मुख्यपृष्ठनए समाचारसंपादकीय : फडणवीस के सामने चुनौतियां! ...महाराष्ट्र या गुजरात?

संपादकीय : फडणवीस के सामने चुनौतियां! …महाराष्ट्र या गुजरात?

महाराष्ट्र को आगामी दो वर्षों में गुजरात से आगे ले जाएंगे, ऐसा श्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा है। गुजरात यानी छोटा भाई है, पाकिस्तान नहीं। ऐसा अहम मार्गदर्शन श्री फडणवीस ने किया। ‘फॉक्सकॉन’ परियोजना महाराष्ट्र से छीनकर ले जाने के बाद से फडणवीस सरकार सभी की आलोचनाओं का निशाना बन गई है। शिंदे नाममात्र के मुख्यमंत्री हैं और उनके चालीस विधायक भी मुख्यमंत्री के तौर पर घूम रहे हैं। इस अराजकता में राज्य चलाने की जिम्मेदारी फडणवीस पर आती है। बतौर मुख्यमंत्री शिंदे पर शिवसेना तोड़ने, गणपति दर्शन, उत्सव मंडलों, पूजा, विवाह समारोहों में सम्मिलित होने की जिम्मेदारी है। फडणवीस पर राज चलाने की जिम्मेदारी है। इसलिए ‘फॉक्सकॉन’ मामले में फडणवीस क्या कहते हैं, इसे गंभीरता से देखा जाता है। फडणवीस की भूमिका संयम की है लेकिन महाराष्ट्र की प्रतियोगिता गुजरात से नहीं है। महाराष्ट्र का गुजरात से झगड़ा होने का कोई कारण नहीं हो सकता। आप गुजरात को छोटा भाई कहते हैं। शिवसेना ने गुजरात को हमेशा जुड़वां भाई का सम्मान दिया है। मुंबई जब द्विभाषिक राज्य था तब गुजरात और महाराष्ट्र एक ही थे। अपने-अपने भाषिक राज्यों के लिए मराठी लोगों के साथ-साथ गुजराती बंधुओं को भी मोरारजी देसाई की आतंकी फायरिंग में शहीद होना पड़ा था। महाराष्ट्र और गुजरात का जन्म एक ही गर्भ से हुआ। दोनों राज्य और भाई हमेशा हंसी-खुशी से रहे। इसलिए महाराष्ट्र और गुजरात का क्या संबंध है? यह फडणवीस को बताने की जरूरत नहीं है। गुजरात पाकिस्तान नहीं है, यह आप क्यों कहते हैं? गुजरात की पाकिस्तान से तुलना करके आप महाराष्ट्र को भी दुख पहुंचा रहे हैं। ‘फॉक्सकॉन’ सहित कई अन्य परियोजनाएं पड़ोसी राज्यों में चली गर्इं। वे कहां गर्इं इसकी बजाय महाराष्ट्र ने गवां दिया, ये इस पर कटाक्ष है। राज्य में निवेश आए इसके लिए पूरक वातावरण निर्माण करना पड़ता है। ऐसा माहौल होना, यह महाराष्ट्र की विशेषता थी। लेकिन आज के सत्ताधारियों ने उस पर ध्यान नहीं दिया। महाराष्ट्र का माहौल तनावपूर्ण, अस्थिर और विस्फोटक है। भाजपा की प्रेरणा से शिंदे गुट जिले-जिले में खुद की टोलियां बनाकर ठग और लुटेरों की तरह काम कर रहा है। कुछ लोग ऐसे होते हैं कि वे जिस तरफ सत्ता होती है, वहां अपनी टोली जोड़ देते हैं और लुटेरों की तरह लूट करते हैं। ऐसा माहौल निर्माण होना उद्योग और व्यापार आदि के लिए ठीक नहीं है। क्या इसमें महाराष्ट्र का हित है? इसका विचार फडणवीस को करना है। मुंबई-ठाणे की सड़कें बारिश में जलमग्न हो गर्इं। गड्ढों के कारण सड़कें और यातायात ठप हो गया। मुंबई-नासिक-पुणे आदि की सड़कों पर लोग बारह-बारह घंटे फंसे रहे। सबसे ज्यादा असर ठाणे शहर में पड़ा। ठाणे में कल तक शिवसेना के नाम से शिंदे ही राज कर रहे थे। इसलिए भाजपा के ‘शेलार’ जिस ‘दस प्रतिशत’ हिसाब की बात कर रहे हैं, उसका हिसाब ठाणे से ही लेने की शुरुआत की जानी चाहिए और फडणवीस को इस मामले में जांच के आदेश देने चाहिए। कल्याण-डोंबिवली क्षेत्र का दौरा केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने किया और उस तथाकथित स्मार्ट सिटी के फीते ही उन्होंने निकाले। सड़कें नहीं, गड्ढों का राज, खराब प्रशासन को देखकर ठाकुर अधिकारियों पर भड़क गए। कल्याण-डोंबिवली-नई मुंबई औद्योगिक शहर हैं। वहां एमआईडीसी से लेकर अन्य कई