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सरोगेसी पर सख्त दिल्ली हाई कोर्ट भारत में सरोगेसी उद्योग को नहीं दिया जाना चाहिए बढ़ावा

सामना संवाददाता / नई दिल्ली

सरोगेसी से जुड़ी एक याचिका पर बुधवार को दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि भारत में सरोगेसी उद्योग को प्रोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि अगर इसे अनियंत्रित छोड़ दिया गया तो यह अरबों रुपए के व्यवसाय में विकसित हो सकता है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश मनमोहन और न्यायमूर्ति मिनी पुष्करणा की पीठ ने कहा कि सरोगेसी नियमों में बदलाव अदालतों के कहने पर हुआ है।
पीठ ने कहा कि अदालत को अब इस सब में क्यों पड़ना चाहिए? इस उद्योग (सरोगेसी) को यहां प्रोत्साहित करने की जरूरत नहीं है। आप कनाडा के रहने वाले हैं, आप यहां उद्योग नहीं चला सकते। यह अरबों रुपए का उद्योग बन जाएगा। यह ऐसा मामला नहीं है, जहां हमें सरकार से कुछ भी करने के लिए कहना चाहिए। अदालत ने उक्त टिप्पणी कनाडा में रहनेवाले एक भारतीय मूल के जोड़े की याचिका पर सुनवाई करते हुए की।
याचिकाकर्ताओं ने सरोगेसी नियम-२०२२ के नियम-सात के तहत फार्म-दो में बदलाव करके दाता सरोगेसी पर प्रतिबंध लगाने के लिए सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम में संशोधन करने के लिए केंद्र द्वारा जारी १४ मार्च की अधिसूचना को चुनौती दी गई थी। उक्त टिप्पणी के साथ अदालत ने मामले की सुनवाई अन्य याचिकाओं के साथ १५ जनवरी तक के लिए स्थगित कर दी। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि वे भारतीय नागरिक हैं और उन्होंने हिंदू रीति-रिवाजों और समारोहों के अनुसार कानूनी रूप से शादी की है और भारत के स्थायी निवासी हैं। उन्होंने कहा कि वे नि:संतान दंपत्ति हैं और चिकित्सीय कारणों से सरोगेसी की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि दंपति को दिसंबर २०२२ में डोनर के साथ सरोगेसी के लिए चिकित्सा संकेत का प्रमाण पत्र दिया गया था। इसमें कहा गया था कि वे बांझपन के उन्नत उपचार के रूप में सरोगेसी प्रक्रिया से गुजर सकते हैं। हालांकि, १४ मार्च २०२३ को केंद्र ने सरोगेसी नियमों में संशोधन करते हुए एक अधिसूचना जारी की और डोनर सरोगेसी पर प्रतिबंध लगा दिया।

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