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संपादकीय : ‘जैसे थे’ की राहत!

रिजर्व बैंक के गवर्नर डॉ. शक्तिकांत दास ने शुक्रवार को रिजर्व बैंक की द्विमासिक ऋण नीति की घोषणा की, जिसमें एक बार फिर ब्याज दर को स्थिर रखने का निर्णय लिया गया है। इसलिए रेपो दर चार फीसदी तो रिवर्स रेपो दर ३.३५ फीसदी रहेगी। लगातार ११वीं बार रिजर्व बैंक ने कर्ज नीति की ‘जैसे थी’ वाली नीति को अपनाया है। कोरोना और लॉकडाउन का परिणाम बीते २ वर्षों से देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है इसलिए इस दौर में रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दर के मामले में ‘धीमे कदम’ की नीति अपनाने की ही अपेक्षा थी। फरवरी में रिजर्व बैंक ब्याज दर बदलेगा, ऐसा आर्थिक क्षेत्र के जानकारों को लगा था। परंतु ये सब अनुमान हवाई बुलबुले ही सिद्ध हुए। रिजर्व बैंक ने तब भी मतलब लगातार दसवीं बार ब्याज दर को स्थिर रखा था। अर्थात उस समय यह नीति पिछले पन्ने से आगे जारी रखने के लिए कुछ तत्कालीन वजहें थीं। कोरोना की तीसरी लहर फरवरी में वैसे कम हो गई थी। लॉकडाउन की पाबंदियां भी काफी हद तक शिथिल कर दी गई थीं इसीलिए रिजर्व बैंक ‘जैसे थे’ नीति में बदलाव करेगा, ऐसा अनुमान था। परंतु राजनीतिक स्तर पर स्थिति अलग थी। उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका था। इसलिए ब्याज दर में बदलाव का परिणाम बाजार पर हुआ तो इसका प्रभाव मतदाताओं पर पड़ सकता है, ऐसा केंद्र के सत्ताधारियों को लगा होगा। अत: जिस तरह से र्इंधन दर वृद्धि को रोककर रखा गया था, उसी तरह रिजर्व बैंक की शून्य परिवर्तन नीति को भी आगे बढ़ाया होगा। अब इन चुनावों की धूल नीचे बैठ गई है। पांच में से चार राज्यों में भाजपा की सरकार फिर बन गई है। फलस्वरूप चुनाव के परिणाम के बाद जैसे रोककर रखी गई र्इंधन दर वृद्धि निरंकुश हो गई उसी तरह रिजर्व बैंक की कर्ज नीति में भी बदलाव होगा, ऐसा लगा था। इसके बावजूद लगातार ११वीं बार ब्याज दर को स्थिर रखने का निर्णय रिजर्व बैंक के द्वैमासिक कर्ज नीति समिति ने एकमत से लिया। इस निर्णय के कारण अन्य बैंकों की ब्याज दर में भी बदलाव नहीं होगा। यह आम जनता के लिए निश्चित तौर पर राहत की बात है। हमारे देश में सर्वाधिक गृह कर्ज है। इसलिए रिजर्व बैंक की कर्ज नीति में बदलाव का पहला सीधा परिणाम गृह कर्ज के ब्याज और किश्तों पर होता है। आम जनता की जेब पर बोझ बढ़ता है। रिजर्व बैंक के निर्णय के कारण और कम-से-कम दो महीने तो आम जनता का यह बोझ नहीं बढ़ेगा। कोरोना की तीन लहरों के कारण डांवांडोल हुई हमारी अर्थव्यवस्था अब कहीं थोड़ा स्थिर होती दिख रही है। राज्यों को दी जानेवाली जीएसटी के न्यायाचित वितरण को लेकर केंद्र सरकार का हाथ तंग होगा तब भी जब मार्च, २०२२ में केंद्र की तिजोरी में रिकॉर्ड जीएसटी की वृद्धि हुई। निर्यात को लेकर इसी तरह के रिकॉर्ड का दावा केंद्र सरकार की ओर से किया जा रहा है। अर्थव्यवस्था के ये अच्छे लक्षण हैं। परंतु रूस-यूक्रेन युद्ध का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर परिणाम हुआ है। वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आग लगी है। इसलिए हमारे देश में र्इंधन दर वृद्धि के साथ सभी तरह की महंगाई से आम जनता की कमर टूट गई है। रिजर्व बैंक की ‘जैसे थे’ नीति लगातार ११वीं बार बरकरार रखने के पीछे ये कारण हो सकते हैं। कदाचित इन्हीं परिस्थितियों के कारण ही रिजर्व बैंक २०२२-२३ वर्ष के लिए जीडीपी वृद्धि का अनुमान ७.८ फीसदी से ७.२ फीसदी तक नीचे ले आया है। थोड़े में केंद्र सरकार का दावा कुछ भी होगा, फिर भी न विकास की दर बढ़ेगी, न महंगाई का दावानल कम होगा। जुलाई महीने में महंगाई कम होगी, ऐसा रिजर्व बैंक ने कहा है। ऐसा हुआ तो अच्छा ही है, परंतु नहीं हुआ तो क्या? महंगाई का भयंकर रूप पड़ोसी श्रीलंका में हम देख ही रहे हैं। हमारे देश में ऐसा न हो। आम जनता के समक्ष महंगाई सहन करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होता है। ये सही भी होगा तो रिजर्व बैंक द्वारा फिर ब्याज दर ‘जैसे थे’ रखने से आम जनता के कर्ज की किश्त नहीं बढ़ेगी यह राहत क्या कम हुई?

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