मुख्यपृष्ठसंपादकीयसंपादकीय : ‘यूपीए’ का जीर्णोद्धार!

संपादकीय : ‘यूपीए’ का जीर्णोद्धार!

पंजाब को छोड़कर चार राज्यों में विधानसभा का चुनाव जीतने के बाद भी मोदी की पार्टी संतुष्ट नजर नहीं आ रही है। केंद्र में असीमित सत्ता होगी फिर भी गैर भाजपा शासित राज्यों को काम नहीं करने देना, ऐसा उनका एजेंडा है। ऐसे राज्यों में रोज ही अड़चन व बाधा निर्माण करके लोकतंत्र का गला घोंटा जा रहा है। इस मनमानी के खिलाफ गैर भाजपाई पार्टियों को एकजुट होने का आह्वान ममता बनर्जी ने किया है। ममता बनर्जी ने ऐसे सभी मुख्यमंत्रियों एवं पार्टियों को एक साथ आने का आह्वान किया है। सभी ‘प्रगतिशील’ शक्तियों को एक साथ आकर भाजपा की मनमानी, तानाशाही का सामना करना चाहिए, ऐसा ममता ने कांग्रेस सहित अन्य दलों के प्रमुखों को लिखे पत्र में कहा है। ममता ने यह पत्र कांग्रेस की प्रमुख को भी लिखा है। मतलब कांग्रेस के बगैर विपक्ष की एकजुटता संभव नहीं है, इसे उन्होंने स्वीकार किया है। कांग्रेस को विपक्ष के रूप में टिकना ही चाहिए। कांग्रेस को खत्म नहीं होना चाहिए, ऐसा विचार नितिन गडकरी जैसे भाजपाई नेता ने, केंद्रीय मंत्री ने व्यक्त किया। इसका अर्थ ये है कि दिल्ली में वर्तमान में जो राजनीतिक व्यवस्था है उसे विपक्ष के अस्तित्व को ही नष्ट करना है। ऐसी तैयारी कुछ लोगों ने शुरू कर दी है। उत्तर प्रदेश में भाजपा जीत गई यह ठीक है, परंतु हाथरस, उन्नाव, लखीमपुर खीरी में घटी भयंकर घटनाओं के बाद भी वहां भाजपा की जीत हो सकती है इसे लेकर लोगों के मन में शंका है। वहां बलात्कार, महिला अत्याचार के खिलाफ लोगों के मन में रोष था, फिर भी उस जगह भाजपाई उम्मीदवार जीत गए यह ताज्जुब की बात है। कुछ भी करेंगे फिर भी हम ही चुनाव जीतकर दिखाते हैं, ऐसा तंत्र जिस राज्य व्यवस्था में आ जाता है उनके खिलाफ लड़ना कठिन होगा लेकिन असंभव नहीं है। किसी राज्य में भाजपा के विरोधियों ने चुनाव जीत लिया तो प्रधानमंत्री, गृहमंत्री उस राज्य के मुख्यमंत्री का अभिनंदन करते हैं। केंद्र की ओर से राज्य को पूरी मदद मिलेगी, ऐसा आश्वासन देते हैं। परंतु अभिनंदन के वो शब्द हवा में गुम होने के पहले ही उस राज्य में विरोधी साजिशें शुरू हो जाती हैं। यह संकुचित मन वाली हल्की राजनीति के लक्षण हैं। पंजाब में ‘आप’ ने चुनाव जीता। भगवंत मान मुख्यमंत्री बन गए। उनके द्वारा जनहित के कुछ निर्णय झटपट लेने शुरू करते ही केंद्र ने राजधानी चंडीगढ़ में उस राज्य के विरोध में अधिकारियों को घुमाना शुरू कर दिया है। पंजाब की सरकार लोकतांत्रिक मार्ग से पूर्ण बहुमत के आधार पर सत्ता में बैठी है। जैसा बहुमत उत्तर प्रदेश व अन्य राज्यों में भाजपा को मिला, उसी तरह से पंजाब में ‘आप’ को मिला। ‘आप’ ने अब हिमाचल, हरियाणा में तैयारी शुरू कर दी है। इससे डरकर केंद्र ने उस पर नकेल कसनी शुरू कर दी है। इसीलिए ममता बनर्जी के एकजुट होने के आह्वान को अरविंद केजरीवाल