मुख्यपृष्ठनए समाचारसंपादकीय : डॉ. आंबेडकर! ...‘देश संकट में है!’

संपादकीय : डॉ. आंबेडकर! …‘देश संकट में है!’

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का आज ६७वां महापरिनिर्वाण दिवस है। देश के कोने-कोने से आज इस महामानव को श्रद्धांजलि अर्पित की जाएगी। मुंबई स्थित चैत्यभूमि पर तो उनके अनुयायियों का जनसैलाब उमड़ेगा। शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे हमेशा ही कहते थे, ‘महाराष्ट्र के दो ही देवता वास्तविक हैं। पहले शिवाजी महाराज व दूसरे डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर।’ इन दोनों देवों का आज सिर्फ राजनीति के लिए इस्तेमाल करने की तकनीक वर्तमान राजनीतिज्ञों ने अपना ली है। ‘भारतरत्न’ डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने देश को संविधान दिया। उसमें लोकतंत्र, आजादी सब शामिल है ही। लोकतंत्र मतलब संवाद। जनता और सरकार के बीच के संवाद का मतलब ही वास्तविक लोकतंत्र है। बहुसंख्यक और अल्पसंख्यकों के बीच के संवाद का मतलब लोकतंत्र है। जिनकी सरकार से पटती है और जिनकी मतभिन्नता है, उनके बीच भी संवाद होना ही चाहिए। परंतु केवल जिनके पास बहुमत है, उन बहुमतवालों की ही सत्ता मतलब लोकतंत्र नहीं है। लोकतंत्र में बहुमतवालों की सत्ता के लिए विरोधियों की मौन और प्रत्यक्ष सहमति जरूरी होती है। इसीलिए विरोधियों की आवाज को दबाकर आप उन्हें नष्ट नहीं कर सकते हैं। विख्यात ब्रिटिश विचारक हेरॉल्ड लास्की कहते हैं, ‘हमारे समर्थकों की स्तुति की बजाय आलोचना से सरकार अधिक सजग होती है।’ डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने जो संविधान दिया, उस संविधान ने ये तमाम अधिकार और आजादी हमें दी है। परंतु उसी संविधान का आज अवमूल्यन किया जा रहा है और संविधान द्वारा दी गई आजादी को पैरों तले रौंदा जा रहा है। ऐसे समय में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की याद आती है। एक महान, साहसिक उद्देश्य से बाबासाहेब ने भारतीय संविधान तैयार किया लेकिन वह अमल में लाने के लिए गलत लोगों के हाथ में चला जाए तो नुकसान होगा, ऐसी भी डॉ. आंबेडकर ने तब चेतावनी दी थी। आज उनकी याद आती है। उन्होंने प्रखर सत्य कहा था। डॉ. आंबेडकर ने उसी समय कहा था कि ‘इस देश में पत्थर को सिंदूर लगाना आसान है। लेकिन बाद में उसे खुरचकर निकालना मुश्किल है।’ आज सिंदूर पोते गए, कई पत्थरों को दैवत्व प्राप्त हो गया है। उन्हें देखने के बाद डॉ. आंबेडकर की याद आए बिना नहीं रहती है। ‘सत्यमेव जयते’ इस घोषवाक्य को राष्ट्र ने अपने सिर पर धारण किया लेकिन आज सत्य, औषधि भर के लिए भी नहीं, बल्कि औषधि के लिए भी नहीं मिलता। नशाखोरों का राज चल रहा है और जनता की समस्याओं से उनका कोई लेना-देना नहीं है। इसीलिए डॉ. आंबेडकर की याद जनता को रोज ही आती है। डॉ. आंबेडकर संविधान के रचयिता थे। मानव समाज और हिंदू धर्म पर लगा अस्पृश्यता का कलंक मिटाने के लिए उन्होंने आजीवन संघर्ष किया। आखिरकार भारतीय संविधान द्वारा स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व ऐसे आधुनिक विचारों के त्रिमूर्ति की वर्ष १९५० में स्थापना