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डॉग बाइट से खुलती खराब व्यवस्था की पोल!

डॉ. रमेश ठाकुर (नई दिल्ली)

गाजियाबाद में रेबीज इनफेक्शन के चलते हुई एक १४ वर्षीय किशोर की दर्दनाक मौत पर पूरे देश में चर्चा है। घटना ने शासन-सिस्टम को भी कटधरे में खड़ा कर दिया है। निश्चित रूप से उस घटना ने न सिर्फ गाजियाबाद के लोगों को, बल्कि समूचे देशवासियों को झकझोरकर रख दिया है। उस घटना के बाद से ही कुत्ता के काटने की घटनाओं में बेहताशा इजाफा हुआ है। करीब पांच सौ से ज्यादा घटनाएं गाजियाबाद में बीते दो माह में हुई हैं, जिसमें पिछले सप्ताह एक और युवक की मौत रेबीज से हो गई। उसे भी एक आवारा कुत्ते ने बीस-पच्चीस दिन पहले काटा था। रेबीज संक्रमण की घटनाओं पर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय भी गंभीर है। जब से ये ताजी घटनाएं सामने आर्इं हैं, उसके बाद मंत्रालय ने रेबीज टीके के स्टॉक की समीक्षा करनी शुरू कर दी है। जहां टीकों की उपलब्धता नहीं है, वहां टीका मुहैया कराने के आदेश दिए गए हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने भी सभी जिलों के सीएमओ को आदेशित किया है। बहरहाल, रेबीज कितना घतरनाक होता है और दुष्परिणाम वैâसे होते हैं इस कड़वी सच्चाई से सभी वाकिफ हैं। कुत्ता के काटने के शिकार पीड़ितों की भीड़ अस्पतालों में भी यकायक बढ़ गई है। कई मर्तबा तो अस्पतालों में रेबीज के इंजेक्शनों का भी टोटा रहता है। उस स्थिति में पीड़ित औने-पौने दामों में निजी अस्पतालों से रेबीज के टीके खरीदते हैं। चिकित्सकों की मानें तो रेबीज के लगभग ९७ फीसदी केस संक्रमित कुत्ते के काटने के कारण ही होते हैं। कुत्ता काटने के ७२ घंटों के भीतर एंटी-रेबीज वैक्सीन अवश्य लगवाना चाहिए। ऐसा नहीं करने पर पीड़ित निश्चित रूप से रेबीज की चपेट में आएगा।
बहरहाल, इस मसले पर गंभीरता से विचार करना होगा? घटना घटने पर सिर्फ कागजी प्रयासों के बूते ये विकराल समस्या नहीं सुलझने वाली? केंद्र या राज्य स्तर पर कोई कारगर नीति अपनानी होगी? इस वक्त समूचे भारत में लावारिस पशुओं की बड़ी समस्या है। कोई ऐसा आवासीय क्षेत्र नहीं बचा है, जहां कुत्तों के झुंड न देखे जाते हों? ये राहगीरों की राहों में मुसीबत बने हुए हैं। गली, मोहल्ले, चौक-चौराहों पर अक्सर इनका झुंड रास्ता घेरकर बैठा रहता है। पलक झपकते ही अटैक करने लगते हैं। कुछ महीने पहले दिल्ली में घटी घटना ने भी सबके रोंगटे खड़े कर दिए थे, जहां दो सगे भाईयों को कुत्तों ने चबा-चबाकर मार डाला था। दिन छिपने के बाद आवारा जानवर और ज्यादा हिंसक हो जाते हैं। इनका गाड़ियों के पीछे भागना और तेजी से भौंकने के चलते कई बार लोग दीवारों से टकराकर दुर्घटनाओं का शिकार होते हैं। घटनाएं हो जाने के बाद ही नगर निगम अधिकारियों की नींदें टूटती है और आवारा कुत्तों को पकड़ने का जोरशोर से अभियान चलाते हैं। अच्छी बात है ऐसा होना चाहिए, लेकिन घटना घटने के बाद ही प्रशासन को चेतना क्यों आती है? उससे पहले भी इस समस्या पर ध्यान दिया जा सकता है। क्यों घटना घटने का इंतजार किया जाता है?
दरकार यही है कि पशु-अधिनियम कानून का ख्याल रखते हुए, सख्त कदम उठाए जाएं। हालांकि विधानसभा-२०२२ के चुनाव में हिंसक और आवारा जानवरों का मुद्दा खूब गर्माया था, यहां तक कि खुद प्रधानमंत्री ने एक चुनावी सभा में वादा किया था कि सरकार बनने के बाद मवेशियों से पैâली समस्याओं का निस्तारण कर दिया जाएगा। समस्या को सुलझाने के लिए सरकारी स्तर पर अब कोई न कोई कारगर नीति अपनानी ही होगी। पुरानी व्यवस्था को बदलना होगा, चाहे इसके लिए नए कानूनों बने या पूर्व के कानून को प्रभावी बनाया जाए। हालांकि, उनका ये वादा सिर्फ वादा ही रहा, धरातल पर कोई व्यवस्था नहीं की गई।

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