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संपादकीय : साधुकांड! …पालघर और सांगली का!

हिंदू यानी एक नंबर के ढोंगी हैं, ऐसा एक बयान गुजरात के राज्यपाल देवदत्त आचार्य ने दिया। ठीक है, श्री आचार्य कोई ‘सेक्युलर’ जैसे अलग विचार के इंसान नहीं हैं। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से बंधे पक्के हिंदुत्ववादी हैं। उनका यह बयान आश्चर्यजनक है, फिर भी वह महाराष्ट्र के भाजपा और शिंदे गुटवालों पर सटीक लागू होता है। महाराष्ट्र के सांगली जिले में १३ सितंबर को एक भयानक ‘साधुकांड’ हुआ। मथुरा से चार साधु भगवा वस्त्र में गले और हाथ में रुद्राक्ष की माला, शरीर पर भस्म, चंदन लगाकर महाराष्ट्र की सीमा में आए। उन्हें पंढरपुर जाना था। लेकिन सांगली जिले की जत तहसील के लवंगा गांव में उनके वाहन के प्रवेश करते ही गांव की भारी भीड़ ने उन पर सामूहिक हमला कर दिया। साधु जख्मी हो गए और मरणासन्न अवस्था में चले गए। नसीब बलवान था इसलिए उनकी जान बच गई। यानी शिंदे-फडणवीस के राज में भगवाधारी साधुओं को जान से मारने की साजिश होती है। ग्रामीणों को लगा कि ये साधु यानी बच्चे भगानेवाले चोरों की टोली है इसलिए उन साधुओं पर सामूहिक हमला हुआ। इस मामले में अब पांच-सात लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार किया है। फिर भी खुद को हिंदुत्व का ‘नवतारणहार’ कहलवानेवाली राज्य सरकार को यह साधुकांड गंभीर न लगे, इसका आश्चर्य हमें हुआ। वर्तमान के शासकों का हिंदुत्व ढोंगी है, ऐसा हम इसलिए कहते हैं कि लगभग दो वर्ष पहले पालघर जिले के गडचिंचले गांव में इसी तरह का एक साधुकांड घटित हुआ था। उन दिनों महाराष्ट्र के चार साधु उत्तर प्रदेश के लिए निकले थे। गुजरात की सीमा पार करते समय वे रास्ता भूल गए और भटकते हुए दूसरे गांव में पहुंच गए। वे जिस गांव में रात में भटके, उस गांव में भी चार दिन पहले से ऐसी ही अफवाह पैâली हुई थी कि साधु के वेश में बच्चे चुरानेवाली टोली गांव में आनेवाली है। लिहाजा दिन-रात पूरा गांव पहरा दे रहा था। इसी में ये भटके हुए साधु उस गांव में पहुंच गए और ग्रामीणों के आक्रोश की बलि चढ़ गए। सांगली के लवंगा गांव में साधुओं के साथ जिस तरह से मारपीट की गई, उसी तरह पालघर में रास्ता भटके साधुओं के साथ भी मारपीट हुई थी। सौभाग्य से पंढरपुर की ओर जानेवाले साधुओं की जान बच गई लेकिन उत्तर की ओर निकले साधुओं की पालघर जिले के ग्रामीणों के हमले में मौत हो गई। घटना की गंभीरता को समझते हुए उस दौरान पुलिस घटनास्थल पर समय पर पहुंच गई थी। आगे साधुओं के साथ मारपीट हुई और उस गांव की भीड़ को आरोपी बनाया गया। गैर इरादतन हत्या का मामला दर्ज किया गया। तत्कालीन गृहमंत्री अनिल देशमुख तुरंत स्वयं घटनास्थल पर पहुंचे थे लेकिन उस घटना का तब विपक्षी भाजपा ने बड़े पैमाने पर राजनीतिक निवेश किया। यानी उन दिनों का उनका वो कथित अन्याय-अत्याचार के खिलाफ का जोश सांगली के साधुकांड में ठंडा पड़ता दिखाई देता है। पालघर के साधुकांड पर राष्ट्रीय ‘गोदी’ मीडिया ने तो चर्चा और धिक्कार की झड़ी लगा दी थी। महाराष्ट्र में हिंदुत्व खत्म हो गया है। साधुओं की हत्या के कारण शिवसेना ने हिंदुत्व को कांग्रेस-राष्ट्रवादी की खूंटी पर टांग दिया है, ऐसे तीर