" /> ऐरो-गैरों की सरकार!

ऐरो-गैरों की सरकार!

रावसाहेब दानवे ने गंवई बयान दिया है कि सरकार चलाना ऐरो-गैरों का काम नहीं है। दानवे केंद्र में मंत्री हैं इसलिए उनके इस बयान को राष्ट्रीय स्तर पर समझा जाना चाहिए, क्योंकि भूख और कुपोषण के मामले में हिंदुस्थान की स्थिति अत्यंत गंभीर है। एक तरफ हम पांच ट्रिलियन अर्थव्यवस्था का नगाड़ा बजा रहे हैं, दूसरी तरफ देश की १४ से १५ प्रतिशत जनसंख्या पेट भर अन्न तक नहीं पा रही है। भूख के मामले में गंभीर परिस्थिति वाले देशों की सूची में हिंदुस्थान का नाम शामिल होना, मोदी सरकार की प्रतिष्ठा की हानि और देश की शोकांतिका है। धक्कादायक बात यह है कि कुपोषण के संदर्भ में पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यांमार जैसे देशों से भी हम मात खा चुके हैं अर्थात इन देशों की स्थिति हिंदुस्थान से अच्छी है। १०७ देशों की सूची में हिंदुस्थान ९४वें क्रमांक पर है। पाकिस्तान ८८, बांग्लादेश ७१ और म्यांमार ७८वें क्रमांक पर है। नेपाल, चीन और श्रीलंका का हमसे अच्छा चल रहा है। यह सब क्यों होता है? इसका उत्तर मोदी सरकार के मंत्री रावसाहेब दानवे ने एक झटके में दे डाला। सरकार चलाना ऐरे-गैरों का काम नहीं है। यही त्रिवार सत्य है। देश में भूख, गरीबी और कुपोषण की स्थिति गंभीर हो गई होगी तो जन-तारणहार मोदी सरकार क्या कर रही है? हिंदुस्थान में १४-१५ प्रतिशत कुपोषित हैं। इसका मतलब यह हुआ कि और २५ से ३० प्रतिशत लोग आधे पेट हैं। जीने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इस सत्य को स्वीकारना होगा। प्रदीर्घ कुपोषण के कारण बच्चों की ऊंचाई रुकती है इसलिए उनकी ऊंचाई उम्र की तुलना में कम होती है। ऐसे बच्चों की संख्या हिंदुस्थान में ३७.४ प्रतिशत है। कुपोषण के शिकारों की संख्या बढ़ रही है। बेरोजगारी और भूख के कारण आत्महत्या की घटनाएं भी बढ़ रही हैं। वैश्विक स्तर के विशेषज्ञों ने हिंदुस्थान में इस स्थिति के लिए दर्जेदार व्यवस्था-प्रक्रिया व देखरेख के अभाव, कुपोषण की समस्या को हल करने के प्रति उदासीन दृष्टिकोण और बड़े राज्यों के असमाधानकारक कार्य को प्रमुख कारण बताया है। यह सीधे-सीधे केंद्र की अकार्यक्षमता पर मुहर है। सरकार चलाना अर्थात विद्वेष पैâलाना नहीं। कोई भूख और बेरोजगारी का मुद्दा उठाता होगा तो उसे उत्तर देने के लिए हिंदू-मुसलमान, हिंदुस्थान-पाकिस्तान जैसे मुद्दों का मृदंग बजाया जाता है। नोटबंदी और जीएसटी ने देश की आर्थिक शक्ति को कमजोर किया है। लोगों ने रोजगार गंवा दिया। लेकिन उन बेरोजगारों के हाथों में काम देने के बदले सर्जिकल स्ट्राइक और राफेल जैसे मुद्दों को बाजार में लाकर चर्चा करवाना, यही देश की बढ़ती हुई भूख और अराजकता के लक्षण हैं। देश की गंभीर समस्याओं के बारे में मतभेद दूर करके एक-दूसरे से संवाद करना चाहिए। पाकिस्तान और चीन की दादागिरी के संदर्भ में देश के सभी विरोधी दलों को सरकार के साथ मजबूती से खड़ा रहना चाहिए, ऐसी अपेक्षा होती