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नहीं चलेगी ‘तारीख पे तारीख!’… ४५ दिनों के भीतर लेना होगा फैसला, शिकायत के तीन दिनों के भीतर अपराध दर्ज करना अनिवार्य

सामना संवाददाता / नई दिल्‍ली
हिंदुस्थान की अदालतों में मुकदमे काफी लंबे चलते हैं। यही वजह है कि यहां कोर्ट की कार्रवाई के लिए आम बोलचाल की भाषा में ‘तारीख पर तारीख’ का काफी इस्तेमाल किया जाता है। पर अब ऐसा नहीं चलेगा। कल राज्यसभा में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने तीन आपराधिक कानूनों के स्थानों पर लाए गए विधेयकों की मंशा बताई। बिलों पर सदन में हुई चर्चा का जवाब देते हुए शाह ने कहा कि इनका उद्देश्य पुराने कानूनों की तरह दंड देने का नहीं, बल्कि न्याय मुहैया कराने का है। उन्होंने कहा कि नए आपराधिक कानूनों के लागू होने से ‘तारीख पे तारीख’ युग का अंत सुनिश्चित होगा और तीन साल में न्याय मिलेगा।
बता दें कि पुराने आपराधिक कानूनों की जगह लेने वाले इन तीन बिलों में भारतीय न्याय (द्वितीय) संहिता २०२३, भारतीय नागरिक सुरक्षा (द्वितीय)
संहिता २०२३ और भारतीय साक्ष्य (द्वितीय) विधेयक २०२३ शामिल हैं। राज्यसभा ने कल आईपीसी, सीआरपीसी और साक्ष्य अधिनियम की जगह तीन आपराधिक विधेयक पारित किए। इसके पहले लोकसभा इन बि‍लों पर मुहर लगा चुका है।
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने गुरुवार को कहा कि तीन आपराधिक कानूनों के स्थानों पर लाए गए विधेयकों के संसद से पारित होने के बाद हिंदुस्थान के आपराधिक न्याय प्रक्रिया में नई शुरुआत होगी। यह पूरी तरह भारतीय होगी। भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) विधेयक, २०२३, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) विधेयक, २०२३ और भारतीय साक्ष्य (बीएस) विधेयक, २०२३ पर राज्यसभा में हुई चर्चा का जवाब देते हुए शाह ने यह भी कहा कि इन विधेयकों का उद्देश्य पिछले कानूनों की तरह दंड देने का नहीं बल्कि न्याय मुहैया कराने का है। शाह बोले, ‘इस नए कानून को ध्यान से पढ़ने पर पता चलेगा कि इसमें न्याय के भारतीय दर्शन को स्थान दिया गया है। हमारे संविधान निर्माताओं ने भी राजनीतिक न्याय, आर्थिक न्याय और सामाजिक न्याय को बरकरार रखने की गारंटी दी है। संविधान की यह गारंटी १४० करोड़ के देश को ये तीनों विधेयक देते हैं।’ उन्होंने कहा, ‘इन कानूनों की आत्मा भारतीय है। पहली बार भारत द्वारा, भारत के लिए और भारतीय संसद से बनाए गए कानून से हमारी आपराधिक न्याय प्रक्रिया चलेगी। इसका मुझे बहुत गौरव है।’ शाह के अनुसार, इन कानूनों की आत्मा भी भारतीय है, सोच भी भारतीय है और ये पूरी तरह से भारतीय हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम… इन तीनों कानूनों को १८५७ के स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेजों के शासन की रक्षा के लिए बनाया गया था। इनका उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ अंग्रेजों के शासन की सुरक्षा करना था। इसमें कहीं भारत के नागरिक की सुरक्षा, उसके सम्मान और मानव अधिकार की सुरक्षा नहीं थी।

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