चलाए गए। इतना ही नहीं, पालघर के हत्याकांड के कारण सोनिया गांधी और रोम के वैटिकन चर्च किस तरह से खुश हैं, वगैरह बातें भाजपा प्रवक्ता कर रहे थे। नेता प्रतिपक्ष श्री फडणवीस, शेलार आदि महामंडली तो रो-रोकर टूटकर गिर गई थी। इस मंडली ने घटनास्थल का दौरा करके प्रशासन पर दबाव बनाया था। मामला सीबीआई, एनआईए को सौंपने की मांगें हुर्इं। हर भाजपावाला तब पालघर के साधुकांड पर अपना ज्वलंत विचार व्यक्त कर शोकमग्नता का दर्शन करा रहा था। फिर यह शोकमग्नता, वह छटपटाहट सांगली के साधुकांड में क्यों नहीं दिखी? पालघर के साधु हिंदू और सांगली के मार खाए साधु भगवा वेश में ‘अरबी’ थे क्या? या उन्हें भी पालघर के साधुओं की तरह मारना चाहिए था? पालघर के साधुकांड के बाद हिंदुत्व के नाम से हिनहिनानेवाली घोड़ी सांगली प्रकरण में ‘लीद’ छोड़ रही है। भाजपा की वे सभी हिंदुत्ववादी बहनें, मां, महिला मंडल भी लवंगा के साधुकांड पर बोलते हुए, रोते हुए दिखाई नहीं दे रहे हैं। कोई रविशंकर प्रसाद, गिरिराज शंकर, कोई एक सांबित पात्रा सांगली साधुकांड में छाती पीटते हुए नहीं दिखाई दे रहा, इसे आश्चर्य ही कहना होगा। एक गणपति के जुलूस में अफजल के वध की झांकी को लेकर सांगली-मिरज क्षेत्र में दंगा हो गया। उस दंगे में जिन्होंने हिंदुत्व की समशेरी नचाई, वे सांगली के सभी हिंदू वीर भी साधुकांड के बाद बिल्कुल चुप हो गए हैं। कहने को तो गृहमंत्री फडणवीस ने साधुकांड की गहन जांच के आदेश दिए हैं। कुछ लोगों की गिरफ्तारियां भी हुई हैं। लेकिन इसी तरह की जांच के आदेश और कार्रवाई तो पालघर साधु मारपीट मामले में भी तत्कालीन ‘ठाकरे सरकार’ ने भी की थी। पालघर के पुलिस अधीक्षक को पद से हटा दिया था, फिर भी ‘ठाकरे सरकार’ के विरोध में हिंदुत्व के नाम पर हो-हल्ला मचाया गया था। देशभर की भाजपा ने इस मामले को लेकर नाचना-कूदना शुरू कर दिया था। लेकिन भाजपा के पाखंडियों, अब तो तुम्हारे राज में ही साधुओं पर क्रूर और अमानवीय हमला हुआ है। माऊली की कृपा से वे बच गए लेकिन इससे अपराध की तीव्रता कम नहीं होती। साधुओं के भगवे वस्त्र आज भी खून से भीगे हैं, साधुओं के सिर फूटे, बहुत कुछ हुआ। फिर भी भाजपा का हिंदुत्व झंडू बाम मलते हुए बैठा है। इसी को हम ढोंगी हिंदुत्व कहते हैं! महाविकास आघाड़ी सरकार के कार्यकाल में पालघर के साधुकांड पर गंदी राजनीति करनेवाले आज सत्ता में हैं। शिवसेना के कांग्रेस-राष्ट्रवादी के साथ सरकार बनाने से हिंदुत्व छूट गया इसलिए हमने शिवसेना के साथ बेईमानी की, ऐसा कहनेवाले उन चालीस लफंगों को भी सांगली जिले के लवंगा गांव के भगवा साधुओं का करुण व्यथा सुनाई नहीं दी। ऐसे ढोंगी बनावटी मंबाजी से हिंदुत्व की उम्मीद करना यानी भैंसे से दूध की उम्मीद करने जैसा ही है। अब कहा जा रहा है भाजपा की कठपुतली ‘मा. मु.’ साहेब ‘हिंदू गर्व यात्रा’ निकालनेवाले हैं। विशेष कर सांगली के साधुकांड पर उन्होंने एक शब्द भी नहीं बोला। ‘मा. मु.’ साहेब को भाजपा हिंदू का तीर्थराज या फिर जो चाहे घोषित करे। अब उतना ही बाकी रह गया है! राज्य की कानून-व्यवस्था के भगवे फीते सांगली की सीमा पर टंगे हुए स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं।

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