मुख्यपृष्ठस्तंभजीवन को लीलता अवसाद!

जीवन को लीलता अवसाद!

  • राजेश माहेश्वरी

विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्लूएचओ की रिपोर्ट के अनुसार हर वर्ष विश्व भर में आठ लाख लोग आत्महत्या करते हैं और जिनमें से सिर्फ हिंदुस्थान के इक्कीस फीसदी लोग होते हैं। इसमें १५ से २९ वर्ष के युवा अधिक होते हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि अपने सपनों की पोटली लेकर निकले युवा विकास, पैसा, पद, प्रतिष्ठा की चाह में हताश होकर खुद को सबसे अलग करते हैं और फिर जिंदगी की जंग में बहुत कम उम्र में ही हार मान लेते हैं। वे नहीं समझ पाते हैं कि पैसा, पद, प्रतिष्ठा जरूरी है लेकिन जिंदगी हर हाल में इससे भी ज्यादा जरूरी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर में प्रतिवर्ष लगभग ८,००,००० लोग आत्महत्या करते हैं, यानी प्रति ४० सेकेंड में एक व्यक्ति खुद की जान ले लेता है। आत्महत्या करनेवाली महिलाओं के मुकाबले पुरुषों की संख्या ज्यादा होती है। मानसिक बीमारी और अवसाद आत्महत्या का एक प्रमुख कारण है लेकिन इसके इलाज के लिए न तो कोई कारगर व्यवस्था है और न ही कोई सहानुभूति भाव है। आत्महत्या की अगर हम मेडिकल वजह देखें तो वह है डिप्रेशन यानी विषाद। सबसे ज्यादा आत्महत्या के मामले इसी वजह से आते हैं क्योंकि गहरी निराशा आदमी को शक्तिहीन बना देती है, जिससे वह मौत का रास्ता अख्तियार कर लेता है। आत्महत्या दो तरह की होती है- आवेग में आकर आत्महत्या करना (इम्पल्सिव सुसाइड) और दूसरा है गहरे अवसाद में आकर आत्महत्या करना (डिप्रेसिव सुसाइड)।
मनोचिकित्सकों के अनुसार गहरी निराशा की चरम अवस्था ही आत्महत्या के लिए प्रेरित करती है। गहरी निराशा से होपलेसनेस जैसी स्थिति जन्म लेती है। मतलब व्यक्ति यह सोचने लगता है कि अब तो मेरा कुछ हो ही नहीं सकता, इसलिए मर जाना ही बेहतर है। हालांकि अक्सर लोग यह भी सोचते हैं कि परेशानियां हैं, ठीक हो जाएंगी। डिप्रेशन है, तो यह भी अपने आप ठीक हो जाएगा। लेकिन ऐसा होता बहुत कम है कि कोई बीमारी अपने आप ठीक हो जाए। प्रतिस्पर्धा के इस दौर में छात्रों में बढ़ता मानसिक तनाव युवाओं की जिंदगी छीन रहा है, जिसे समय रहते रोकने की आवश्यकता है। आज समय के साथ बहुत कुछ बदल गया है लेकिन जरूरी यह है कि हमारे देश का भविष्य जिस पर टिका है यदि वे ही इस बदलते समय में खुद को समय के अनुरूप ढाल न पाएं तो यह देश के लिए चिंता की बात है। आंकड़े बताते हैं कि खुदकुशी करनेवाले छात्रों में करियर में नाकामी सबसे बड़ी वजह है। कोरोना महामारी के दौर में नौकरियां छिन जाने, अपने करीबियों को खोने और अकेलेपन ने लोगों को चिंतित, उदास, एकाकी और अति संवेदनशील बना दिया है, जिसके कारण भी कुछ लोग जीवन में आई मुसीबतों का मुकाबला करने की बजाय आत्महत्या की तरफ कदम उठा रहे हैं। देश में पिछले पांच-छह वर्षों में आत्महत्या की दर बढ़ने के कारणों को लेकर कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि लोग ज्यादा से ज्यादा आत्मकेंद्रित होते जा रहे हैं। उनके प्रत्यक्ष मित्र कम और सोशल मीडिया पर मित्र अधिक हैं।
हमारे संविधान में आत्महत्या करनेवालों पर भी सख्त कानून रहा। समाज में भी आत्महत्या को कायरता, कमजोरी, हिम्मत और साहस न होने जैसी बात के तौर पर देखा जाता है। जबकि वास्तव में यह अपनी जिंदगी से हताश, निराश हुए व्यक्ति द्वारा उठाया गया कदम होता है। वर्ष २०१८ में पारित हुए ‘मेंटल हेल्थकेयर एक्ट २०१७’ के तहत भारत में आत्महत्या के अपराधीकरण का कानून खत्म कर दिया गया है और मानसिक बीमारियों से जूझ रहे लोगों को मुफ्त मदद का प्रावधान किया गया है। आज देश के कई जिलों में मेंटल हेल्थ प्रोग्राम को लागू किया गया है, जहां पर आत्महत्या रोकथाम सेवा, कार्यस्थल पर स्ट्रेस मैनेजमेंट के साथ लाइफ स्किल ट्रेनिंग की सुविधाएं उपलब्ध हैं, जरूरी है इसका विस्तार देशभर में हो। हमारे देश में आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है लेकिन पूरे देश में सिर्फ ४४ सुसाइड हेल्प सेंटर हैं। इनमें भी सिर्फ नौ सेंटर ऐसे हैं जो २४ घंटे खुले रहते हैं। इतना ही नहीं, कोई एक ऐसा नंबर भी नहीं है, जो इन हेल्प सेंटरों को आपस में जोड़ सके। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि मानसिक विकारों से ग्रस्त लोगों की संख्या और आत्महत्या करनेवालों की संख्या में इजाफा होने के बावजूद हमारे पास इससे निपटने व इसकी संख्या में कमी लाने के कारगर उपाय मौजूद नहीं हैं।
(लेखक उत्तर प्रदेश राज्य मुख्यालय पर मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

अन्य समाचार