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महंगी हुई ‘दाल रोटी’ कैसे गाएं प्रभु के ‘गुण’! ३० फीसदी महंगी हुई अरहर की दाल

सामना संवाददाता / मुंबई
बढ़ती महंगाई के कारण इन दिनों ‘दाल रोटी खाना और प्रभु के गुण गाना’ दूभर होता जा रहा है। किसी समय में गरीबों की थाली की दाल अब धीरे-धीरे बढ़ती कीमतों के साथ सिमटती जा रही है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, एक साल में दाल, चावल और आटा ३०ज्ञ् महंगे हो गए हैं। संसद में एक सवाल के जवाब में उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने बताया है कि आलू को छोड़कर ज्यादातर खाने की चीजें महंगी हुई हैं। चावल, चीनी, दूध, मूंगफली तेल, आटा और टमाटर के बाद सबसे बड़ी भूमिका अरहर दाल की है। ३१ जुलाई तक १ साल में यह ३०ज्ञ् महंगी हो गई है।
फिलहाल, थोक बाजार में तुअर दाल यानी अरहर दाल की कीमत १६० रुपए प्रति किलोग्राम से अधिक हो गई है, जिसका और बढ़ते जाना तय माना जा रहा है। इसी तरह उड़द, मसूर, मूंग और अन्य दालें थोक बाजार में लगभग १०० रुपए प्रति किलोग्राम या उससे ज्यादा दाम पर बिक रही हैं।
कृषि उत्पादन बाजार समिति (एपीएमसी) के अनाज बाजार के व्यापारियों का मानना है कि इस साल के अंत तक दाल की बढ़ती कीमतों से राहत मिलने की संभावना नहीं है।
ग्रेन, राइस एंड ऑयल सीड्स मर्चेंट्स एसोसिएशन (ग्रोमा) के सचिव भीमजी भानुशाली बढ़ती कीमत की वजह मानसून में देरी को भी मानते हैं। भानुशाली कहते हैं, ‘समस्या की असली वजह है मांग और आपूर्ति के बीच असंतुलन। अफ्रीकी देशों से दाल एक्सपोर्ट की लिमिटेशन ने हालात को और खराब कर दिया है।’
दरअसल, दलहन और दालों की मांग को पूरा करने के लिए भारत काफी हद तक आयात पर निर्भर है, इनमें से लगभग ४० फीसदी आयात मुख्य रूप से एक अफ्रीकी देश मोजाम्बिक से किया जाता है। सूत्र बताते हैं कि पूर्वी अफ्रीक में एक महत्वपूर्ण तुअर उत्पादक मोजाम्बिक ने भारत में दाल की कमी का फायदा उठाते हुए निर्यात पर न्यूनतम मूल्य लागू कर दिया है। इसके अलावा कई वजहों के चलते भारत के साथ निर्यात सौदे रद्द हो गए हैं।
फिलहाल, मुंबई एपीएमसी थोक बाजार में तुअर दाल, मूंग दाल, चना दाल और उड़द की कीमतें ९० से १६० रुपए प्रति किलोग्राम तक हैं। हालांकि, खुदरा स्तर पर तुअर दाल और उड़द दाल की कीमतें पहले ही २०० रुपए प्रति किलोग्राम से अधिक हो चुकी है और आनेवाले दिनों में तुअर दाल की थोक कीमत २०० रुपए प्रति किलोग्राम तक पहुंचने की संभावना है, जबकि खुदरा कीमतें २५० रुपए से अधिक हो सकती है।
मसूर की खेती की बात करें तो महाराष्ट्र में मराठवाड़ा और विदर्भ में बड़े पैमाने पर इसकी पैदावार होती है। साथ ही मसूर को राजस्थान और मध्य प्रदेश से भी मंगाया जाता है। हालांकि, इस साल मानसून के चलते धान की फसल पर प्रतिकूल असर पड़ा है, जिससे बाजार में नई दलहन फसल के आने में देरी हुई, जो अब केवल दिसंबर में आने की उम्मीद है।

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