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संपादकीय: बलिदान व्यर्थ ही गया!

शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे हिंदूहृदयसम्राट थे, परंतु वे धर्मांध नहीं थे। एक बार उन्होंने स्पष्ट ही कह दिया, ‘मुझे हिंदुओं को जगाना है, परंतु मुझे हिंदुओं का खुमैनी नहीं बनना है।’ लेकिन बालासाहेब की भ्रष्ट ढंग से नकल करनेवालों को हिंदुओं का ओवैसी बनने की जल्दबाजी लगी है। इतनी जल्दबाजी अच्छी नहीं है, ये उन्हें कौन कहे? इन दोनों ओवैसियों को भारतीय जनता पार्टी ने गोद में बैठाकर २०२४ के चुनाव की तैयारी इनकी मदद से शुरू की है। तैयारी मतलब क्या? तो देश का माहौल स्पष्ट रूप से पूरी तरह बिगाड़ देना। कांग्रेस के शासन में दंगे होते थे, ऐसा आरोप लगातार लगाया जाता है। परंतु मोदी के राज में रामनवमी और हनुमान जयंती के उपलक्ष्य में दंगे कराए जा रहे हैं, उसका क्या? दिल्ली के जहांगीरपुरी क्षेत्र में हनुमान जयंती के उपलक्ष्य में निकाले गए जुलूस पर पत्थरबाजी हुई और उसके बाद दंगे भड़क गए। अब कहा जा रहा है कि जामा मस्जिद परिसर से भारी मात्रा में शस्त्र पकड़े जाने की खबर आ रही है। देशभर में दंगों का तनावपूर्ण माहौल निर्माण होने से कोविड संकट से अभी कहीं बाहर निकले लोगों को नए आर्थिक संकट का सामना करना पड़ेगा। दंगों का परिणाम व्यापार, रोजगार पर होता है। हिंसा, इसी तरह आगजनी के कारण मेहनतकशों का रोजगार डूब जाता है व अब देश उस संकट में कूदता दिख रहा है। भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता संबित पात्रा ने अब ऐसी बुद्धिमत्ता दिखाई है कि ‘बीते ७० वर्षों में खुशामद की जो प्रथा चलाई गई वही देश में दंगों की वजह है।’ भाजपा का यह कहना स्वीकार कर लें तब भी बीते साढ़े सात वर्षों से हिंदुत्ववादियों की सरकार है और मुसलमानों की किसी भी तरह से खुशामद नहीं की जा रही है। परंतु फिर भी अब देश में दंगों का नया धर्मोत्सव चल रहा है? दंगों का नमक दक्षिण के राज्यों में भी पैâल गया है। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा उन ‘दंगे भड़कानेवालों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी’ अथवा ‘लोग शांति रखें’ ऐसी सामान्य अपील भी न करना, इस पर हैरानी होती है। मानो दिल्लीश्वरों को ही ये ‘दंगे’ चाहिए। अब महाराष्ट्र में भोंगे लगाने पर नव हिंदूवादी ओवैसी ने जो विवाद पैदा किया है उस भोंगे को लेकर देश में महाभयंकर महंगाई, बेरोजगारी के आंकड़े घोषित किए जाने चाहिए। महंगाई व बेरोजगारी के आक्रोश को दबाने के लिए ‘भोंगे’ बजाने की खुराफात सूझी है, ऐसा प्रतीत होता है। सरकारी उपेक्षा के कारण कोरोना से ४० लाख लोगों की बलि चढ़ गई, ऐसी जानकारी ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने प्रकाशित की है। उन ४० लाख परिवारों का आज क्या हाल हो रहा होगा? देश के हवाई अड्डों का निजीकरण करके हवाई अड्डा कर्मचारियों की कॉलोनियों व जमीन भी भाजपा के प्रिय उद्योगपतियों को परोसी जा रही है। मुंबई के कालीना परिसर में हजारों एयर इंडिया कर्मचारी अपने घर बचाने के लिए शिवसेना के नेतृत्व में सड़क पर उतरे। भूमिपुत्रों के आशियानों बचाने का कार्य किसी भी भोंगेबाजी के बगैर चल रहा है। लोगों की समस्या रोटी, कपड़ा, मकान, महंगाई, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य है। जातीय धार्मिक तनाव के मुद्दे से ये समस्या महत्वपूर्ण है। देश में जातीय और धार्मिक माहौल बिगाड़कर और लोगों को कानून का उल्लंघन करने के लिए प्रेरित करके नेतागिरी की खारिश मिटानेवालों को एक बात ध्यान रखनी चाहिए कि ऐसे बचकाने व प्रायोजित कार्यक्रमों से कोई हिंदुओं का सम्राट वगैरह नहीं बन सकता है। महाराष्ट्र में दो ओवैसी एक साथ आकर भारतीय जनता पार्टी का गुप्त एजेंडा आगे बढ़ा रहे हैं और केंद्र सरकार यह सब मूक दर्शक बनी देख रही है। अच्छे राजनीतिज्ञों का यह लक्षण नहीं है। अंग्रेजों ने ‘फोड़ो, तोड़ो और राज करो’ ऐसी नीति का पालन किया। देश के शासकों को राज करने के लिए उसी नीति का पालन करना पड़ रहा होगा तो स्वतंत्रता का संग्राम और बलिदान व्यर्थ ही गया। और क्या कहा जाए!

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