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संपादकीय : गरजेगा वो बरसेगा क्या?

मानसून के संबंध में मौसम विभाग द्वारा व्यक्त किया गया अनुमान इस बार पूरी तरह से गलत साबित हुआ है। मौसम चक्र के अनुसार मानसून के पहले महीने का पहला पखवाड़ा खत्म हो गया है। परंतु अभी भी बारिश को मूसलाधार कहा जाए, ऐसा आगमन नहीं हुआ है। मानसून में देरी से राज्य के किसान और नागरिक तो चिंतित हैं ही, इसके अलावा प्रशासनिक तंत्र भी चिंता में पड़ गया है। असल में इस वर्ष मानसून का आगमन समय पर या कदाचित समय से पहले होगा, ऐसा पूर्वानुमान मौसम विभाग ने व्यक्त किया था। प्रारंभिक अनुमान के अनुसार २०-२५ मई से महाराष्ट्र में बरसात शुरू होगी, ऐसी अटकलें लगाई गई थीं। परंतु अब जून महीने का तीसरा सप्ताह खत्म हो गया है, फिर भी भारी बरसात का ठिकाना नहीं है। राज्य के कुछ हिस्सों में पहले मानसून पूर्व और बीते सप्ताह भर में मानसून की छिटपुट बौछार बरसी। परंतु मृग नक्षत्र में तेज हवाओं के साथ गरजते हुए आनेवाली तूफानी बारिश राज्य के सभी हिस्सों में अभी तक देखने को नहीं मिली है। जून से सितंबर, इन चार महीनों की कालावधि में देशभर में औसतन ८८० मिलीमीटर बारिश होती है। परंतु इस साल बरसात अच्छी होने से ९०७ मिलीमीटर बारिश होगी, ऐसा अनुमान मौसम विभाग ने अप्रैल महीने में ही व्यक्त किया था। लेकिन जून का पहला पखवाड़ा लगभग सूखा बीतने से मौसम विभाग का अतिरिक्त बारिश का अनुमान कितना सही सिद्ध होगा, इस पर अब आशंका हो रही है। आमतौर पर १ जून के आसपास केरल में दाखिल होनेवाला मानसून इस साल २९ मई को दाखिल होने से मौसम विभाग ने मानसून के संदर्भ में दूसरा अनुमान जाहिर किया। देश में ९६ से १०४ फीसदी बारिश होगी और सर्वाधिक कृषि वाले हिंदुस्थान के मध्य भाग में बारिश सामान्य रहेगी, ऐसा मौसम विभाग ने कहा था। किंतु निस्तेज हुए मानसून को देखते हुए यह अनुमान भी सही सिद्ध होगा तो किस आधार पर? मानसून अंडमान में आया… वहां से आगे बढ़ा… केरल में दाखिल हुआ… कर्नाटक से कोकण की सीमा तक आया… ऐसी खबरें मौसम विभाग के हवाले से आती रहीं। १० जून को कोकण के प्रवेश द्वार से महाराष्ट्र पहुंची बारिश तुरंत मुंबई, पुणे पहुंच गई और १३ जून को मध्य महाराष्ट्र, मराठवाड़ा और आधे महाराष्ट्र को घेरते हुए विदर्भ के लिए कूच कर गई, ऐसा कहा गया। मानसून महाराष्ट्र में पहुंचा यह सत्य होगा फिर भी अभी तक कहा जाए उस तरह से वह सक्रिय नहीं हुआ है। कभी इस जिले में तो कभी उस जिले में हल्की बौछारें जरूर गिरीं, परंतु कहीं भी भारी बारिश नहीं हुई। जून के पहले पखवाड़े में वैसे भी भारी बारिश होती है। परंतु इस बार इन १५ दिनों में कोकण क्षेत्र में औसत से ५८ फीसदी कम, मध्य महाराष्ट्र में ५६ फीसदी, मराठवाड़ा में ३१ फीसदी तो विदर्भ में ७१ फीसदी बारिश कम हुई। बरसात के लिए जरूरी कम दबाव का क्षेत्र और चक्रवाती हवाओं के अभाव के कारण समुद्र से भूप्रदेश की ओर दौड़नेवाले बादलों की गति मंद पड़ने से बरसात का प्रमाण कम हो गया, ऐसा जानकार कह रहे हैं। यह सही भी होगा परंतु मौसम विभाग द्वारा पूर्व में व्यक्त किए गए अनुमान का क्या? बरसात की हल्की बौछारों से जमीन थोड़ी-बहुत नम हुई होगी फिर भी जमीन की प्यास अभी बुझी नहीं है। इसके लिए ८० से १०० मिलीमीटर बारिश हुए बगैर किसान बुआई न करें, अन्यथा दोबारा बुआई का संकट टूट सकता है, ऐसी सलाह अब किसानों को दी जा रही है। किसानों का नुकसान टालने के लिए यह चेतावनी ठीक होगी फिर भी पाश्चात्य देशों की तरह हमारे यहां मौसम का अनुमान अभी भी अचूक क्यों सिद्ध नहीं होता है, यह सवाल ही है। इस साल बारिश अच्छी होगी और जून से ही जोरदार बारिश का प्रहार शुरू होगा, ऐसा मौसम विभाग का अनुमान ‘हवाबाण’ सिद्ध हुआ है। मानसून आया और सक्रिय हुआ लेकिन यह बारिश निश्चित तौर पर गई कहां? बारिश का पहला पखवाड़ा लगभग सूखा ही गया। मौसम विभाग की भविष्यवाणी की गर्जना खूब हुई। आकाश में छा कर आनेवाले घनघोर मेघों की गर्जना कान में पड़ती परंतु बारिश बिल्कुल भी नहीं गिर रही है। प्यासी धरती को और व्याकुल हुए किसानों के मन में अब एक ही सवाल उठ रहा है, गरजेगा वह सचमुच बरसेगा क्या?

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