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क्या चुनाव आयोग को है चुनाव चिह्न पर पैâसला लेने का अधिकार? …फैसले की समीक्षा का प्रकाश आंबेडकर ने किया अनुरोध

सामना संवाददाता / मुंबई
वंचित बहुजन विकास आघाड़ी के नेता और वरिष्ठ वकील प्रकाश आंबेडकर ने पार्टी चिह्न पर निर्णय लेने के चुनाव आयोग के अधिकार पर ही सवाल उठा दिया है। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग द्वारा खुद से किए गए प्रावधानों की संवैधानिक जांच करने का मौका सर्वोच्च न्यायालय को मिला था, लेकिन दुर्भाग्य से वह मौका कोर्ट ने गवां दिया। पैâसले की समीक्षा करने की वकालत करते हुए उन्होंने सवाल उठाया है कि क्या चुनाव आयोग को पार्टी के चुनाव चिह्न पर पैâसला लेने का अधिकार है?
प्रकाश आंबेडकर ने कहा कि संविधान और संसद की ओर से चुनाव आयोग को तटस्थ रहने की व्यवस्था की गई है।
चुनाव आयोग पर कोई उंगली न उठाए, इसकी सतर्कता बरती गई थी। लेकिन चुनाव आयोग ने अपने आधीन ‘सिंबल ऑर्डर १९६८’ में धारा १५ का प्रावधान किया। इसके तहत किसी पार्टी में चुनाव चिह्न को लेकर विवाद होगा तो उसे हस्तक्षेप करने की अनुमति होगी।
प्रकाश आंबेडकर ने अपनी राय व्यक्त करते हुए कहा कि पार्टी के चुनाव चिह्न पर निर्णय लेने का अधिकार चुनाव आयोग को है या नहीं, इस आशय के प्रावधान की संवैधानिक वैधता जांच करने का अवसर सुप्रीम कोर्ट को मिला था, लेकिन दुर्भाग्य से उसकी जांच नहीं हुई और कोर्ट ने चुनाव आयोग को शिवसेना के मामले में निर्णय लेने को कहा।
प्रकाश आंबेडकर ने कहा कि संविधान और संसद द्वारा चुनाव आयोग की तटस्थता का जतन किया गया था, दुर्भाग्य से इस पैâसले से वह खतरे में पड़ गई है। इस पैâसले से इसके आगे पार्टी विवाद पर चुनाव आयोग निर्णय लेगा, यह जो संदेश देश भर में गया है, वह गलत है। क्या हम चुनाव आयोग को दानव (प्रैंकेस्टाइन) बनाने निकले हैं, ऐसी संभावना निर्माण होती है। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय अपने निर्णय की समीक्षा करे। ऐसा अनुरोध प्रकाश आंबेडकर ने किया है। ‌

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