मुख्यपृष्ठनए समाचारअमरनाथ यात्रा पर दोहरी चुनौती: आतंकवाद- प्राकृतिक आपदा!

अमरनाथ यात्रा पर दोहरी चुनौती: आतंकवाद- प्राकृतिक आपदा!

सुरेश एस डुग्गर / जम्मू
कश्मीर घाटी आतंकवाद की आग में जल रही है। टारगेट किलिंग से घबराए कश्मीरी पंडित और घाटी में मौजूद हिंदुओं का पलायन शुरू हो गया है। इसी बीच ३० जून से शुरू हो रही अमरनाथ यात्रा सेना के लिए युद्ध का मोर्चा साबित हो सकती है। यात्रा को सकुशलता से संपन्न कराने के लिए सेना ने पहलगाम से लेकर गुफा तक के ४५ किमी लंबे यात्रा मार्ग को अपने कब्जे में लेना प्रारंभ कर दिया है। हजारों की संख्या में सैनिक इस मार्ग पर तैनात किए जाने लगे हैं। इनकी तैनाती के लिए हेलिकॉप्टरों की सेवाएं भी ली जा रही हैं।
रक्षाधिकारियों ने इसकी पुष्टि की है कि यात्रा मार्ग पर आतंकियों तथा विस्फोटक सामग्री की तलाश के लिए विशेष अभियान छेड़ा गया है। इस तलाशी अभियान में लड़ाकू  हेलिकॉप्टरों की भी मदद ली जा रही है। इसी प्रकार जम्मू के भगवती नगर के आधार शिविर में तलाशी और सतर्कता  बढ़ा दी गई है। इस बार सूचनाएं कहती हैं कि आतंकी इस शिविर को निशाना बना सकते हैं। उस पर प्रकृति के प्रकोप की चुनौती का सामना भी करना पड़ सकता है। क्योंकि पिछले कुछ वर्षों से इसका प्रभाव प्राकृतिक हिम लिंग पर भी देखने को मिल रहा है।
बता दें कि अमरनाथ यात्रा के लिए हजारों सैनिकों को जम्मू कश्मीर के प्रवेश द्वार लखनपुर से अनंतनाग जिला स्थित अमरनाथ गुफा तक तैनात किया जा रहा है। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की तैनाती का कोई आधिकारिक आंकड़ा तो नहीं मिल सका है लेकिन अनुमान है कि करीब डेढ़ लाख सैनिकों की तैनाती की जा सकती है। इसमें सिर्फ  पहलगाम से लेकर गुफा तक २५ हजार सुरक्षाकर्मी और १८ हजार सुरक्षाकर्मी बालटाल से लेकर गुफा तक के मार्ग पर तैनात किए गए हैं। इस बार उम्मीद ७ से ८ लाख से अधिक तीर्थ यात्रियों के इस यात्रा में शामिल होने का अनुमान है।
प्राकृतिक आपदाओं का खतरा
वैसे आतंकी खतरे के साथ-साथ यात्रा पर प्राकृतिक आपदा का खतरा भी हमेशा मंडराता है। जैसा कि वर्ष १९९६ में हुआ था, जब प्राकृतिक आपदा में ३०० करीब श्रद्धालुओं की दर्दनाक मौत हो गई थी, जबकि हर साल औसतन १०० के करीब श्रद्धालुओं की प्राकृतिक हादसों में जान चली जाती है। अमरनाथ यात्रा कब से आरंभ हुई थी, इसका कोई दस्तावेजी सबूत नहीं है। परंतु हादसों की चपेट में यात्रियों के आने का विवरण वर्ष १९६९ से ही मिलता है, तब बादल फटने के कारण १०० के करीब श्रद्धालुओं की मौत हो गई थी। इसी तरह वर्ष १९९६ में यात्रा के दौरान करीब ३०० श्रद्धालुओं की बर्फबारी  में फंसने से व ठंड के कारण मौत हो गई थी।
ड्रोन व स्टिकी बम से हमले का खतरा
‘इस बार अमरनाथ तीर्थ क्षेत्र की यात्रा में शािमल होनेवाले तीर्थ यात्रियों पर आतंकियों के प्रत्यक्ष हमले का खतरा तो है ही इसके अलावा उन्हें ड्रोन के साथ-साथ स्टिकी बमों के जरिए निशाना बनाए जाने की आशंका भी जताई जा रही है। अत: हम कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहते हैं, ऐसा यात्रियों की सुरक्षा में जुटे एक सैन्य अधिकारी का कहना है। उक्त सैन्य अधिकारी ने इस मोर्चे की तुलना युद्ध के मोर्चे से की।

अन्य समाचार