" /> कोरोना की ‘गंदी’ राजनीति

कोरोना की ‘गंदी’ राजनीति

कोरोना के वायरस ने हाहाकार मचाया है ही, परंतु उसके पीछे की राजनीति मानो तांडव ही करने लगी है। इंसान चिता पर चढ़ रहा है और उनके शव को लेकर विवाद हो रहा है। महाराष्ट्र के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ था। कोरोना मानव निर्मित है या दैवीय प्रकोप? इस पर काफी विवाद हुआ। परंतु सांगली के शिवभक्त अवलिया भिड़े गुरुजी ने अलग ही सिद्धांत पेश किया है। ‘जो, ‘गंदे’ हैं उन्हें कोरोना होगा ही। कोरोना के कारण जो मरनेवाले हैं वो लोग जीने के लायक ही नहीं हैं, ऐसा विचार सांगली के इस अवलिया द्वारा व्यक्त किए जाने के कारण बहुधा वैक्सीन निर्माण करनेवाली कंपनियां अपना उद्योग समेटने की तैयारी में लग गई होंगी। महाराष्ट्र व देश में कोरोना कई अच्छे-अच्छों को हुआ। अर्थात जो मर गए वे मरने के लायक ही थे और जिन्हें कोरोना हुआ वे ‘गंदे’! भिड़े गुरुजी भी संघ के विचारों के कट्टर प्रचारक हैं। वे छत्रपति के भक्त हैं। ‘मास्क वगैरह न लगाएं’ ऐसा विचार उन्होंने व्यक्त किया। अब देश के प्रधानमंत्री क्या करेंगे? असल में आज प्रभु श्रीराम, विष्णु ही क्या छत्रपति शिवराय को भी मास्क लगाकर ही सिंहासन पर बैठना पड़ा होता। कोरोना का संकट महाराष्ट्र में दिन-प्रतिदिन अधिक गंभीर होता जा रहा है। परंतु संकट का भान न रखते हुए इसे लेकर जो राजनैतिक हुल्लड़बाजी हो रही है वह महाराष्ट्र की परंपरा को शोभा देनेवाली नहीं है। महाराष्ट्र में कोरोना की वैक्सीन की कृत्रिम कमी निर्माण कराई गई और इसके पीछे महाराष्ट्र को प्रताड़ित करने की केंद्र की साजिश है। महाराष्ट्र की जनता बेकार अथवा कायरों की औलाद है, ऐसी सोच केंद्र ने अतीत में बना ली होगी तो वे भ्रम में हैं। महाराष्ट्र के मामले में वैक्सीन को लेकर राजनीति शुरू की गई है, जो कि निंदनीय है। भिड़े ने कोरोनाग्रस्तों को गंदा कहा। उसके बजाय वैक्सीन की राजनीति करनेवाले इन गंदे लोगों को फटका मारा होता तो शिवराय का नाम रह गया होता। पूरे महाराष्ट्र में शिवराय के भक्ति की हवा बहती है। इसलिए यह राज्य मर्यादा का ही है, ये क्या भिड़े अथवा भाजपा के नेताओं को पता नहीं है? महाराष्ट्र से आमने-सामने लड़ने की हिम्मत नहीं है इसलिए ये इस तरह का छलवाद शुरू करना। केंद्र सरकार, महाराष्ट्र को वैक्सीन की आपूर्ति करने के संदर्भ में जो अड़ियलपना अपना रही है वह शिवकाल में हुआ होता तो छत्रपति शिवाजी राजे या छत्रपति संभाजी राजे भी महाराष्ट्र की जनता को न्याय दिलाने के लिए दिल्ली की ओर कूच करके पुन: रायगड लौट आए होते। ‘वैक्सीन’ के मामले में फिलहाल दिल्लीश्वर जो तानाशाही चला रहे हैं वह औरंगजेब की विरासत भी है। पहले महाराष्ट्र के दिल्लीवाले नेता दलीय मतभेद भूलकर संकट के समय महाराष्ट्र को किस तरह से मदद की जा सकती है इसके लिए एकजुट होकर आकाश-पाताल एक करते थे। आज दृश्य पूरी तरह बदल गया है। पुणे के प्रकाश जावडेकर दिल्ली में बैठकर महाराष्ट्र के विरोध में बदनामी मुहिम का नेतृत्व करते