करके अस्पृश्यता को गुनाह ठहराते हुए १९५६ में बौद्ध धम्म की दीक्षा लेकर मानवता से चूके व्यक्तियों को पहचान दी। अपना खुद का व्यक्तित्व दिया। यह पूरी लड़ाई उन्होंने देश को तिल मात्र भी चोट पहुंचाए बिना लड़ी। समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा दिव्यांग होगा तो समाज सशक्त हो ही नहीं सकता, ऐसा उन्होंने बार-बार जोर देकर कहा। स्वास्थ्य गिरने के बावजूद उन्होंने प्रचंड परिश्रम करके हिंदू कोड बिल तैयार किया और हिंदुओं को एक हजार वर्ष पुराने पुराणकालीन युग से आधुनिक २१वीं शताब्दी में लानेवाली संहिता उपलब्ध कराई। उन्होंने समान नागरिक कानून पर भी जोर दिया। इस तरह से पूरे देश को एकजुट व समर्थ बनाने के लिए जितना प्रयास किया जा सकता है, उतना उन्होंने किया। वे जबरदस्त स्वाभिमानी थे। धार्मिक-सामाजिक मोर्चे पर हिंदू कोड बिल, उसी तरह राजनीतिक मोर्चे पर योजनाबद्ध ढंग से समाजवादी संरचना के उनके प्रयास पर पानी फिरते ही उन्होंने केंद्र का मंत्रिपद त्याग दिया। देश और दलित के बीच दूरी निर्माण करने की छोड़ो ही लेकिन यह देश मेरा है और इस देश का मैं मालिक हूं, ऐसी सीख उन्होंने जनता में बैठाई। डॉ. आंबेडकर एक जाति के नेता थे, ऐसा दुष्प्रचार जो करते हैं, वो मूर्ख हैं। डॉ. आंबेडकर पूरे देश के मार्गदर्शक और नेता थे। उनकी जातिवाद के खिलाफ की लड़ाई समर्थ देश के लिए थी। लेकिन जातिवाद सत्ताधारियों के रोम-रोम में भिना हुआ है। प्रधानमंत्री मोदी काशी गए, उन्होंने गंगा में डुबकी लगाई और तट पर स्थित तंबू में पांच दलितों के पांव धोए, इससे क्या जातिवाद नष्ट होगा? डॉ. आंबेडकर की याद ऐसे समय में यहां आती ही रहेगी। डॉ. आंबेडकर ने वर्ष १९३३ में ही कह दिया था कि मैं हिंदू धर्म का त्याग करूंगा, यह तय है और इस्लाम स्वीकार नहीं करूंगा यह भी तय है! पाकिस्तान द्वारा कई प्रलोभन दिए जाने के बाद भी उन्होंने इस्लाम स्वीकार नहीं किया। यह उनका राष्ट्र पर और हिंदू धर्म पर उपकार है। उन्होंने इस्लाम स्वीकार नहीं किया क्योंकि इस्लाम में परिवर्तनशीलता नहीं है। उसमें कुरान के शब्द अंतिम हैं, जिसमें अक्षरों को बदला नहीं जा सकता है। डॉ. आंबेडकर को यह स्वीकार नहीं था। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने देश को संविधान दिया। न्याय, स्वतंत्रता, लोकतंत्र और नागरिकों के अधिकार का समर्थन किया। आज उस संविधान को कदम-कदम पर रौंदा जा रहा है। न्यायालय, समाचार पत्र, चुनाव आयोग, संसद ऐसे तमाम संवैधानिक स्तंभ धराशायी होकर गिर पड़े हैं। कई प्रकरणों में कानून शिथिल होकर बैठा है। देश में क्या हो रहा है, जानने का प्रत्येक नागरिक को अधिकार है। लोकतंत्र का यह पहला सबक होता है। परंतु आज की सरकार ने लोकतंत्र के इन बुनियादी मूल्यों पर ही प्रहार किया है। देश की संप्रभुता को ठेस लगे, ऐसी यह नीति है। ऐसे समय में डॉ. आंबेडकर की याद तीव्र उत्कंठा से आती है। लोकतंत्र में आजादी जब-जब खतरे में पड़ेगी, तब-तब डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर इस महामानव को याद करना ही होगा! हम हमारे तमाम शिवसैनिकों की ओर से यही कर रहे हैं!!

अन्य समाचार