सपना ऐसा भी

इक सपना देखा, पानी में चलता हुआ इंसान देखा
पहाड़ों पर चढ़ता हुआ मनुष्य देखा
पानी में बहने से बच गया, पहाड़ों से गिरने से टल गया
यह तो कुदरत की रहमाई थी, पर कोई शैतान उसे ढहने आई थी
खुला आसमान देख डर के मारे वो सहम गया
ऊंचाई और गहराई देख वो घबरा गया, संकरी गलियों से वो गुजरता गया
ऊंची दीवारों से टकराता गया, लोहे की सलाखों से लटकता गया
पर कहीं से बच बचा के वो निकलता गया
हर चरम पर उसने ऐसी इबादत पाई थीं
खुदा ने अपनी खुदाई बरसाई थी, जानवरों की टांगों से टकराया
बस अपने को रौंदने से बचाया
लम्बे और तंग पुल पर चलता गया
पर कहीं दूर किनारा नजर आ ही गया
हवा में वो उड़ता रहा, पर नीचे उतरना आ ही गया
वक्र दृष्टि उसे गिरफ्तार करने आया था
पर वक्र तुणड उसकी हथकड़ी तुडाने आया था
ब्रह्मांड ने ऐसा तीर चलाया था
सपना भी उसी ने दिखाया था
जो बहरुपिया बन के बचाने आया था।
-अन्नपूर्णा कौल, नोएडा

अन्य समाचार