है। लेकिन गरीबी, आर्थिक मंदी, बेरोजगारी और भुखमरी पर सरकार विरोधियों से चर्चा करने की इच्छुक नहीं क्योंकि ये सारे मुद्दे सिर्फ पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी, लालबहादुर शास्त्री, राजीव गांधी, नरसिंह राव और मनमोहन सिंह जैसे लोगों के कारण ही पैदा हुए हैं, ऐसा वर्तमान केंद्रीय सरकार को लगता है। अगर ये दिक्कतें पहले के प्रधानमंत्रियों के कारण निर्माण हुई होंगी तो उन सारे प्रधानमंत्रियों ने देश में जो संपत्ति मेहनत से तैयार की है, उसे बेचकर वर्तमान सरकार गुजारा क्यों कर रही है? वैश्विक अमीरों की सूची में हिंदुस्थान के उद्योगपतियों का नाम शुमार है। देश के अमीरों की सूची में आंखों में धूल झोंकने जैसा कुछ नहीं है। फिर भी देश के १५ प्रतिशत लोग कुपोषित हैं और ३५ प्रतिशत लोग पेट भर भोजन भी नहीं कर पाते, इसका उत्तर दानवे ने दिया है। सरकार चलाना ऐरे-गैरों का काम ही नहीं है। देश की प्रतिष्ठा जिस तेजी से नीचे फिसलती जा रही है, उसे देखते हुए चिंता करने जैसा माहौल है। विरोधी दल के प्रमुख नेता राहुल गांधी ने अब कहा है, ‘देश का गरीब भूखा और कंगाल है क्योंकि सरकार अपने खास मित्रों की ही जेब भरने में मशगूल है।’ अब इस पर गांधी को निशाना बनाकर ‘ट्रोल’ किया जाएगा। लेकिन इससे देश के लोगों को अन्न और रोजगार मिलेगा क्या? उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में भूख के संदर्भ में कुछ ज्यादा काम नहीं हुए। इसलिए हिंदुस्थान का कुल प्रदर्शन खराब हुआ है। राष्ट्रीय औसत स्तर उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों के कारण नीचे आई है, ऐसा पूर्णिमा मेनन सामने लाई हैं। पूर्णिमा इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट की वरिष्ठ संशोधक हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश राज्य भुखमरी में अव्वल हैं और इन दो राज्यों में भाजपा की ही सरकार है। बिहार पर मोदी का सबसे ज्यादा प्रेम होने का खुलासा देवेंद्र फडणवीस ने किया है। उत्तर प्रदेश और बिहार की सरकार भूख व्यवस्थापन के मामले में फिसड्डी साबित चुकी है क्योंकि उन्होंने राज्य चलाने की बजाय अन्य भौतिक मुद्दों पर ज्यादा ध्यान दिया। बिहार में भूख की अपेक्षा सुशांत सिंह राजपूत मामले पर जोर दिया। उत्तर प्रदेश में भूख और रोजगार को छोड़कर अन्य मुद्दों पर चर्चा ज्यादा होती है। देश की अर्थव्यवस्था अत्यंत चिंताजनक स्थिति में है। आर्थिक मंदी की लहर सरकार नहीं रोक सकती क्योंकि उद्योग और व्यापार क्षेत्र में आज भी निराशा और भय का वातावरण है। हिंदुस्थान की जीडीपी बांग्लादेश की अपेक्षा भी कम होना धक्कादायक है। अर्थात हमारा देश दक्षिण एशिया का तीसरा सबसे गरीब देश साबित हो रहा है। कोरोना आदि कारण कुछ भी हो। फिर बांग्लादेश में वो कारण नहीं है क्या? इसका उत्तर भाजपा के केंद्रीय मंत्री दानवे ने दिया है। सरकार चलाना ऐरे-गैरों का काम नहीं है! देश ऐरे-गैरों के हाथ में है, दानवे को ऐसा ही कहना है क्या?