मुख्यपृष्ठटॉप समाचारदबाव में दिल्ली दरबार! ... सुप्रीम कोर्ट की सख्ती बढ़ी

दबाव में दिल्ली दरबार! … सुप्रीम कोर्ट की सख्ती बढ़ी

•  राहुल को राहत
• सिसोदिया पर सवाल
• मणिपुर के लिए मंथन
• चीतों पर चिंता
• ईडी पर इशारा
• भेदभाव पर भड़ास
सामना संवाददाता / नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट की हालिया सख्ती के बाद ‘दिल्ली दरबार’ दबाव में है। दिल्ली दरबार यानी केंद्र की मोदी सरकार। असल में मोदी सरकार देशभर में अपनी मनमानी चला रही है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की कुछ हालिया टिप्पणियां और पैâसलों ने ‘दिल्ली दरबार’ को ब्ग्ैकफुट पर ला दिया है। मोदी सरकार ने गुजरात की एक अदालत द्वारा मानहानि के मामले में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के सदन में बोलने पर जो पाबंदी लगाई थी, कल सुप्रीम कोर्ट ने उसे खोलने के साथ ही उस फैसले पर रोक लगा दी।
बता दें कि कल सुप्रीम कोर्ट ने मनीष सिसोदिया मामले में भी केंद्र पर दबाव बनाते हुए ईडी से सवाल किया कि वह पैसों के लेन-देन से जुड़े सभी पहलुओं पर अपनी स्थिति स्पष्ट करे। इसके दो दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर दंगे के मसले पर मंथन करते हुए केंद्र व मणिपुर की भाजपा सरकार को जोरदार लताड़ लगाते हुए कहा था कि अगर आप कार्रवाई नहीं करेंगे तो हमें एक्शन लेना पड़ेगा। इसके साथ ही कूनो में नामीबिया से लाए गए चीतों की मौत का भी मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है, जहां सुनवाई के दौरान इस बात का खुलासा हुआ कि केंद्र ने कूनो में चीतों की देखभाल के लिए जो चिकित्सक रखे हैं, वे अनुभवहीन हैं। इस पर कोर्ट ने चिंता प्रकट की थी। गत सप्ताह ईडी प्रमुख संजय मिश्रा के सेवा विस्तार के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के खिलाफ कड़ी टिप्पणी करते हुए इशारा दे दिया था कि यह सब नहीं चलनेवाला।
इसके साथ ही कोर्ट ने उनका कार्यकाल १५ सितंबर तक तय कर दिया था। इसके अलावा हाल ही में नागालैंड में महिलाओं के आरक्षण का मामला भी सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार पर भेदभाव का आरोप लगाते हुए कहा कि आप अपनी ही पार्टी की राज्य सरकारों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं करते? आप उन अन्य राज्य सरकारों के खिलाफ अतिवादी रुख अपनाते हैं, जो आपके प्रति उत्तरदायी नहीं।
राहुल गांधी मामले में कोर्ट की सख्त टिप्पणी
‘उन्हें अधिकतम सजा देने का कारण ट्रायल कोर्ट ने स्पष्ट नहीं किया है…अधिकतम सजा और जुर्माना लगाया गया, जो उन्हें सार्वजनिक जीवन में भागीदारी से रोकता है और उन्हें चुनने वाले मतदाताओं के भी खिलाफ है’
(पेज ६ भी देखें)

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