मुख्यपृष्ठनए समाचारकोरोना हुआ है तो सावधान! ...४० के पार बढ़ा खतरा

कोरोना हुआ है तो सावधान! …४० के पार बढ़ा खतरा

• नए वैरिएंट ने भी डराया
सामना संवाददाता / मुंबई
हिंदुस्थान में कोरोना महामारी आने के बाद से हार्ट अटैक के मामले बढ़े हैं। कई युवाओं ने हार्ट अटैक से जिम में कसरत करते अथवा बारात में नाचते गाते दम तोड़ा है। आईसीएमआर के अध्ययन में चौंकानेवाली जानकारी सामने आई है। इसमें बताया गया है कि महामारी में दिल कमजोर हुआ है। इतना ही नहीं कोरोना की पहली और दूसरी लहर के दौरान जिन लोगों में कोरोना वायरस संक्रमण का गंभीर प्रभाव हुआ था और उन्हें १४ या उससे ज्यादा दिन अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा था, उनमें से ६.५ फीसदी लोग एक साल के भीतर यमलोक पहुंच गए यानी उनकी मौत हो गई।
बता दें कि नेशनल क्लिनिकल रजिस्ट्री फॉर कोविड-१९ के शोधकर्ताओं ने एक शोध की है। शोधकर्ताओं ने देश के विभिन्न क्षेत्रों में स्थित ३१ अस्पतालों में गंभीर रूप से भर्ती रहे लेकिन बाद में स्वस्थ हुए मरीजों की एक साल तक निगरानी की। इस दौरान कुल १४,४१९ मरीजों से हर तीन-तीन महीने में संपर्क किया गया। इस अध्ययन में पाया गया कि एक साल में ६.५ फीसदी यानी ९५२ मरीजों की मौत हो गई। इसी अध्ययन में यह भी कहा गया है कि १७.१ फीसदी लोगों में कोविड बाद के दुष्प्रभाव ४-८ सप्ताह के भीतर प्रकट होने लगे थे। हालांकि, इनमें से ७३.३ फीसदी लोग ऐसे थे, जो कम से कम एक या एक से अधिक बीमारियों से ग्रस्त थे। १८ से ४५ साल के १४ हजार ४१९ लोगों के डाटा की स्टडी की गई। ये मरीज देश के अलग-अलग ३१ अस्पतालों में भर्ती हुए थे।
नए वैरिएंट पर निगरानी
देश में पिछले कुछ हफ्तों से कोरोना के मामले फिर से बढ़ने लगे हैं। नए वैरिएंट बीए.२.८६ ने अमेरिका समेत दुनिया के कई देशों में मिल रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोविड के इस वैरिएंट पर निगरानी रखने की बात कही है। पीएम नरेंद्र मोदी के प्रधान सचिव पीके मिश्रा ने हाल ही में एक उच्च स्तरीय बैठक की, जिसमें कोरोना पर वैश्विक और देश की स्थिति पर चर्चा की गई। बैठक में कोरोना के नए वैरिएंट बीए.२.८६ (पिरोला) और ईजी.५ (इरिस) पर चर्चा हुई।

एक हजार पर हो रही हैं ६५ मौतें
विशेषज्ञों के मुताबिक, आमतौर पर एक हजार लोगों में सामान्यत: ७-८ मौतें होती हैं, लेकिन इस अध्ययन के अनुसार, ६५ मौतें हो रही हैं। यह स्पष्ट दर्शाता है कि यह कोरोना का दीर्घावधि प्रभाव है। दूसरे देशों में हुए अध्ययन भी कोरोना के दीर्घावधि दुष्प्रभावों की पुष्टि करते हैं। इस विषष पर और आगे बड़े अध्ययनों की जरूरत है।

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