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संपादकीय : जीवन और भी ‘महंगा’ हुआ!

आम जनता सुकून से न जिए, कुल मिलाकर फिलहाल ऐसी ही अवस्था हमारे देश की हो गई है। कोरोना कुछ शिथिल हुआ ही है, तो महंगाई के रोज लगते झटके से आम जनता परेशान हो गई है। कोरोना की पाबंदियों से जनता राहत महसूस कर ही रही है कि तभी प्रतिदिन होनेवाली कीमतों में वृद्धि के कारण उनके दम घुटने की नौबत आ गई है। अब तो दैनिक इस्तेमाल में लगनेवाली लगभग ८०० दवाइयों की कीमत भी दस फीसदी तक बढ़ गई है। इस दर वृद्धि को औषधि मूल्य प्राधिकरण ने मंजूरी दी है इसलिए १ अप्रैल से विविध पेन किलर और एंटीबायोटिक्स महंगे हो जाएंगे। दैनिक जीवन में सर्वाधिक इस्तेमाल की जानेवाली पैरासिटामोल भी इस दर वृद्धि से बची नहीं है। कोरोना के बीते दो वर्षों में सर्वाधिक इस्तेमाल जिस औषधि का हुआ था वह पैरासिटामोल और एंजीथ्रोमाइसिन की गोलियां। परंतु अब उसके लिए अधिक पैसे गिनने होंगे। पैरासिटामोल तो पहले ही लगभग १३० फीसदी तक महंगी हो गई है। उस पर अब और दस फीसदी बढ़ेगा। मतलब ज्वर, संसर्गजन्य बीमारियां, हृदयविकार, रक्तदाब, कमजोरी आदि बीमारियों के लिए अब अधिक पैसे गिनने पड़ेंगे। औषधियों की उत्पादन लागत बढ़ने से यह दर वृद्धि अपरिहार्य थी तथा बीते दो वर्षों से इसकी मांग हो रही थी, ऐसा दवा कंपनियों का कहना है। इसमें कदाचित सच्चाई होगी भी परंतु ऐसी हर दर वृद्धि के लिए आम जनता पैसा लाए कहां से? जिस तरह से पेट्रोल-डीजल की दर वृद्धि केंद्र सरकार ने पांच राज्यों के चुनाव संपन्न होने तक रोक रखा था उसी तरह औषधियों की दर वृद्धि भी रोकी गई थी, ऐसा ही अब कहना होगा। अन्यथा पेट्रोल-डीजल के पीछे-पीछे दवाइयों की दर वृद्धि को मंजूरी नहीं दी गई होती। पहले ही पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि के कारण दैनिक जीवन में उपयोगी सभी चीजें महंगी हो गई हैं। १ अप्रैल से शुरू होनेवाले नए आर्थिक वर्ष में जीएसटी, बचत खाता, फिक्स डिपॉजिट, एटीएम शुल्क से लेकर कर प्रणाली तक कई नियम बदल जाएंगे, जिसका बोझा सामान्य जनता की जेब पर पड़नेवाला है। दूसरी तरफ पीएफ पर मिलनेवाली ब्याज दर पर कैंची चलाकर केंद्र सरकार ने आम नौकरीपेशा वालों के भविष्य के प्रावधान भी कम कर दिए हैं। मतलब दर वृद्धि का प्रहार करते हुए जेब में बचे-खुचे पैसे भी निकाल लेना है तथा निवृत्ति के बाद मिलनेवाली पूंजी भी ज्यादा नहीं मिलेगी। ऐसी व्यवस्था करनी है, ऐसा प्रयास फिलहाल चल रहा है। नोटबंदी, जीएसटी, कोरोना, लॉकडाउन के कारण पहले ही आम लोगों का जीना हराम हो गया है। करोड़ों लोगों के रोजगार छिन गए। जो कुछ है उसमें अपना और परिवार का गुजारा आम लोग कर रहे हैं। कोरोना महामारी ने इंसान का ‘जीना महंगा और मौत सस्ती’ ऐसी कर दी है। इस महंगे हुए जीवन को किसी तरह धकेलने और जो है, उसमें संतुष्ट रहने का प्रयास आम इंसान कर रहा है। परंतु केंद्र ने उसका यह जीवन भी और महंगा करनेवाली औषधि दर वृद्धि अब लाद दी है। हर तरफ से होनेवाले महंगाई का प्रहार, उससे हुई आर्थिक अड़चन फिर इस आर्थिक तथा मानसिक तनाव का परिणाम आम लोगों के स्वास्थ्य पर हुआ ही तो इसका इलाज करना भी कठिन हो जाएगा। मतलब सुख से जीना नहीं है तथा दुख से बीमार भी पड़ना नहीं है। ऐसी अजीबोगरीब दुविधा हो गई है। कोरोना की चौथी लहर आएगी या नहीं आएगी, वह न ही आए लेकिन रोज लगनेवाले महंगाई के झटके का क्या? इसे कौन रोके?

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