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ईडी सरकार हर दिन दबाती है भ्रष्टाचार की एक फाइल! …एक वर्ष में ३६४ मामलों में सरकारी अनुमति नहीं मिली

रामदिनेश यादव / मुंबई
भ्रष्टाचार को खत्म करने का दावा करने वाली राज्य की ‘ईडी’ सरकार हकीकत में इसे जमकर बढ़ावा दे रही है। भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों वाले मंत्रियों एवं अधिकारियों का खुलकर संरक्षण कर रही है। कई बड़े अधिकारियों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप होने के बावजूद उनकी फाइलों को दबाकर रखा है। जानकारी के अनुसार ईडी सरकार रोज भ्रष्टाचार की एक फाइल दबाती है।
मिली जानकारी के अनुसार, ‘ईडी’ सरकार ने लगभग एक साल में भ्रष्टचार की ३६४ फाइलों को जांच के लिए मंजूरी नहीं दी है। एसीबी (एंटी करप्शन ब्यूरो) को लंबे समय से भ्रटाचार से जुड़े इन मामलों की जांच के लिए ‘ईडी’ सरकार के अनुमति का इंतजार है। लोक सेवक व वरिष्ठ अधिकारियों पर भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए सरकार व वरिष्ठ अधिकारियों की अनुमति जरूरी होती है। लेकिन यह सरकार भ्रष्टाचारी नेताओं और अधिकारियों को बचाने के लिए रोज औसतन एक फाइल को दबाने का काम कर रही है। यह खुलासा एक आरटीआई में हुआ है।
असंवैधानिक सरकार के इस रवैये से जो लोग लंबे समय से राजनीतिक दलों के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान में विश्वास करते थे। अब वे निराश हो गए हैं और सत्ता में बैठे लोगों की ईमानदारी पर सवाल उठा रहे हैं। केंद्र की मोदी सरकार ने वर्ष २०१८ में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम १९८८ (१७ए) में संशोधन कर बदलाव किया था, जिसके तहत लोकसेवक (जनप्रतिनिधि व वरिष्ठ अधिकारी) पर भ्रष्टचार के आरोपों की जांच के लिए एंटी करप्शन ब्यूरो को राज्य सरकार व विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों से अनुमति लेना अनिवार्य है।
सरकार इन मामलों पर कोई निर्णय नहीं ले रही है, ऐसे में एसीबी के पास ऐसे मामलों का गट्ठर बढ़ता जा रहा है। महाराष्ट्र एसीबी लगभग एक वर्ष से ३६४ मामलों में जांच की अनुमति का इंतजार कर रही है। दिलचस्प बात यह है कि इनमें से ३५६ मामले ऐसे हैं, जो १२० दिनों से लंबित हैं और भ्रष्ट नेताओं एवं अधिकारियों को जांच से बचाने के संभावित प्रयास का संकेत देते हैं।
यह जानकारी आरटीआई कार्यकर्ता जितेंद्र घाडगे को एसीबी से मिली है। प्राप्त जानकारी के अनुसार सबसे अधिक भ्रष्टाचार के मामले शहरी विकास विभाग के हैं। इसके ९० मामले लंबित हैं तो दूसरे स्थान पर राजस्व विभाग के ४५ मामले प्रलंबित हैं। ग्रामीण विकास विभाग के ४१ मामले लंबित हैं। ३६ मामले सार्वजनिक निर्माण विभाग के हैं। इसमें कुल २१० मामले राज्य सरकार के पास प्रलंबित हैं तो १५४ मामले कई विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों के पास जांच अनुमति के लिए प्रलंबित हैं।
ऐसे मिलता है संरक्षण
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम १९८८ की धारा १७ए में संशोधन के बाद एसीबी को एक लोकसेवक व अधिकारी के खिलाफ जांच शुरू करने से पहले सरकार व सक्षम प्राधिकारी की अनुमति लेनी होगी, जो भ्रष्ट सरकारी कर्मचारियों एवं जनप्रतिनिधियों को सुरक्षा की अतिरिक्त परत प्रदान करता है। जांच से पहले एसीबी को दो अनुमति लगती है, बाद में केस फाइल करने के लिए भी फिर से अनुमति लेनी पड़ती है।

भ्रष्टाचार कानून को किया कमजोर
आरटीआई कार्यकर्ता जितेंद्र घाडगे का कहना है कि अगर ‘ईडी’ सरकार भ्रष्ट अधिकारियों की जांच की फाइल को मंजूरी देने में अनिच्छुक है, तो एसीबी का क्या फायदा? भ्रष्टाचार मिटाने को लेकर राजनीतिक बयानबाजी और सत्ता में रहते हुए भ्रष्टाचारियों को बचाने के लिए किए गए सुधारों के बीच यह असमानता देश के लोगों में गंभीर चिंता का कारण बन रही है। ऐसा कहना बिल्कुल गलत नहीं है कि केंद्र की सरकार हो या राज्य की सरकार, इन्होंने भ्रष्टचार के कानून को कमजोर कर दिया है।

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