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संपादकीय: इससे आग ही भड़केगी!

प्रधानमंत्री मोदी व उनकी पार्टी मतलब एक अजीब रसायन है। देशभर में कोरोना का संक्रमण बढ़ रहा है। इससे चौथी लहर आएगी क्या, इस चिंता में प्रधानमंत्री मोदी ने सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों से चर्चा की यह सराहनीय है। कोरोना प्रतिबंधक टीका, ऑक्सीजन की उपलब्धता, अस्पतालों की तैयारी का जायजा लिया। यह सब ठीक होगा, फिर भी इस कोरोना मीटिंग का मूल उद्देश्य अलग ही था। गैर भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को ‘ताना’ मारना यही चर्चा का मकसद था। क्योंकि र्इंधन के दाम को लेकर बैठक में विवाद की चिंगारी भड़क उठी। पेट्रोल-डीजल के दाम सौ के पार पहुंच गए हैं। कांग्रेस के शासन में पेट्रोल ७० रुपए लीटर हुआ तो भाजपा हंगामा करते हुए महंगाई के खिलाफ सड़क पर उतर आई थी। गुजरात के मुख्यमंत्री रहे श्री मोदी तब ‘प्रधानमंत्री महंगाई पर बोलते क्यों नहीं? वे चुप क्यों हैं?’ ऐसे सवालों की बौछार करते थे। अब मोदी मंत्रिमंडल के सदस्य महंगाई का समर्थन करते हैं और मोदी क्या पेट्रोल-डीजल के दाम करने के लिए प्रधानमंत्री बने हैं? ऐसा उल्टा सवाल पूछते हैं। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि एक वैश्विक समस्या है, ऐसा प्रधानमंत्री का कहना है। रूस-यूक्रेन युद्ध का यह परिणाम है, ये स्वीकार है। परंतु मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहने के दौरान भी पेट्रोल-डीजल आज की ही तरह वैश्विक समस्या थी। मोदी ने ‘कोरोना’ की चर्चा में र्इंधन दर वृद्धि का मुद्दा उठाया। विपक्षी दलों की सरकार वाले राज्यों में पेट्रोल और डीजल पर से ‘वैट’ कम किया जाए, ऐसा प्रधानमंत्री ने सुझाव दिया। यह अपनी जिम्मेदारी दूसरों पर डालने का प्रयास है। मोदी हर मामले में राज्यों को जिम्मेदार ठहराते हैं। फिर केंद्र सरकार सिर्फ सत्ता का उपभोग करने के लिए बैठी है क्या? पेट्रोल-डीजल की दर वृद्धि, कोयले की कमी, ऑक्सीजन का अभाव इन सब चीजों के लिए उन्होंने राज्यों को ही जिम्मेदार ठहराया। फिर केंद्र क्या सिर्फ घंटा बजाने के लिए बैठा है। मोदी सरकार ने आठ साल में पेट्रोल-डीजल के माध्यम से २६ लाख करोड़ जमा किए हैं। मनमोहन के काल में कच्चा तेल १४० डॉलर प्रति बैरल था। फिर भी पेट्रोल ७५ रुपए से ज्यादा नहीं भड़का था। मोदी सरकार ३० से १०० डॉलर भाव में कच्चा तेल खरीद रही है लेकिन फिर भी र्इंधन १०० के पार पहुंच गया है। उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों के चुनाव में परेशानी होगी, इसका एहसास होते ही मोदी ने पांच रुपए कम किए परंतु चुनाव में जीत मिलते ही फिर दस रुपयों की भारी वृद्धि कर दी। अब सवाल है महाराष्ट्र जैसे राज्य का। मुख्यमंत्री ठाकरे ने मोदी की एकतरफा चर्चा के बाद जैसे का तैसा जवाब दिया। केंद्र को महाराष्ट्र पर अन्याय बंद करना चाहिए। देश के सकल कर में महाराष्ट्र का हिस्सा ३८.३ फीसदी है, परंतु कर की केवल ५.५ फीसदी रकम ही वापस मिलती है। देश को सर्वाधिक राजस्व महाराष्ट्र ही देता है। फिर भी राज्य के अधिकार की जीएसटी का बकाया २६ हजार ५०० करोड़ रुपए केंद्र सरकार दे नहीं रही है। जिन राज्यों में भाजपा के मुख्यमंत्री नहीं हैं उन राज्यों से केंद्र की मोदी सरकार बैर वाला बर्ताव कर रही है। पैर में पैर फंसाकर बाधा निर्माण की जा रही है। ममता बनर्जी ने भी मोदी के बर्ताव पर आक्रोश व्यक्त किया। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा दिया गया बयान एकतरफा और गुमराह करनेवाला है। बैठक में चर्चा एकतरफा ही थी। मुख्यमंत्रियों को अपने विचार व्यक्त करने का मौका ही नहीं दिया गया। ममता कहती हैं कोरोना की परिस्थिति का जायजा लेने के लिए मीटिंग का आयोजन किया गया था। परंतु प्रधानमंत्री र्इंधन दर वृद्धि पर क्यों बोलते रहे? मोदी को इसे टालना चाहिए था। प. बंगाल ने बीते तीन वर्षों में र्इंधन दर वृद्धि को नियंत्रित रखने के लिए १५०० करोड़ रुपए खर्च किए। यह केंद्र को दिखाई नहीं देता है क्या? ममता का यह सवाल लाजवाब है। केंद्र की सरकार हर स्तर पर नाकाम सिद्ध हो रही है। खरीदा गया बहुमत मतलब सुशासन नहीं। देश राम भरोसे व भोंगे के भरोसे चल रहा है। महंगाई, कोरोना, बेरोजगारी पर से ध्यान भटकाने के लिए प्रधानमंत्री विवादित विषयों को हवा देते हैं। ये अच्छे संकेत नहीं हैं। आप महाराष्ट्र जैसे राज्य पर महंगाई का ठीकरा फोड़ते हैं, फिर केंद्र सरकार क्या कर रही है? यह सवाल उठता ही है। पिछली बार कोरोना संक्रमण की जिम्मेदारी महाराष्ट्र पर डालकर प्रधानमंत्री छिपे रहने की कोशिश कर रहे थे। इससे केंद्र व राज्य के बीच संघर्ष की आग भड़केगी ही। मोदी को यही चाहिए!

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