मुख्यपृष्ठसंपादकीयसंपादकीय : शिव चरित्र का सबक...दुश्मनों, याद रखो!

संपादकीय : शिव चरित्र का सबक…दुश्मनों, याद रखो!

आज शिवजयंती है। छत्रपति शिवाजी महाराज का वर्णन कई कवियों, शाहिरों और इतिहासकारों ने इसे अपने शब्दों में किया है। नेवासा में रहने वाले परमानंद कवि महाराजा के विश्वासपात्र थे। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘शिवभारत’ में कहा है कि ‘चरितम् शिवराजस्य भरतसयेव भारतम्’। बखरकार के अनुसार शंकर का अवतार मानने के बजाय वे शिवाजी राजा को विष्णु का अवतार कहते हैं। भगवान ने जैसे सभी को दस उंगलियां दी हैं, ऐसा कहते हैं, वैसी ही बात शिवाजी महाराज की है। उनके जितने भी चरित्र लिखे गए हैं, उन सभी चरित्रों में ‘शिवाजी महाराज’ की दस उंगलियां शेष ही हैं। जैसा महाराष्ट्र का इतिहास है वैसा अन्य प्रांतों का नहीं है। महाराष्ट्र का एक इतिहास है, क्योंकि यहां शिवाजी महाराज ने जन्म लिया था। उन्होंने औरंगजेब के सिर पर पैर रखा और स्वराज्य की स्थापना की। ‘औरंगशाह खुद को दिल्ली में समेट लेगा’ शिवाजी महाराज का ऐसा कथन अंग्रेजी इतिहास में मिलता है। महाराष्ट्र, दिल्ली के आगे झुकता नहीं है। दिल्ली की गुलामी स्वीकार नहीं करेंगे इन विचारों के बीज ‘औरंगशाह को दिल्ली में ही ठूंस दूंगा’, शिवराय के इस मर्दाना स्वाभिमान में है। महाराज शिवप्रभु थे। देखिए सभासादी बखरी में क्या बताया गया है। कृष्णजी अनंत सभासद द्वारा शिवाजी महाराज के देह त्याग के बाद रचित यह बखर। सभासद अपनी पुस्तक में ‘रजियाज के चरित्र आख्यान’ में कहते हैं, राजा साक्षात केवल अवतरित ही थे। जन्म लेकर पराक्रम किया नर्मदा से रामेश्वरम तक घूमे। देशों को जीता। आदिलशाही, कुतुबशाही, निजामशाही व मुगलाई इन चार पातशाहों व समुद्र से बाईस पातशाहों पर फतह हासिल करके नए ही राज्य की स्थापना करके मराठा पातशाह सिंहासनाधीश छत्रपति प्राप्त हुए। इच्छामृत्यु पाकर स्वर्ग गए। इस जाति से कोई पहले नहीं हुआ, आगे नहीं होगा।’ शिवाजी महाराज का नाम वर्तमान राजनेता अक्सर लेते हैं। प्रधानमंत्री मोदी तो दिल्ली से काशी तक कहीं भी जाते हैं, शिवराय के नाम का जयघोष करते हैं, लेकिन आज शिवराय के विचारों से शासन चल रहा है क्या? शिवकालीन राजनीति चिंतन का विषय है। शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित ‘स्वराज्य’ के मूल में कुछ महान सिद्धांत थे। यदि शिवचरित्र का वास्तविक सार निकाला जाए, तो इससे दो प्रमुख सिद्धांत निकलते हैं। एक मतलब परचक्र का हर संभव विरोध करके स्वराज्य की स्थापना करना और दूसरा स्वराज्य की नींव मुख्यत: मेहनतकश जनता की मदद से शासन चलाना व स्वराज्य की स्थापना करना। शिवकालीन परचक्र मतलब मुगलों के आक्रमण, दक्षिण के बादशाहों का हमला था। शिवाजी महाराज ने यह सब उखाड़ फेंका। हिंदुस्थानी जमींदारों ने, जागीरदारों ने बाहरी हमलावरों की मदद की। जनता का शोषण किया। इसलिए शिवाजी महाराज ने मराठी राज की स्थापना करने के बाद जमींदारी, जागीरदारी रद्द कर दी और सेना द्वारा भी गांवों से कोई वस्तु लेने पर उसकी कीमत दी जानी चाहिए, ऐसा आदेश दिया। फसल पर सारा मकतवा देकर वसूली करने के रिवाज को बंद कर दिया। यायावर घूमनेवाले, खानाबदोश, कातकरी, बेयर्ड आदिवासियों को किले में रक्षक के रूप में तैनात कर दिया और उन्हें उपनिवेश और खेत देकर उनकी बस्तियां दीR। इसलिए उन्हें ईमानदारी से जीवन जीने का मौका और साधन मिल गया। बेरोजगारी खत्म हो गई। शिवराय का राज्याभिषेक संपन्न हुआ, मंत्रिमंडल का गठन करने के बाद वे केवल ‘राज्य’ का उपभोग नहीं करते रहे, बल्कि तुरंत मराठी राजभाषा शब्दकोश बनाकर विदेशी भाषा को महाराष्ट्र से खदेड़ दिया। फारसी भाषा पढ़कर मेरा कोर्ट-कानून, दरबार, प्रशासन नहीं चलेगा, ऐसी बाधा उन्हें महसूस नहीं हुई। उन्होंने मराठी भाषा और संस्कृति के विकास पर जोर दिया। शिवाजी महाराज की राजनीति मतलब सिर्फ ‘उत्सव’ नहीं थी। उन्होंने कण-कण में स्वाभिमान पैदा किया। जो कि आज भी बरकरार है। इसलिए महाराष्ट्र को झुकाना व दबाना दिलीश्वरों एवं उनके चमचों के लिए कभी संभव नहीं हुआ। महाराष्ट्र हमेशा लड़ता ही रहा। शिवराय का राज श्रमिकों का था। उन्हीं श्रमिकों ने लड़कर मुंबई सहित महाराष्ट्र को हासिल किया। वही श्रमिक बालासाहेब ठाकरे के कट्टर समर्थक बन गए। महाराष्ट्र कभी रोता नहीं रहा। बल्कि बदले की भावना से और भी भड़क कर उठा, उत्तेजित होकर उठा। हर किसान, मराठा, सेनापति लड़ता रहा व संभाजी राजा को मारनेवाले औरंगजेब का इसी महाराष्ट्र में दफन करके शांत हुआ। मुजरा और जी-हुजूरी करनेवालों की महाराष्ट्र में गिनती नहीं है। यही वास्तविक शिव चरित्र है। शिवाजी महाराज ने महाराष्ट्र को शौर्य दिया, वह शौर्य आज भीr भवानी तलवार की तरह तेज और चमकती है। आज शिवजयंती को हम महाराष्ट्र के दुश्मनों को इस बारे में आगाह कर रहे हैं। महाराष्ट्र के दुश्मनों के लिए शिवचरित्र एक सबक है!

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