प्रतिसाद देंगे क्या? पश्चिम बंगाल विधानसभा में भाजपा व तृणमूल के बीच दंगा हुआ। बीरभूम की हिंसा निंदनीय है, परंतु उस हिंसा पर पानी डालने की बजाय तेल डालने का काम वहां के भाजपाई कर रहे हैं। बीरभूम हिंसा के माध्यम से ममता सरकार को बर्खास्त करने का यदि भाजपा अघोरी प्रयास करती होगी तो यह उचित नहीं है। महाराष्ट्र जैसे राज्य में केंद्रीय जांच एजेंसियों को शस्त्र के रूप में इस्तेमाल करके भाजपा यहां की महाविकास आघाड़ी सरकार को हटाने का प्रयास कर रही है। तेलंगाना, तमिलनाडु, केरल में भी विरोधियों की सरकारों को अस्थिर करने का दांव-पेच चल ही रहा है। इसके अलावा जिन भाजपा शासित राज्यों में विपक्ष सक्रिय व लोकाभिमुख है, वहां विरोधियों पर दबाव लाने का प्रयास चल रहा है। झारखंड, छत्तीसगढ़ भाजपा के टार्गेट पर हैं। जिन राज्यों के मुख्यमंत्री ‘द कश्मीर फाइल्स’ फिल्म को करमुक्त नहीं करेंगे वे सभी देश के दुश्मन हैं, ऐसा इन लोगों ने तय कर डाला है! ऐसी मानसिकता से देश को बाहर निकालनेवाला नेतृत्व विरोधी पक्ष में है क्या? होगा तो उस पर एकमत की मुहर लगेगी क्या? ऐसा होना होगा तो ही ममता बनर्जी द्वारा शुरू की गई एकजुटता के प्रयास का कुछ अर्थ है। भाजपा प्रणित ‘एनडीए’ बचा नहीं है, परंतु कांग्रेस प्रणित ‘यूपीए’ भी आज कहीं नजर आता है क्या? निश्चित तौर पर ‘यूपीए’ में कौन है व उनका क्या हो रहा है, इसे लेकर शंका है। विरोधियों की एकजुटता के लिए कदम बढ़ाना मतलब सबसे पहले ‘यूपीए’ का जीर्णोद्धार करना। ‘यूपीए’ का सातबारा फिलहाल कांग्रेस के नाम पर है। उसमें हेरफेर किए बगैर विरोधियों का मजबूती से एकजुट होना संभव नहीं दिखता है। पांच राज्यों की पराजय के बाद कांग्रेस कम-से-कम आगे आकर ‘यूपीए’ के जीर्णोद्धार के लिए विरोधियों का आह्वान करेगी, ऐसी अपेक्षा सभी ने की थी। कांग्रेस पार्टी की अपनी कुछ अंतर्गत पारिवारिक समस्या हो सकती है, परंतु ये समस्या विरोधियों की एकजुटता में बाधा न बने। शरद पवार, उद्धव ठाकरे, ममता बनर्जी, केजरीवाल, के.सी. राव, एम.के. स्टालिन ये सभी प्रतिभावान व्यक्तित्व हैं और नई एकजुटता के संदर्भ में उनसे चर्चा करना जरूरी है। इसके लिए कांग्रेस ने अगुवाई नहीं की इसलिए ममता बनर्जी को आगे आना पड़ा। उन्होंने ‘प्रगतिशील’ शक्तियों से आह्वान किया है। प्रगतिशील मतलब फालतू सेक्यूलरवाद नहीं। उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत हुई तो सामनेवालों को सेक्यूलरवाद का अजीर्ण होने जैसा। देश सभी का है, परंतु बहुसंख्य हिंदू समाज देश का मुकुट मणि है। हिंदुत्व और हिंदू समाज जितना सहिष्णु और प्रगतिशील समाज दुनिया के दूसरे छोर तक और कोई नहीं होगा। विरोधियों की नई आघाड़ी ने इस विचार का ध्यान रखा तो ही भाजपा विरोधी आघाड़ी को बल मिलेगा और ‘यूपीए’ का जीर्णोद्धार संभव होगा। अन्यथा ‘वही पुरानी बातों’ को दोहराते रहने का सिलसिला जारी रहेगा!

अन्य समाचार

ऊप्स!