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संपादकीय : कहां खालिस्तान कहां दाऊद!

पंजाब जैसे सीमावर्ती राज्य में अस्थिरता और अशांति पैâलना देशहित में नहीं है। पिछले कई दिनों से वहां घट रही घटनाएं चिंताजनक हैं। पंजाब में ‘आप’ की सरकार आने के बाद से आतंकवाद ने सिर उठाना शुरू कर दिया है। खालिस्तान के झंडे वहां लहराना यह तस्वीर अच्छी नहीं है। मंगलवार को पंजाब के मोहाली में पंजाब पुलिस के गुप्तचर कार्यालय के बाहर बम विस्फोट हुआ। उससे पहले सोमवार को पंजाब पुलिस की इंटेलिजेंस यूनिट के मुख्यालय पर बम फेंका गया। इसी बीच हिमाचल प्रदेश के शिमला में भी खालिस्तानी झंडे लहराते नजर आए। पंजाब में जो कुछ हो रहा है, उस तरफ प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को गंभीरता से देखना चाहिए। राज्य में सरकार किसी की भी हो, राष्ट्रीय सुरक्षा और अखंडता के मामले में किसी प्रकार की राजनीति नहीं होनी चाहिए। मोदी-शाह की देशभक्ति और उद्देश्य के बारे में संदेह करने की कोई वजह नहीं है। लेकिन कई बार इन सब पर राजनीतिक प्रतिशोध की भावना हावी हो जाती है। पंजाब में एक समय खालिस्तान के नाम पर खून की नदियां बही थीं। देश को बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी। कई पुलिस अधिकारी, प्रशासनिक अधिकारी, सेना अधिकारी, पत्रकार, जनता को दिनदहाड़े मार दिया गया था। इंदिरा गांधी, जनरल अरुण कुमार वैद्य, मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या हुई। पंजाब की भूमि से खत्म हुए खालिस्तानवाद को फिर कौन हवा दे रहा है? इसके पीछे किसका हाथ है? पंजाब की बागडोर इस समय अनुभवहीन लोगों के हाथ में है। उसका लाभ कल तक बिल में छुपे बैठे खालिस्तानवादी उठा रहे होंगे। इसी अवधि में पंजाब में ‘ड्रोन’ के माध्यम से खालिस्तान के समर्थन में पर्चे गिराए गए और जगह-जगह पर इस मामले में गुप्त गतिविधियां शुरू हुई हैं। नशे और मादक पदार्थों के चंगुल में पंजाब के युवा फंस गए हैं और इसके पीछे भी पाकिस्तान-चीन का हाथ है। एक समय देश के सुरक्षा दल में सिखों की सहभागिता सर्वाधिक थी। सेना में भर्ती होने के लिए पंजाब के गांव-गांव से युवाओं के जत्थे भर्ती केंद्रों पर इकट्ठा होते थे। आज इन युवाओं को नशे की लत लगाना दुर्भाग्यपूर्ण है और उनके दिमाग में अब खालिस्तान का कीड़ा छोड़ा जा रहा है। आतंकवादियों की गोलियों के जो लोग शिकार हुए उनके रिश्तेदार पंजाब में आज भी हैं। यह सब देखकर उन्हें क्या लगता होगा? जिस पंजाब में महाराजा रणजीत सिंह ने एक समय अंग्रेजों से लड़कर हिंदुस्थान को आजादी दिलाई, उसी पंजाब में हिंदुस्थान से शत्रुता करनेवाले लोग वैâसे पैदा हो सकते हैं? उन्हें चीन और पाकिस्तान सभी प्रकार की सहायता कर रहे हैं, इसे मान लें तो फिर हमारी दिल्ली की सरकार उस पर क्या कार्रवाई कर रही है? कनाडा अभी भी खालिस्तानवाद का केंद्र है। उसी तरह लंदन और अमेरिका में भी है। वहीं से सभी बागडोर संभाली जा रही है। किसानों का आंदोलन हुआ उसमें पंजाब के सिख किसान सबसे आगे थे। ये सिख यानी खालिस्तानी हैं और उन्हें खालिस्तानवादियों से वित्तीय सहायता मिल रही है, ऐसी बयानबाजी भाजपा के नेता कर रहे थे। प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री शाह को ऐसी बकवासबाजी करनेवालों को समय पर ही रोकना चाहिए था। सिखों को खालिस्तानी बताकर किसानों के आंदोलन को बदनाम किया लेकिन उससे सिख समाज में एक फूट पड़ी इसका भी खयाल शासकों ने नहीं रखा। सिखों को खालिस्तानी और मुसलमानों को दाऊद का गुर्गा कहकर चिढ़ाना, इससे राजनेता कब बाहर आएंगे? इंदिरा गांधी ने खालिस्तानी नेता भिंडरावाला को स्वर्ण मंदिर में घुसकर मारा। तब कहां खालिस्तान वादियों का आक्रोश शांत हुआ। पाकिस्तान में घुसकर दाऊद को मारने की हिम्मत क्या अब के शासक दिखाएंगे? यह उनके लिए संभव नहीं। इसके विपरीत उनकी आंखों के सामने खालिस्तान का भूत जिंदा हो गया है। यदि कोई अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए इन गड़े मुर्दों को उखाड़ रहा है तो यह राष्ट्रद्रोह ही है! पंजाब में विधानसभा चुनाव जीत नहीं सके इसलिए ऐसे लोग क्या खालिस्तानी भूत को जिंदा करके लोकसभा चुनाव जीतने की कोशिश कर रहे हैं? यह भी एक संदेह है। मुंबई-महाराष्ट्र में दाऊद के नाम पर छापे का अभियान शुरू हो गया है। कहां दाऊद, कहां खालिस्तान, फिलहाल इसी में मौजूदा राजनीति उलझी हुई है। इससे बुनियादी सवालों से भटक जाते हैं। पूरा देश खालिस्तान और दाऊद के चंगुल में होगा तो यह केंद्र सरकार की असफलता है। जब तक जनता का दिमाग ठिकाने पर नहीं आता तब तक वे इस विफलता को राष्ट्रवाद मानते रहेंगे!

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