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संपादकीय :  गणेश माडेकर से दशरथ केदारी …न वापसी की यात्रा

अतिवृष्टि की मार और नाकाम सरकार की दुविधा ने राज्य के एक और युवा किसान की बलि ले ली है। पिछले महीने वर्धा जिले के पढेगांव के युवा किसान गणेश माडेकर ने सीधे बिजली प्रवाहित तार को मुंह से पकड़कर अपनी जीवन यात्रा समाप्त कर ली थी। अब जुन्नर तहसील के दशरथ लक्ष्मण केदारी नामक किसान ने शनिवार को कुएं में कूदकर आत्महत्या कर ली। वर्धा के गणेश माडेकर हों या जुन्नर के दशरथ केदारी, हर किसानों का दुख, वेदना, संकट और दुविधा एक जैसी है। गांव अलग हो फिर भी सभी की दुविधा, सरकारी अक्षमता का अनुभव वही है। राज्य से लेकर केंद्र तक किसानों के लिए घोषणाओं की बरसात हो रही है, फिर भी उस पर अमल के मामले में सब सूखा है। इसलिए मजबूर किसानों की स्थिति न जीते बन रही है, न मरते जैसी हो गई है। यह स्थिति जिनके लिए असहनीय बन गई है, वो दशरथ केदारी की तरह खुद को मुक्त कर ले रहे हैं। केदारी ने आत्महत्या करने से पहले जो चिट्ठी लिखी, उसमें उन पर आए संकटों का उल्लेख किया है। यह समय आपकी निष्क्रियता के कारण आया, ऐसा आरोप उन्होंने प्रधानमंत्री पर लगाया है। ‘प्रधानमंत्री को केवल खुद की पड़ी है। किसान और उपज के समर्थन मूल्य से कुछ लेना-देना नहीं है। ऐसे समय में मेरे जैसे किसान किससे मदद मांगें? ऐसा सवाल केदारी ने पूछा है। केदारी का यह सवाल आज राज्य के सैकड़ों कर्जदार और अतिवृष्टिग्रस्त किसानों के मन में तपते लावे की तरह उबाल मार रहा है। हालांकि प्रश्न का जवाब देने के लिए राज्य के सत्ताधारियों के पास समय नहीं है और न ही केंद्र के पास। राज्य सरकार प्याज का उचित मूल्य नहीं देती इसलिए फसल को प्याज बाजार में ले जाना भी भारी पड़ता है। टमाटर का कोई बाजार भाव नहीं है। इसमें अतिवृष्टि ने बचा-खुचा निवाला भी छीन लिया। सरकार के मदद के दावे हवा में ही रह गए। केंद्र सरकार भी समर्थन मूल्य की बड़ी-बड़ी बातें करती है लेकिन प्रत्यक्ष में ऐसा कुछ नहीं होता। किसानों के हाथ में पैसा नहीं और देनदारी, बैंकवालों के तगादे थमने को तैयार नहीं, ऐसी वेदना दशरथ केदारी ने अपने पत्र में व्यक्त की है। उन्हें उनके सवाल का न जवाब मिला और न ही संकट से बाहर निकलने का रास्ता। प्रकृति का आधार नहीं और शासकों ने भी उन्हें जैसे निराधार छोड़ दिया। राज्य में आज ऐसे सैकड़ों किसान जीवन-मृत्यु के हिचकोले खाते हुए दिन निकाल रहे हैं। पिछले सप्ताह औंसा तहसील के गांव सिंदाला (लो.) के वृद्ध किसान रावसाहेब घोडके ने भी मौत को गले लगा लिया। नागपुर जिले के पिंपलदार के राजीव बाबूराव जुडपे ने भी कमजोर फसल, अतिवृष्टि और कर्ज के बोझ से असहाय होकर अपने खेत में फंदा लगाकर जीवन लीला समाप्त कर ली। इस बार बारिश ने कहर बरपा रखा है। अतिवृष्टि ने हाहाकार मचा रखा है, बलिराजा को इस भीषण स्थिति में मदद तत्काल पहुंचाना, हर तरफ से टूट चुके किसानों को आधार देकर अगले मौसम तक सक्षम बनाना, यह सरकार के तौर पर शासकों की जिम्मेदारी है। लेकिन उसे पूरा करने की बजाय राज्य की ‘ईडी’ सरकार केवल खोखली घोषणाएं कर रही है। मदद के आंकड़ों का बुलबुला हवा में छोड़ रही है। बाढ़ग्रस्त और अतिवृष्टिग्रस्त किसानों के बैंक खाते में १५ सितंबर तक सीधे राशि जमा की जाएगी, ऐसा ठाठ से दावा राणा भीमदेवी की तरह सरकार ने किया। कहते हैं, वैसा आदेश भी प्रशासन को दिया। अब इस अवधि को चार दिन बीत गए हैं, लेकिन किसानों के खाते में फूटी कौड़ी भी जमा नहीं हुई है। यही स्थिति ‘एनडीआरएफ’ के निष्कर्षों के अनुसार दोगुना मुआवजा देना और दो की बजाय तीन हेक्टेयर तक मदद देने की घोषणा में भी शामिल है। राज्य के लगभग २३ लाख ८१ हजार ९२० हेक्टेयर कृषि का इस बार अतिवृष्टि के कारण नुकसान हुआ है। विदर्भ और मराठवाड़ा के १८ जिले बाढ़ और अतिवृष्टि से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। सरकार केवल सूखे निरीक्षण दौरे और खोखली घोषणाओं में मस्त है। एक तरफ प्रकृति की ‘मार’ और दूसरी तरफ सरकार की खोखली घोषणाओं का ‘भार’ जैसी विचित्र दुविधा में राज्य के सैकड़ों किसान फंसे हैं। यह मार और भार जिसे असहनीय हो रहा है, वे दुर्भाग्य से गणेश माडेकर, दशरथ केदारी की तरह मौत को गले लगा रहे हैं। तीन महीने से राज्य के कई क्षेत्रों में बाढ़ की स्थिति निर्माण करनेवाली बारिश जल्द ‘वापसी’ की यात्रा पर निकलेगी, ऐसा मौसम विभाग ने जाहिर किया है। वह जाएगी तब जाएगी लेकिन अतिवृष्टि की मार और नाकाम सरकार के कारण बर्बाद हुए बलिराजा पर ‘न वापसी की यात्रा’ पर निकल जाने का समय आ रहा है, उसका क्या? ऐसी ये गणेश माडेकर से दशरथ केदारी तक की ‘न वापसी’ की भयानक यात्रा है। उसकी फिक्र न राज्य के सत्ताधारियों को है, न केंद्र को।

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