मुख्यपृष्ठनए समाचारसामना संपादकीय : साहित्य सम्मेलन की हुंकार!

सामना संपादकीय : साहित्य सम्मेलन की हुंकार!

साहित्य सम्मेलन मतलब ‘विवाद’ ऐसा समीकरण ही बीते कुछ वर्षों में तय हो गया है। परंतु मराठवाड़ा के उदगीर में संपन्न हुए ९५वें अ.भा. मराठी साहित्य सम्मेलन में यह सोच गलत साबित हुई। इस बारे में महाराष्ट्र की साहित्य प्रेमी जनता को साहित्य महामंडल और सम्मेलन के आयोजकों का आभार ही मानना चाहिए। मराठी साहित्य, विविध तरह साहित्य और कुल मिलाकर वाचन संस्कृति से वर्तमान पीढ़ी दूर जा रही है। घर के दीवानखाने में पंखे के नीचे अथवा कूलर की ठंडी हवा में बैठकर भी साहित्य पढ़ने को कोई तैयार नहीं होगा, ऐसा यह वर्तमान दौर है। लेकिन ऐसे हालात में भी उष्णता की लहरों से जल रहे मराठवाड़ा में चिलचिलाती धूप के बावजूद साहित्य शारदा का यह तीन दिवसीय महोत्सव शान से संपन्न हुआ। इसे आयोजकों की बड़ी सफलता ही कहा जाना चाहिए। सालों की परंपरा के अनुसार ही ग्रंथ यात्रा से समापन तक सम्मेलन में कार्यक्रमों की भरमार और रेलपेल थी। ‘मराठी को अभिजात भाषा का दर्जा देने का केंद्र के पास विचाराधीन पड़ा प्रस्ताव तुरंत मंजूर किया जाए’, ऐसा एकमुखी प्रस्ताव इस सम्मेलन में मंजूर किया गया। मराठी का उत्पीड़न करनेवाली कर्नाटक सरकार और छत्रपति शिवाजी महाराज के संबंध में विकृत लेख लिखनेवाले जेम्स लेन तथा तत्सम प्रवृत्ति का निषेध करनेवाला प्रस्ताव भी सम्मेलन में पारित किया गया। परंतु सर्वाधिक चर्चा हुई वरिष्ठ नेता शरद पवार द्वारा उद्घाटन के मौके पर दिए गए भाषण तथा भारत सासणे के अध्यक्षीय भाषण की। ‘फिलहाल तयशुदा विचारधारा के साहित्यों के निर्माण पर कुछ घटक जोर दे रहे हैं। लोकतंत्र के लिए यह खतरे की घंटी है। साहित्यकारों को किसी भी विचारधारा से बंधा नहीं होना चाहिए क्योंकि इस तरह से बंधे होने से बुद्धिभेद करनेवाली, ध्रुवीकरण करनेवाली जहरीले स्वरूप की मत प्रणाली तैयार होती है। इस तरह के प्रचार की प्रचारक साहित्य निर्मिती अराजकता को निमंत्रण देते हुए और उससे निरंकुश प्रवृत्ति को बलवान बनाती है।’ ऐसा स्पष्ट भाषण शरद पवार ने दिया। बीते करीब आठ वर्षों में देशभर में ध्रुवीकरण का विष योजनाबद्ध ढंग से रोपा जा रहा है। शिक्षा, पाठ्यक्रम, साहित्य, कला सहित सभी क्षेत्रों में जहर पैâलाया जा रहा है। संशोधन के नाम पर सुनी-सुनाई एवं बेबुनियाद जानकारी के आधार पर लेखन करके वाद-विवाद निर्माण किया जा रहा है, ऐसी प्रवृत्ति पर तथा प्रचारक साहित्यों का निर्माण करनेवालों पर शरद पवार ने चाबुक चलाया होगा तो इसमें गलत क्या है? पवार की तरह ही सम्मेलन के अध्यक्ष भारत सासणे ने भी संयमित भाषा में वर्तमान व्यवस्था पर चाबुक चलाया। साहित्य निर्माण, सख्त लेखनी, जाति और गोत्र देखकर लेखन, वाचन करने की प्रवृत्ति के संबंध में तो सासणे ने अपने विचार प्रभावी ढंग से व्यक्त किए ही परंतु देश की राजनीतिक व्यवस्था पर भी तीखी टिप्पणी करने से वे नहीं हिचकिचाए। ‘फिलहाल हम भ्रम युग में जी रहे हैं। इस युग में सामान्य जनता भ्रमित और सम्मोहित हो गई है। ऐसे हालात में साहित्यकारों को निर्भीकतापूर्वक सत्य कहने का साहस दिखाना ही चाहिए।’ ऐसा आग्रह सासणे ने अपने भाषण में किया। अब देशवासियों पर सम्मोहन का अस्त्र निश्चित तौर पर कौन छोड़ रहा है, भ्रामक युग की सैर कौन रच रहा है और देश की आम जनता को भ्रमित करने का काम कौन कर रहा है, यह इस वक्त कहने की आवश्यकता नहीं है। कोरोना काल में ‘थालीनाद’ करने का जो ढकोसला जनता पर थोपा गया वह ‘निर्बुद्धिपन’ था, यह सम्मेलन के मंच से सार्वजनिक तौर पर कहने का साहस भारत सासणे ने दिखाया। साहित्य सम्मेलन के मंच से वरिष्ठ नेता शरद पवार और सम्मेलनाध्यक्ष भारत सासणे ने ध्रुवीकरण के बीज बोनेवाले तथा सम्मोहन के शस्त्र चलाकर भ्रम निर्माण करनेवाली राज व्यवस्था का जबरदस्त कान खींचा। साहित्य सम्मेलन से उठी यह हुंकार एक तरह से देश की आम जनता की ही भावना है। ‘जनता’ की सुने बगैर सिर्फ ‘मन’ की ही सुनानेवाला ‘सम्मोहक’ के कान तक यह हुंकार पहुंची तो उदगीर साहित्य सम्मेलन सार्थक हो जाएगा, ऐसा कहना होगा!

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