" /> मोदी नहीं, दीदी ओ दीदी!…जख्मी बाघिन की विजय

मोदी नहीं, दीदी ओ दीदी!…जख्मी बाघिन की विजय

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव का परिणाम आया। तब भी प. बंगाल में क्या होगा, इसी पर सभी का ध्यान था। कारण देश में हाहाकार मचानेवाली महाभयंकर कोरोना महामारी को हराने की बजाय प्रधानमंत्री मोदी सहित पूरी केंद्र सरकार प. बंगाल में ममता बनर्जी व उनकी तृणमूल कांग्रेस को हराने के लिए उतर गई थी। प. बंगाल जीता जा सके, इसके लिए वहां मतदान के ८ चरण लाद दिए गए। लेकिन हुआ क्या? तृणमूल कांग्रेस ने मोदी, शाह सहित पूरी केंद्र सरकार व भाजपा को धूल चटा दिया। प. बंगाल में ममता बनर्जी ने विजय की ‘हैट्रिक’ लगाई। इतना ही नहीं, मोदी-शाह द्वारा खड़े किए गए तूफान को रोकते हुए भाजपा की पारी को सौ के अंदर ही ‘ऑल आउट’ कर दिया। ममता दीदी २ मई के बाद घर जाएंगी, ऐसी अफवाह उड़ाई गई। ‘२ मई दीदी गई’ ऐसा नारा प्रधानमंत्री मोदी सार्वजनिक सभा में लगाते थे। ममता को घर बैठाने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने पैसा, सत्ता व सरकारी मशीनरियों का भरपूर इस्तेमाल किया। फिर भी ममता बनर्जी ने अपनी जिद से विजय हासिल की। यह विजय मतवाले राजनीतिज्ञों के लिए तमाचा है। प. बंगाल के चुनाव का विश्लेषण एक वाक्य में करना हो तो भाजपा हार गई और कोरोना जीत गया। पांच राज्यों में, विशेषत: प. बंगाल के चुनाव में अनियंत्रित भीड़ के कारण देश में कोरोना बढ़ता गया, ऐसा मद्रास हाई कोर्ट का निरीक्षण है। देश में जिस रफ्तार से कोरोना बढ़ा और नुकसान हुआ उसके लिए मद्रास हाई कोर्ट ने निर्वाचन आयोग को जिम्मेदार ठहराया, वह उचित ही है। सिर्फ प. बंगाल जीतना ही है, इस एक ईर्ष्या व द्वेष के साथ ‘मोदी-शाह’ की भाजपा मैदान में उतरी। उन्होंने लाखों की सभा, रोड शो करके कोरोना के सभी नियमों को पैरों तले कुचल डाला और चुनाव खत्म होने के बाद दिल्ली आकर कोरोना निवारण की देवपूजा में लग गए, लेकिन समय हाथ से निकल गया है। इतना करके भी प. बंगाल की जनता ने भाजपा को साफ नकार दिया है। प. बंगाल में ममता को पराजित करने के लिए भाजपा ने क्या नहीं किया? ‘जय श्रीराम’ का नारा लगाने से लेकर ममता को ‘बेगम ममता’ चिढ़ाने तक हिंदू-मुससमान वोटों के ध्रुवीकरण करने के उनके अचूक हथकंडे का प्रयोग भी सफल नहीं हुआ। जहां हिंदुओं के मत अधिक हैं, उस विधानसभा में भी ममता बनर्जी ने विजय हासिल की। इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी बांग्लादेश की भी सैर कर आए। बांग्लादेश के निर्माता शेख मुजीबुर्रहमान को गांधी शांति पुरस्कार घोषित किया और वह उनकी बेटी बांग्लादेश की वर्तमान प्रधानमंत्री शेख हसीना को प्रदान करके भी आए। इसके कारण प. बंगाल के मुसलमानों का वोट मिलेगा, ऐसे कयास उन्होंने लगाए थे लेकिन वैसा हुआ नहीं। ममता बनर्जी की पार्टी में भी तोड़-फोड़ की। फिर भी तृणमूल कांग्रेस ने मोदी-शाह को राजनीति में धूल चटा दिया। यह ऐतिहासिक व सबके लिए प्रेरणादायी है। प. बंगाल की लड़ाई में लेफ्ट और कांग्रेस न के बराबर बची हैं। लेफ्ट की जगह भाजपा ने ले ली। वोटों की संख्या बढ़ गई लेकिन उस अनुपात में सीटें नहीं जीत पाई। भारतीय जनता पार्टी ने कई दिग्गजों को खड़ा किया। केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो से लेकर पत्रकार सपनदास गुप्ता तक। ये सभी धराशाई हो गए। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को अत्यंत स्पष्ट बहुमत मिला। मोदी-शाह ने कृत्रिम बादलों की तरह गड़गड़ाहट की लेकिन जमीन पर लहरें प्रत्यक्ष रूप से ममता बनर्जी की ही थी। २०० से अधिक सीटें जीतकर ममता ने यह साबित कर दिया। प. बंगाल की ममता की जीत मोदी-शाह-नड्डा की करारी हार है और इस हार की नैतिक जिम्मेदारी किसे लेनी चाहिए, ये वो ही तय करें। देश के प्रधानमंत्री व गृहमंत्री किसी चुनाव को अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का विषय बनाते हैं तब जीत-हार का श्रेय उन्हें ही स्वीकारना चाहिए और राजनीति में यही परंपरा है। पांच राज्यों के चुनाव परिणामों के कारण देश में ऐसा होगा, वैसा होगा ऐसी शर्त लगाई गई। लेकिन नया क्या हुआ? असम को छोड़ दें तो भारतीय जनता पार्टी ने सर्वत्र धूल चाटी है। केरल में लेफ्ट ने फिर सत्ता बरकरार रखी। वहां सामना कांग्रेस से हुआ। तमिलनाडु में ‘द्रमुक’ ने सत्ता हासिल की। पुडुचेरी ३० विधायकों की विधानसभा है, वहां भाजपा ने विजय हासिल की। असम में कांग्रेस के अच्छे प्रदर्शन के बाद भी भाजपा ने फिर विजय हासिल की। फिर भाजपा के हाथ में नया क्या लगा? मोदी-शाह के करिश्में का क्या हुआ, वो दक्षिण मतलब केरल-तमिलनाडु में नहीं चला और बंगाल में सांस फूलने तक प्रचार करने के बावजूद सफलता नहीं मिली। केरल में भाजपा ने ८० वर्ष की उम्र पार करनेवाले ‘मेट्रो मैन’ श्रीधरन को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया। वहां भाजपा ५ सीटें भी नहीं जीत सकी। इसका मतलब यह है कि मोदी-शाह की भाजपा के पास चुनाव जीतने का तंत्र और यंत्र होने पर भी वे अपराजेय नहीं और उनकी चिकनी-चुपड़ी बातों पर भोली-भाली जनता विश्वास करेगी ही, ऐसा नहीं है। प. बंगाल की बाघिन ऐन चुनाव के दौरान जख्मी हो गई। उस जख्मी बाघिन ने देश की राजनीति को नई दिशा दी है और प. बंगाल की जनता का जितना अभिनंदन किया जाए, उतना कम ही है। प. बंगाल की जनता धूल के बवंडर में गायब नहीं हुई। कृत्रिम लहरों में नहीं बही। अपनी मिट्टी के लोगों की प्रतिष्ठा के लिए बंगाली जनता दृढ़ता के साथ खड़ी रही। देश को प. बंगाल से सीखना चाहिए, ऐसा प्रसंग हुआ है!