परियोजनाएं हैं। लेकिन इस औद्योगिक शहर को ‘नर्क’ किसने बनाया? इस क्षेत्र का सांसद कौन? इस क्षेत्र के विधायक शिंदे गुट में चले गए। नगरसेवक भी लुटेरों की तरह उसी टोली में चले गए। शहर बेचकर खानेवालों से औद्योगिक प्रगति वैâसे होगी? ‘मनसे’ के विधायक फडणवीस सरकार के समर्थक हैं। इस क्षेत्र के विधायक राजू पाटील ने सत्य ही सामने ला दिया। ‘कल्याण-डोंबिवली महानगरपालिका केवल सेटिंग में स्मार्ट है। फिर वह कमीशन खोरी हो या फिर पुरस्कार। यहां सिर्फ सेटिंग चलती है’, ऐसा सरकार समर्थक विधायक सरेआम बोल रहे हैं। इस तरह का माहौल कायम रहा तो नए निवेश पर असर पड़ेगा और क्या इसी अस्थिर, अशांत परिस्थिति के कारण फॉक्सकॉन जैसी परियोजनाएं हाथ से बाहर निकल रही हैं? इस पर फडणवीस सरकार को विचार करना जरूरी है। विकास में कोई महाराष्ट्र से आगे दौड़ जाए तो बुरा क्यों लगे? सभी राज्य अपना-अपना विकास करें तभी देश प्रगति पथ पर जाएगा। फिर गुजरात क्या या फिर उत्तर प्रदेश, बिहार क्या! योगी आदित्यनाथ मुंबई आते हैं। ममता बनर्जी और अन्य राज्यों के मुख्यमंत्री यहां आकर उद्योगपतियों से आह्वान करते हैं, यही मुंबई-महाराष्ट्र की विशेषता है। मुंबई पूरे देश का पेट भरती है लेकिन मुंबई-महाराष्ट्र के पेट पर लात मारकर कोई कुछ अलग कर रहा है तो महाराष्ट्र को बाघ का पंजा मारना पड़ेगा। उत्तर प्रदेश में फिल्मसिटी बन रही है। प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिन पर नामीबिया देश से आठ चीतों को लाकर मध्य प्रदेश के ‘कुनो’ अभ्यारण में छोड़ा गया। इससे वहां के पर्यटन उद्योग को बढ़ावा मिलेगा, ऐसा प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, इसका हमें आनंद है। इन चीतों को विदर्भ के ताडोबा जंगल या पेंच के जंगल में क्यों नहीं छोड़ा गया, ऐसा सवाल हमारे दिमाग में नहीं आएगा। मध्य प्रदेश क्या या गुजरात क्या, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र… हर राज्य हमारा है। जम्मू-कश्मीर में धारा-३७० हटाने के बाद वहां बड़े पैमाने पर निवेश होगा, बाहर के उद्योगपति आकर कश्मीर में जमीन-जुमला लेंगे, ऐसा सरकार की ओर से कहा जा रहा था। कोई फॉक्सकॉन जम्मू-कश्मीर में गई होती तो वहां की राष्ट्रवादी जनता खुशी से फूली नहीं समाती। भटके हुए युवाओं के हाथों में रोजगार मिला होता और बगल के पाकिस्तानियों को भी विकास के माध्यम से करारा जवाब मिला होता। जिस तरह गुजरात पाकिस्तान नहीं, वैसे ही जम्मू-कश्मीर भी पाकिस्तान नहीं। प्रधानमंत्री-गृहमंत्री गुजरात के इसलिए सभी परियोजनाएं, उद्योग गुजरात की ओर मोड़े जा रहे हैं। उसके लिए केंद्र का अदृश्य तंत्र काम कर रहा है, ऐसा भ्रम का माहौल राष्ट्रीय एकात्मता के लिए ठीक नहीं है। गुजरात में निवेश बढ़ने का पेट दर्द महाराष्ट्र को नहीं है। एक बार भाई कहने पर विवाद रह ही कहां जाता है? विवाद निर्माण करके दोफाड़ करनेवाले दूसरे ही हैं। महाराष्ट्र का मौजूदा माहौल उद्योग-व्यापार के लिए उपयुक्त नहीं है। महाराष्ट्र का बड़ा निवेश ‘खोखे कंपनी’ में हुआ। उस खोखे की वसूली शुरू होने पर उद्योग और निवेशकों की भागम-भाग शुरू है। फिर उद्योग-व्यापार का कत्ल करने के लिए महाराष्ट्र पर ‘ईडी’ की लुटेरू फौज छोड़ी ही गई है। गुजरात यानी पाकिस्तान नहीं लेकिन महाराष्ट्र को दुश्मन ठहराया जा रहा है। महाराष्ट्र की छवि सुधारने की चुनौती फडणवीस के सामने है। बाकी कमीशन खोरी का नया हिसाब लेने के लिए शेलार का नियोजन मंडल है ही।

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