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संपादकीय : वीर सावरकर

भारतीय जनता पार्टी और उनके मिंधे गुट का वीर सावरकर के प्रति प्रेम अचानक उफन कर बाहर आया, लेकिन उन्हें इस तरह से उफनने का मौका श्री राहुल गांधी ने दिया। ये सब टाला गया होता तो अच्छा होता। ‘भारत जोड़ो’ यात्रा महाराष्ट्र में पहुंचते ही राहुल गांधी का भव्य स्वागत हुआ। जनता का भरपूर प्रतिसाद मिला। यह सब अच्छी तरह से चल रहा था। इसी बीच राहुल गांधी को सावरकर के कथित माफी का मसला उठाकर भाजपा और मिंधे गुट के हाथ में मुद्दा देने की जरूरत नहीं थी, ये सच है। इसलिए नकली हिंदुत्ववादियों को सावरकर प्रेम की हिचकियां आने लगीं। राहुल गांधी और उनके बयान की खबर लेने के लिए मिंधे गुट के लोग कुछ स्थानों पर सड़क पर उतरे। हालांकि पुणे में इन लोगों द्वारा राहुल गांधी को छोड़कर सावरकर को ही जूते मारने की तस्वीर सामने आई। सावरकर का अपमान राहुल गांधी ने किया और उसका विरोध किया जाना चाहिए। लेकिन विरोध करने के लिए जिन्हें सड़क पर उतारा उन्हें राहुल और सावरकर का फर्क समझ में नहीं आया। ऐसी एक तरह की हिंदुत्व की गड़बड़ी सरकार में दिखाई दे रही है। वीर सावरकर अंडमान के काला पानी से अंग्रेजों से माफी मांगकर छूटे या प्रâांस में मारिया बोट से कूदकर बाहर निकले, यह राहुल गांधी के ‘भारत जोड़ो’ यात्रा का मुद्दा नहीं था। देश में नफरत, द्वेष का पैâलता जहर, महंगाई, बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर लोगों को जागरूक करने के लिए राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो’ यात्रा कन्याकुमारी से शुरू हुई है। राहुल गांधी रोजाना तकरीबन १५ किमी चलते हैं और उनके साथ बड़ी संख्या में लोग चलते रहते हैं। राहुल गांधी की जो छवि पिछले कुछ वर्षों में भाजपा ने तैयार की है, उसे भेदनेवाली उनकी यह ‘भारत जोड़ो’ यात्रा है। भारतीय जनता पार्टी चाहे जितना नहीं-नहीं कहे, फिर भी ‘भारत जोड़ो’ यात्रा की दखल उन्हें लेनी पड़ रही है। राहुल गांधी का श्रम, कष्ट उसके पीछे है; लेकिन अचानक वीर सावरकर के नाम से उनका मन अस्थिर हो जाता है और सभी किए धरे पर पानी फिर जाता है, ऐसा क्यों हो? महाराष्ट्र में आकर सावरकर की कथित माफी मामला का कोयला घिसने से राज्य के कांग्रेस नेताओं की भी हालत बिगड़ गई होगी। राहुल गांधी ने हिंगोली में बयान दिया, ‘सावरकर अंग्रेजों से पेंशन लेते थे। कांग्रेस के विरोध में सावरकर अंग्रेजों के साथ काम करते थे।’ इसके अलावा, ‘मुझे आजाद करो, मैं बाहर आते ही आपके आज्ञाकारी सेवक की तरह काम करूंगा,’ ऐसा भी सावरकर की याचिका में उल्लेख होने की बात राहुल गांधी ने कही और उससे संबंधित दस्तावेज पत्रकारों के सामने लहराए। इसकी जरूरत नहीं थी, लेकिन राहुल गांधी को यह कौन बताए? सावरकर देश के सशस्त्र क्रांतिकारियों के शिरोमणि थे। नासिक के जैक्शन वध मुकदमे के वे मुख्य आरोपी थे। ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ फेंकने के लिए सशस्त्र क्रांतिकारी तैयार करने का काम सावरकर ने किया। सावरकर से ब्रिटिशों को डर लगता था इसीलिए उन्हें तकरीबन ५० वर्ष काला पानी की सजा सुनाकर अंडमान भेज दिया गया। इतनी भयानक सजा सुनाए गए इस भारत माता के वे एकमात्र सपूत थे। अंडमान में सावरकर ने दस वर्ष की यातनामय सजा भोगी। इस कालावधि में उन्होंने पांच बार ब्रिटिश सरकार के पास दया याचिका की और इसमें कुछ गलत है, ऐसा नहीं लगता। जेल में सड़कर मरने से बेहतर है बाहर निकलकर रुके हुए क्रांति कार्य को आगे बढ़ाएं, ऐसा उन्हें लगा होगा। इधर बाहर महात्मा गांधी खुद उनकी रिहाई के लिए प्रयास कर रहे थे। सावरकर द्वारा उन दिनों की ब्रिटिश सरकार के पास दया याचिका दायर करने में कोई हर्ज नहीं है, ऐसी महात्मा गांधी की भी राय थी। निर्णय लेने का अधिकार सरकार के पास होता है। इसलिए सावरकर ने सरकार के पास याचिका दायर की। सावरकर की छह दया याचिकाएं सरकार ने ठुकरा दीं। यह भी उतना ही सत्य है। नियमों व शर्तों पर आगे सावरकर की रिहाई हुई तब भी ब्रिटिशों की उन पर कड़ी नजर थी। सावरकर आजीविका के लिए सरकार से जो पेंशन लेते थे, वह बेहद ही टुटपुंजी थी। इस पर स्वतंत्र रूप से बोला जा सकता है; लेकिन ब्रिटिश साम्राज्य की नींव को जितना महात्मा गांधी के अहिंसक आंदोलन ने हिलाया, उतना ही वह सावरकर जैसे क्रांतिकारियों के संघर्ष के कारण भी उखड़ी। महात्मा गांधी को भी इसकी कल्पना थी। ५० वर्ष की सजा सुनाए जाते ही ‘तब तक तुम्हारी सत्ता रहेगी क्या?’ ऐसा भेदक सवाल पूछकर बेड़ियों में जकड़े सावरकर अंडमान की ओर निकली नौका में चढ़े। क्या वह आत्मविश्वास! ये सब इतिहास में दर्ज है, लेकिन दिखाई देता है कि इस समय सभी इतिहास के बैरी बन गए हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा का आजादी की लड़ाई से तिल मात्र भी संबंध नहीं था। वैसे ही सावरकर की विचारधारा के भी नहीं थे। सावरकर की हिंदू महासभा से तो ये लोग द्वेष रखते थे। इसलिए सावरकर का नाम लेकर राजनीति करने के धंधे वे बंद करें। मिंधे गुट के लोग तो राहुल गांधी समझकर वीर सावरकर को ही सड़क पर जूते मार रहे हैं। ऐसे ये अक्ल के शत्रु शिवसेना को हिंदुत्व और सावरकर का विचार समझाने निकले हैं। पिछले ८ वर्षों से केंद्र में भाजपा की सरकार है। लेकिन वीर सावरकर को ‘भारतरत्न’ देने की मांग शिवसेना करती है तो ये लोग बहरे होने की भूमिका अपनाते हैं। इसे ढोंग न कहा जाए तो क्या कहा जाए? वीर सावरकर का सम्मान हो, ऐसा एक भी काम फडणवीस-मोदी ने नहीं किया। राहुल गांधी द्वारा सावरकर की माफी का मुद्दा उठाते ही भाजपावालों के विरोध के नाग बिल से बाहर निकलते हैं और फुंफकार मारते हैं। लेकिन यह अवसर इन नागों को राहुल गांधी बार-बार क्यों देते हैं, ये संशोधन का विषय है! राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो’ यात्रा देश में पैâल रही तिरस्कार व द्वेष की राजनीति के विरोध में है। लेकिन वीर सावरकर जैसे स्वतंत्रता वीरों के मामले में राहुल गांधी के मन में कूटकर भरा तिरस्कार पहले नष्ट होना चाहिए। महाराष्ट्र वीर सावरकर को मानता और आदर करता है। उनके पराक्रम का सम्मान करता है और करता रहेगा!

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