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हिमाचल की हलचल : कांग्रेस को स्थानीय भाजपाइयों की नाराजगी और `आप’ के सपोर्ट का मिलेगा फायदा!

मनमोहन सिंह

हिमाचल प्रदेश के चार लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस को अरविंद केजरीवाल की पार्टी आम आदमी पार्टी का सपोर्ट मिल रहा है। खबर यह भी है कि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी भी लोकसभा चुनाव से दूर रहने का मन बना रही है। `आप’ के प्रदेशाध्यक्ष सुरजीत ठाकुर के मुताबिक, पार्टी ने निर्णय लिया है कि हिमाचल प्रदेश में लोकसभा की चारों सीटों पर कांग्रेस प्रत्याशियों का समर्थन किया जाएगा। प्रदेश में चार लोकसभा सीटों पर `आप’ चुनाव नहीं लड़ेगी। न ही विधानसभा के उपचुनाव में प्रत्याशी मैदान में उतारेगी।
दूसरी तरफ देश के लोकतंत्र को बचाने के लिए मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने भी संकेत दिया है कि वह भी भाजपा के खिलाफ लामबंदी के लिए अपना सहयोग देगी। पार्टी के हिमाचल राज्य सचिवालय सदस्य राकेश सिंघा ने कहा, `ऐसा हो सकता है कि देश के लोकतांत्रिक ताने-बाने के लिए घातक राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को रोकने के लिए माकपा चुनाव न लड़े। लेकिन इस बारे में दो दिनों के भीतर स्थिति स्पष्ट हो जाएगी।’
गौरतलब है कि माकपा पिछले चार बार से लोकसभा चुनाव लड़ती रही है। मंडी लोकसभा सीट पर पिछले दो बार चुनाव माकपा लड़ चुकी है। इससे पहले शिमला सीट पर भी चुनाव लड़ा गया था और माकपा का लोकसभा चुनाव में बीस हजार तक मत प्राप्त करने का रिकॉर्ड रहा है। दूसरी ओर पिछले विधानसभा चुनाव में `आप’ ने ५७ सीटों पर चुनाव लड़ा था और ४४ हजार से अधिक मत प्राप्त किए थे। हां, इस बीच मायावती की बहुजन समाज पार्टी ने भी हिमाचल प्रदेश की सभी चार लोकसभा सीटों के लिए अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर कांग्रेस के गणित को बिगाड़ने की कोशिश जरूर की है। बसपा का दावा है कि उनकी पार्टी भाजपा और कांग्रेस दोनों के `अनुसूचित जाति विरोधी रुख’ को उजागर करेगी साथ ही गरीबों, अनुसूचित जाति और जनजातियों को न्याय दिलाने के मुद्दे पर चुनाव लड़ेगी। लेकिन राजनीति के जानकारों का मानना है कि वैसे भी हिमाचल में कांग्रेस की स्थिति भाजपा से काफी बेहतर है और ऐसे में यदि उसे इस तरह का सपोर्ट मिलता है तो कांग्रेस की स्थिति और मजबूत होगी। जहां तक बसपा के मैदान में उतरने की बात है, उसका असर भी भारतीय जनता पार्टी पर ही पड़ेगा। वैसे भी बसपा हिमाचल प्रदेश के ६ विधानसभा उपचुनाव में अपने वैंâडिडेट नहीं उतार रही है, जहां पर मुख्य संघर्ष भाजपा और कांग्रेस के बीच है।
अब बात करते हैं विधानसभा उपचुनाव की। जहां तक नाराजगी की बात है, लोकसभा के मंडी सीट से कंगना रनौत को लेकर भाजपाइयों की नाराजगी देखी जा सकती है, वहीं विधानसभा उपचुनाव में भाजपा के उम्मीदवारों को लेकर नाराजगी है। हालांकि, भाजपा इसे विपक्ष की तरफ से छोड़ा गया शिगूफा कह रही है। दरअसल, इसकी भी एक वजह है। हिमाचल प्रदेश में फरवरी महीने के अंत में शुरू हुए राजनीतिक घटनाक्रम के बाद भाजपा ने विधानसभा उपचुनाव के लिए जल्दबाजी में कांग्रेस के पूर्व विधायकों को अपना उम्मीदवार तो बना लिया, लेकिन कांग्रेसियों को उम्मीदवारी देना पुराने भाजपाइयों को रास नहीं आ रहा है। भाजपा के अपने ही वैâडर के इन उम्मीदवारों को लेकर पार्टी से खासा नाराज चल रहा है। नतीजतन, अब भाजपा अपने उम्मीदवारों को बदलने पर विचार कर रही है।

गले की फांस बनी भाजपा की जल्दबाजी
उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री ने भी दावा किया है कि विधानसभा उपचुनाव में भाजपा ने सभी ६ उम्मीदवारों को जल्दबाजी में उतार दिया और भाजपा वैâडर की नाराजगी के चलते यह पैâसला भाजपा के ही गले की फांस बन चुका है। उनका कहना है कि भाजपा के सभी उम्मीदवार चाहे वह लोकसभा चुनाव के लिए हो या फिर विधानसभा उपचुनाव के लिए हो पूरी तरह से फ्लॉप साबित हो रहे हैं। यह उम्मीदवार कहीं पर भी भीड़ नहीं जुटा पा रहे हैं।
भाजपा के मंसूबों को
महिला शक्ति ने भी पहचाना
पुरानी पेंशन योजना और महिलाओं को हर महीने १,५०० देने की कांग्रेस की गारंटी पर भाजपा का गलत स्टैंड भी उसे भारी पड़ सकता है। उनके मुताबिक, जब राज्य के कर्मचारी भाजपा सरकार से पुरानी पेंशन योजना की मांग कर रहे थे तो उस वक्त जयराम ठाकुर ने शीर्ष नेतृत्व का हवाला देकर उनकी मांग को ठुकरा दिया। दूसरी तरफ जब प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने महिलाओं को हर महीने १,५०० रुपए देने की योजना की शुरुआत की तो भाजपा ने इसे रुकवाने के लिए भी एड़ी-चोटी का जोर लगा डाला, लेकिन अब कर्मचारियों के साथ-साथ महिला शक्ति भी भाजपा के मंसूबों को अच्छी तरह से समझ चुकी है। इसका जवाब प्रदेश की जनता १ जून को होने वाले मतदान में भाजपा को देगी।

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