हैं, ये दर्दनाक है। कोरोना संकट की लड़ाई प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में लड़ी जा रही है। देश में कोविड संघर्ष के यश का श्रेय कल तक मोदी ही ले रहे थे यह जावडेकर भूल गए, ऐसा प्रतीत होता है। प्रधानमंत्री ने कोविड के संदर्भ में जो निर्णय लिया उसे ही महाराष्ट्र ने अमल में लाया है। अर्थात जावडेकर का दोष न होकर महाराष्ट्र के प्रति द्वेष यह दिल्ली के हर शासक के खून में शामिल होता है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने तो महाराष्ट्र की ‘वैक्सीन’ की उचित मांग ठुकराने का प्रयत्न ही किया व स्वास्थ्य संबंधित गंभीर माहौल में ‘वसूलीबाज’ आदि शब्दों का इस्तेमाल करके राजनीति कितनी ‘गंदी’ पद्धति से की जा रही है, ये दिखा दिया। महाराष्ट्र में वैक्सीन का आपातकाल शुरू हो गया है, जो कि केंद्र के पक्षपाती नीतियों के कारण। भाजपा शासित राज्यों को अधिक-से-अधिक वैक्सीन की खेप पहुंचाई गई है। उत्तर प्रदेश को ४४ लाख डोज, मध्यप्रदेश को ३३ लाख डोज, गुजरात को १६ लाख, कर्नाटक २३ लाख, हरियाणा २४ लाख, झारखंड २० लाख और महाराष्ट्र के हिस्से में रोते हुए किसी तरह १७ लाख डोज आई। महाराष्ट्र की जनसंख्या व कोरोना संक्रमण की तीव्रता सबसे ज्यादा होने के बावजूद केंद्र का यह इस तरह से पक्षपाती बर्ताव मानवता के अनुरूप नहीं है। महाराष्ट्र में इंसान नहीं रहते हैं, क्या ऐसा केंद्र को लगता है? महाराष्ट्र में राजनैतिक उथल-पुथल नहीं कर पाने से वैक्सीन की कृत्रिम कमी निर्माण करके लोगों में असंतोष भड़काना, ऐसी साजिश तो किसी के दिमाग में नहीं पकती होगी ना? मुंबई के ५१ वैक्सीनेशन केंद्र बंद हो गए हैं। राज्य में वैक्सीनेशन बंद हो जाएगा, ऐसी चिंताजनक स्थिति निर्माण हो रही है। ऐसे में विपक्ष से अधिक गंभीरता से बर्ताव करने की अपेक्षा है। महाराष्ट्र की जनता उनकी भी कुछ तो लगती ही है। इसी जनता ने भाजपा को १०५ विधायक दिए हैं। महाराष्ट्र को हर महीने १.६ करोड़ तो सप्ताह में ४० लाख वैक्सीन की डोज की जरूरत है। इससे दिन में ६ लाख वैक्सीनेशन का उद्देश्य पूरा होगा। गुजरात की जनसंख्या महाराष्ट्र से आधी है। परंतु गुजरात को अभी तक एक करोड़ वैक्सीन मिलने के बाद भी वहां कोरोना की स्थिति महाराष्ट्र से गंभीर बनने का आकलन गुजरात हाईकोर्ट ने किया। महाराष्ट्र का मॉडल अपनाओ, ऐसी नसीहत गुजरात हाईकोर्ट ने गुजरात सरकार को दी। कोकण, पश्चिम महाराष्ट्र, मुंबई में वैक्सीन का अभाव है और प्रधानमंत्री मोदी ने ‘वैक्सीन उत्सव’ मनाने का फरमान जारी किया है। इसलिए महाराष्ट्र के भाजपाई नेताओं को दिल्ली जाकर एक करोड़ वैक्सीन का पार्सल लाना चाहिए। राजनैतिक झगड़े हैं परंतु इन झगड़ों में अपने ही लोगों की बलि क्यों ली जाए? महाराष्ट्र की बारह करोड़ जनता ने कभी तो आज के विपक्ष को भी सत्ता पर बैठाया ही होगा। इतनी तो ईमानदारी रखो ‘वैक्सीन’ जनता के लिए है व्यर्थ राजनीति के लिए नहीं, जो ऐसी राजनीति की खुजली हो रही है। उन्हें संभाजी भिड़े के शब्दों में ‘गंदा’ ही कहना होगा।