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संपादकीय: महंगाई की फांस!

कोरोना जिस तरह हमारा पीछा छोड़ने को तैयार नहीं है, उसी तरह महंगाई भी पीछा छोड़ती नजर नहीं आ रही है। दिनों-दिन महंगाई की फांस मजबूत होती जा रही है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद कीमतों के बढ़ने का सिलसिला शुरू हुआ है। मार्च महीने में महंगाई की दर रिकॉर्ड ब्रेक बढ़ गई है। फरवरी में यह दर १३.११ प्रतिशत थी। मार्च महीने में उसमें १४.५५ फीसदी का उछाल आया। खुदरा महंगाई की दर भी ६.९५ प्रतिशत बढ़ गई है। पिछले १७ महीनों में खुदरा महंगाई की यह सबसे ज्यादा ऊंची दर है। इससे आमजनों की महंगाई ने कमर किस तरह तोड़ी है, यह ध्यान में आता है। केंद्र सरकार के दावे चाहे जो कुछ भी हों, गर्मी की तरह महंगाई भी सामान्य लोगों को झुलसा रही है। यह वास्तविकता है। एक साल पहले महंगाई दर ७.८९ प्रतिशत थी, जो अब दोगुनी हो गई है। खाद्य पदार्थों की थोक महंगाई दर भी बढ़ गई है। पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस के दाम तो रोजाना बढ़ रहे हैं। इससे माल ढुलाई जिस तरह से महंगी हो गई है, उसी तरह यात्री परिवहन भी महंगा हो गया है। माल ढुलाई की दर वृद्धि ने पहले से भड़की महंगाई पर तेल उड़ेल दिया है। बाजार में ऐसी एक भी वस्तु या सेवा नहीं है, जिनकी दरें कुछ प्रतिशत नहीं बढ़ी हैं। कच्चे तेल के साथ ही खाद्य तेलों की कीमतें भी भड़क उठी हैं। सब्जियों और फलों की कीमतें आम जनता की पहुंच से बाहर हो गई हैं। लेकिन पेट में चार निवाले तो जाने ही चाहिए न? इसके लिए जी-जान लगाकर मेहनत करके आम आदमी अपने दिन निकाल रहा है। होटलों में खाद्य पदार्थों की कीमतें भी १५ से २० प्रतिशत बढ़ गई हैं। नींबू की कीमतें इतनी बढ़ गई हैं कि ‘नींबू’ मौजूदा समय में सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है! किसी समय प्याज सामान्य लोगों के साथ राजनेताओं को भी रुलाने के लिए कुप्रसिद्ध था। आज नींबू भी आमजनों की थाली से गायब हो गया है। लाल मिर्ची भी तेवर दिखा रही है। हल्दी ने भी सामन्य लोगों का रंग उड़ा दिया है और दाल के दाम में भी इजाफा हुआ है। भीषण गर्मी में एसी, कूलर, प्रिâज से थोड़ा ठंडे हों, तो उसमें भी १० से १५ प्रतिशत दर वृद्धि हो गई है। इससे रास्ता निकालने के लिए छोटे-बड़े कर्ज निकाले जाएं तो उसमें भी ब्याज दर वृद्धि की अड़चनें निर्माण कर रखी हैं। कुछ दिनों पहले रिजर्व बैंक ने दिशा-निर्देश घोषित करते हुए रेपो दर ‘जैसे थे’ बरकरार रखा था। इससे कर्ज के ब्याज, किश्तें नहीं बढ़ेंगी, महंगाई को ब्रेक लगेगा, ऐसा बताया गया था। लेकिन वैसा कुछ भी नहीं हुआ। स्टेट बैंक द्वारा ‘एमसीएलआर’ दरें बढ़ाने के कारण सभी प्रकार के ऋण महंगे हो गए हैं। अर्थात रिजर्व बैंक द्वारा रेपो दर में बदलाव न करने का जो फायदा कर्जदारों को मिलना चाहिए था, वह अब नहीं मिलेगा। उसमें बताया जा रहा है कि जीएसटी का स्लैब भी ५ फीसदी से बढ़ाकर ८ प्रतिशत करने का प्रस्ताव सरकार के सामने रखा गया है। फिलहाल ऐसा कुछ नहीं है, ऐसा खुलासा सरकार ने किया है। फिर भी कल ऐसा नहीं होगा, इसकी क्या गारंटी? ऐसा हुआ तो सरकार का राजस्व बढ़ेगा लेकिन महंगाई की आग में फंसी आम जनता खुद को नई दर वृद्धि के बुलबुले में उलझा हुआ पाएगी। पहले ही कोरोना महामारी के कारण देश के नागरिकों की प्रति व्यक्ति वार्षिक आय १.२६ लाख से घटकर ९९ हजार हो गई है। उसमें न रुकनेवाली दर वृद्धि के झटके जनता को सहने पड़ रहे हैं। जिन्हें इससे आम जनता को बचाना है वे इस महंगाई के लिए यूक्रेन युद्ध और कच्चे तेल की वैश्विक दर वृद्धि की ओर उंगली दिखाकर अपने हाथ खड़े कर रहे हैं। महंगाई का फंदा कब छूटेगा और खुली सांस कब ली जा सकेगी, यह मौजूदा समय में देश की जनता के जीने-मरने का सवाल है। इसका उत्तर जनता को देना चाहिए। लेकिन इसका जवाब और महंगाई का हल निकालने की बजाय धार्मिक तनाव का ‘क्लोरोफॉर्म’ सुंघाकर जनता को बेहोश करने का प्रयोग शुरू है। इससे आपकी राजनीतिक रोटी तो सेंकी जाएगी लेकिन आम लोगों की रोजी-रोटी का क्या?

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