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संपादकीय : कर्ज चोरों का ‘ग्रहण’!

बढ़ते कर्ज और आर्थिक मंदी के कारण दुनियाभर के कई देशों की अर्थव्यवस्था डांवांडोल होती दिख रही है। हमारे देश का प्रवास भी ऐसे ही गंभीर आर्थिक संकट की दिशा में चल रहा है। सरकार स्वीकार करे अथवा न करे, परंतु आर्थिक संकट का राक्षस देश की चौखट पर दस्तक दे रहा है। इसी बीच देश का बकाया कर्ज ३५० फीसदी बढ़ जाने के आंकड़े घोषित करके देश की अर्थव्यवस्था व बैंकिंग प्रणाली में ‘अपव्यय’ के संदर्भ में कांग्रेस पार्टी ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। मोदी सरकार के दौर में बैंकों को करोड़ों रुपए का चूना लगानेवाले बैंकों के ३८ कर्ज चोर देश के बाहर भाग गए और दूसरी तरफ इसी सरकार ने उद्योगपतियों का १० लाख करोड़ रुपए का कर्ज माफ कर दिया, ऐसा आरोप देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने लगाया है। कांग्रेस के ताजे आरोपों पर सत्तारूढ़ दल की ओर से अभी तक किसी तरह की प्रतिक्रिया नहीं आई है तथा आने की संभावना भी नहीं है। विरोधियों का आरोप है कि उनके सवालों का जवाब देने में इस सरकार को हीनता महसूस होती है। देश की अर्थव्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश व रक्षा संबंधी नीतियां राजनीति से परे वाली बात है। इसमें राजनीति नहीं होनी चाहिए यह स्वीकार है, परंतु आर्थिक मोर्चे पर गड़बड़ी के संदर्भ में विपक्ष कोई सवाल खड़े करता है तो लोकतांत्रिक राज व्यवस्था में सरकार द्वारा उसका इमानदारी से उत्तर दिया जाना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य ये है कि देश की वर्तमान सरकार को सवाल पूछना स्वीकार नहीं है। ‘हम जितना कह रहे हैं उतना सुनो। विरोधी ही क्या देश की जनता की भी हम नहीं सुनेंगे’, देश में आज तक कभी भी नहीं देखी गई ऐसी कार्यशैली आज देश देख रहा है। तानाशाही पद्धति से सरकारी गाड़ी हांकने की प्रवृत्ति के कारण ही देश में समस्याओं का तूफान खड़ा हो गया है। बीते ५ वर्षों में केंद्र सरकार ने बड़े उद्योगपतियों के १० लाख ९ हजार ५१० करोड़ का कर्ज माफ कर दिए हैं। कर्जमाफी का यह मूल्य वर्तमान आर्थिक वर्ष के राजकोषीय घाटे का ६१ फीसदी के बराबर है। इस कर्ज में से केवल १३ फीसदी मतलब १ लाख ३२ हजार करोड़ की ही वसूली सरकार कर पाई है। बैंकिंग क्षेत्र की इस लूट का दुष्परिणाम अर्थव्यवस्था पर होगा ही। बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी का बढ़ता संकट, रुपए का बार-बार होनेवाला अवमूल्यन ये सब देखते हुए आर्थिक मोर्चे पर सब कुछ ठीक-ठाक है। सरकार के इस तर्क पर विश्वास कैसे रखा जाए? अर्थव्यवस्था पर आए संकट से देश को बाहर निकालना है तो आर्थिक संकट को स्वीकार तो करना चाहिए। तथापि वित्त व्यवस्था के फंसे हुए पहियों को बाहर निकालने के लिए ठोस रणनीति बनाने की बजाय गुजरात के चुनाव किस तरह से जीते जा सकते हैं, यही व्यूह रचना तैयार करने में सत्तारूढ़ दल और माई-बाप सरकार मशगूल है। मेहनकश, मजदूर, किसानों की मदद करने का मौका आता है तो सरकार तरह-तरह के बहाने बनाती है। दीन-हीनों को कुछ मुफ्त देने का कहा जाए तो, ‘रेवड़ी बांटना कहां तक उचित है?’ ऐसी खिल्ली उड़ाई जाती है। परंतु उद्योगपतियों का कर्ज माफ करते समय सरकार को वही ‘रेवड़ी’ याद नहीं आती है। वर्ष २०१७ में देश के बड़े उद्योगपतियों द्वारा बैंकों से लिए गए १ लाख ६१ हजार ३२८ रुपए का कर्ज ‘राइट ऑफ’ किया गया। २०१८-१९ में २ लाख ३६ हजार २६५ करोड़, २०१९-२० में २ लाख ३४ हजार १७० करोड़, २०२१ में २ लाख २ हजार ७८१ तो २०२२ में १ लाख ५७ हजार ९६ करोड़ रुपए अब तक ‘राइट ऑफ’ कर दिए गए हैं। देश की आम जनता का यह पैसा बड़े उद्योग समूहों पर लुटाया जाता है। गरीबों के कुछ हजार रुपए का कर्ज सख्ती के साथ वसूल किया जाता है और हजारों करोड़ रुपयों का कर्ज लेकर डुबानेवालों को ‘राइट ऑफ’ के नाम पर माफी दी जाती है। यह देश की आम जनता के साथ दगाबाजी ही है। देश के कर्ज चोर उद्योगपतियों द्वारा कर्ज के नाम पर बैंकों पर डाला गया डाका और बड़े कर्जदारों पर मोदी सरकार द्वारा दिखाई गई कर्जमाफी की मेहरबानी के कारण ही देश की अर्थव्यवस्था को बड़ा ग्रहण लगा है। बैंक के बकाए कर्ज की रकम में गिरावट होने की बजाय डूबते कर्ज का आंकड़ा नया कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। बैंकों को डुबाकर देश के बाहर भाग जानेवाले घोटालेबाज उद्योगपतियों की संख्या कम होने की बजाय बढ़ती ही जा रही है। इसलिए अर्थव्यवस्था को लगा ग्रहण खत्म होगा तो वैâसे, यह सवाल ही है!

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