकि कोरोना ने पूरी दुनिया मुट्ठी में कर रखी है, अब किसी लहर की जरूरत नहीं है, होली पर लहराने की जरूरत है। व्‍यंग्‍यकार माणिक वर्मा की पंक्ति है- उनके पास था कीचड़, मेरे पास था गुलाल। जिसके पास जो था, उसने दिया उछाल… इस होली पर हंसी और गुलाल ही उछालें…
(लेखक सुप्रसिद्ध व्‍यंग्‍यकार, मंच संचालक और स्‍तंभकार हैं)

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