मुख्यपृष्ठअपराधहिरासत में बलात्कार... न्याय पाने में एक प्रणालीगत बाधा!

हिरासत में बलात्कार… न्याय पाने में एक प्रणालीगत बाधा!

जब एक महिला कानूनी हिरासत में हो और उसके साथ बलात्कार की घटना हो, वह भी किसी पुलिस अधिकारी, जेलर या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किया गया हो, ऐसे मामलों से देश में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सवाल तो उठते ही हैं। इसके साथ ही जिन्हें हम रक्षक कहते हैं, वही भक्षक बन जाते हैं। ऐसे भक्षकों पर भी कार्रवाई की धीमी रफ्तार भी सवालों के घेरे में है। हिरासत में बलात्कार की रिपोर्ट किए गए मामले अक्सर शक्ति असंतुलन और हमारे कानून प्रवर्तन प्रणालियों के भीतर जवाबदेही की कमी के कारण होता हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार, २०१७ से २०२२ तक हिरासत में बलात्कार के २७० से अधिक मामले दर्ज किए गए। महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने ऐसे मामलों के लिए कानून प्रवर्तन प्रणालियों के भीतर संवेदनशीलता और जवाबदेही की कमी को जिम्मेदार ठहराया है। २०१७ के बाद से हिरासत में बलात्कार के दर्ज किए गए २७५ मामलों में से उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक ९२ मामले हैं, इसके बाद ४३ मामले मध्य प्रदेश में दर्ज किए गए थे। पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया की कार्यकारी निदेशक पूनम मुतरेजा ने कहा, ‘हिरासत की स्थिति में दुर्व्यवहार के लिए अद्वितीय अवसर प्रदान करती हैं, राज्य एजेंट अक्सर अपनी शक्ति का उपयोग यौन उत्पीड़न के लिए मजबूर करने के लिए करते हैं।
एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार, अपराधियों में पुलिसकर्मी, लोक सेवक, सशस्त्र बलों के सदस्य और जेलों, रिमांड होम, हिरासत के स्थानों और अस्पतालों के कर्मचारी तक शामिल हैं। वैसे तो हिरासत में बलात्कार के मामले भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा ३७६ (२) के तहत दर्ज किए जाते हैं। यह एक पुलिस अधिकारी, जेलर या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किए गए बलात्कार के अपराध से संबंधित है, जिसके पास एक महिला की कानूनी हिरासत है। यह धारा विशेष रूप से उन मामलों से संबंधित है, जहां अपराधी किसी महिला के खिलाफ बलात्कार का अपराध करने के लिए अपने अधिकार या हिरासत की स्थिति का लाभ उठाता है।
महिला नेतृत्व संगठन ने ‘सामूहिक बचाव अभियान’ में अपने काम के अनुभवों को दर्शाते हुए पल्लबी घोष ने पुलिस अधिकारियों पर बलात्कार का आरोप लगाने वाली महिलाओं के परेशान करने वाले विवरण साझा किए. घोष ने इस बात पर प्रकाश डाला कि कानून प्रवर्तन के भीतर दंड से मुक्ति और पीड़ित को दोष देने की व्यापक संस्कृति ऐसी महिलाओं को न्याय मांगने से रोक रही है। उन्होंने कहा कि थानों में हिरासत में बलात्कार एक बहुत ही आम परिदृश्य है। जिस तरह से जूनियर पुलिस अधिकारी, यहां तक कि महिला कॉन्स्टेबल ऐसी महिलाओं से बात करते हैं, उससे पता चलता है कि उनके मन में उनके लिए कोई सहानुभूति नहीं है। घोष ने हिरासत में हिंसा के लिए शिकायत दर्ज करने में होने वाली कठिनाई पर निराशा व्यक्त की, जब तक कि सर्वाइवर अपराधियों का नाम नहीं लेतीं. उन्होंने न्याय पाने में एक प्रणालीगत बाधा को उजागर किया। उन्होंने कहा, ‘अगर आप किसी पुलिस अधिकारी को हिरासत में बलात्कार के लिए दोषी ठहराते हैं, तब ही हम न्याय की उम्मीद कर सकते हैं।
सामाजिक संगठन की सदस्य पूनम ने हिरासत में बलात्कार के मूल कारणों और परिणामों को प्रभावी ढंग से संबोधित करने के लिए पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण, मजबूत कानूनी ढांचे और संस्थागत सुधारों की तत्काल आवश्यकता पर जोर दिया। ऐसे उदाहरण हैं जहां महिलाओं को उनकी सुरक्षा के लिए या उनकी कमजोर स्थिति के कारण हिरासत में लिया गया, जैसे कि तस्करी या घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं को यौन हिंसा का शिकार बनाया गया, जो राज्य संरक्षण की आड़ में शक्ति के दुरुपयोग को दर्शाता है। इस बात पर प्रकाश डाला कि हिरासत में बलात्कार में योगदान देनेवाले कारकों की एक जटिल परस्पर क्रिया है।

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