मुख्यपृष्ठनए समाचारअपराध या अधिकार? ... शादी का मतलब केवल सेक्स नहीं!

अपराध या अधिकार? … शादी का मतलब केवल सेक्स नहीं!

  • उमा सिंह

 शादी एक ऐसा पवित्र बंधन है, जो प्रेम रूपी धागे से दो दिलों को बांधकर रखता है। इस रिश्ते को जिंदा रखने के लिए प्रेम भले ही कम हो जाए, परंतु विश्वास और एक-दूसरे के प्रति आदर सौ फीसदी होना चाहिए। इसके साथ ही हर काम में दोनों की सहमति और आपसी तालमेल भी बेहद जरूरी है, फिर चाहे वो शारीरिक संबंध बनाने का ही मुद्दा क्यों न हो? शादी का मतलब महज शारीरिक संबंध बनाना हर्गिज नहीं होता। समय-समय पर वैवाहिक बलात्कार का मुद्दा उपस्थित होता रहा है। जब कभी वैवाहिक बलात्कार की बात हमारे सामने आती है, तो यह सवाल जेहन में उभरना स्वाभाविक है कि एक व्यक्ति भला अपनी ही पत्नी का बलात्कार वैâसे कर सकता है? यह तो पति का अधिकार है। लेकिन ऐसे कई उदाहरण सामने आ चुके हैं, जहां पत्नियों द्वारा अपने पति पर बलात्कार का आरोप लगाया जा चुका है। साधारण शब्दों में कहें तो बिना पत्नी की सहमति के बनाए गए यौन संबंध को वैवाहिक बलात्कार कहा जा सकता है। जाहिर-सी बात है किसी के साथ जोर-जबरदस्ती से किया गया काम `अपराध’ की श्रेणी में ही आता है। अत: ऐसे में निश्चित तौर पर वैवाहिक बलात्कार एक अपराध है। हालांकि, यह एक ऐसा विषय है, जिसमें हर एक के अपने-अपने विचार हो सकते हैं। कोई इसे अपराध मानता है तो कई लोग इसे अधिकार भी मानते हैं। वैसे भी पुरुष प्रधान समाज में पुरुषों की यह धारणा होती है कि पत्नी के साथ शारीरिक संंबंध बनाने के लिए पत्नी की सहमति जरूरी नहीं है। हालांकि, कागजी दस्तावेजों में आज भले ही कहा जाता हो कि महिला और पुरुष दोनों समान हैं लेकिन जमीनी हकीकत इससे विपरीत है। अगर वाकई महिला-पुरुषों में एक समानतावाली बात होती तो शायद वैवाहिक बलात्कार जैसा कोई मुद्दा ही उपस्थित न होता। वैसे बता दें कि मैरिटल रेप को अपराध के दायरे में लाने का मसला अभी भी सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग है। लेकिन सितंबर २०२२ में सुप्रीम कोर्ट के एक पैâसले के मुताबिक मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट के तहत ही रेप में मैरिटल रेप शामिल होगा। अदालत ने यह साफ कहा कि रेप की परिभाषा में मैरिटल रेप भी शामिल होना चाहिए। देश में यह एक ऐसा ज्वलंत मुद्दा है, जिस पर लंबे समय से बहस चल रही है। मगर कोई सही समाधान नहीं निकल पाया है। अब सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से एक नई राह दिखी है। अत: ऐसे में यह परिस्थिति बदलनी चाहिए। महिलाओं के लिए एक उम्मीद की किरण निकलनी चाहिए तभी बद से बदलाव की ओर बढ़ेगी नारी की जिंदगी।

(उपरोक्त आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। अखबार इससे सहमत हो यह जरूरी नहीं है।)

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