आंटे का गोला

किस तरह समेट लेती हो खुद को हर दस्तूर के खांचे में
ख्वाहिशें तो रास्ता मांगती होंगी
दम तो घुटता होगा जब खुद को बांधा होगा साड़ी के इर्द गिर्द
जब अरमानों को कस के बांधा होगा दुपट्टे की जानिब
सांस लेने में तकलीफ भी हुई होगी जब हवा को रोका होगा पर्दे की खातिर
चीख नहीं निकली तुम्हारी जब पैरों की पाजेब को बेड़ी बनाया गया,
जिस्म नहीं चरमराया तुम्हारा जब जबरदस्ती हया का रंग चढ़ाया गया
औरत हो आंटे का गोला नहीं

नूरुस्सबा

सायन-मुंबई

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