" /> नोटबंदी का क्या हुआ?

नोटबंदी का क्या हुआ?

‘नोटबंदी’ हमारे देश के इतिहास का काला अध्याय था। नोटबंदी के निर्णय के ४ साल पूरे होने पर सरकार की ओर से आनंदोत्सव मनाया गया। इस निर्णय के कारण देश और जनता का किस प्रकार कल्याण हुआ, इसकी बड़ाई की गई। प्रधानमंत्री मोदी ने दावा किया है कि नोटबंदी के कारण काले धन को कम करने में सहायता मिली। प्रधानमंत्री का वक्तव्य कितनी गंभीरता से लेना चाहिए, यह हर कोई अपने हिसाब से तय कर ले। मूलतः वादा विदेश से काला धन हिंदुस्थान में लाने का था और उस काले धन को जनता के बैंक खातों में यानी हर किसी के बैंक खाते में १५ लाख डालेंगे, ऐसा श्री मोदी ने वचन दिया था। उसका क्या हुआ? नोटबंदी के कारण कश्मीर घाटी का आतंकवाद समाप्त हो जाएगा, ऐसा भी दावा किया गया था। आतंकवाद के लिए जो आर्थिक सहायता मुहैया कराई जाती है, उसमें काले धन का प्रयोग होता है। उसमें नकली नोटों की संख्या ज्यादा होती है। वह सब अब बंद हो जाएगा। इसलिए कश्मीर घाटी में हो रहे खून-खराबे पर लगाम लगेगी लेकिन असल में ऐसा कुछ हुआ है क्या? प्रधानमंत्री और उनके सहयोगी नोटबंदी का चौथा जन्मदिन रविवार को मना रहे थे। उस समय जम्मू-कश्मीर के माछिल क्षेत्र में आतंकवादी घुस गए। उनके साथ हुई मुठभेड़ में चार जवान शहीद हो गए। कश्मीर घाटी में घुसपैठ और मुठभेड़ बढ़ गई है। जवानों की शहादत का आंकड़ा बढ़ रहा है। मतलब ‘काला धन’ और नकली ‘नोटों’ का असर अभी भी कायम है और नोटबंदी का आतंकवादियों पर कोई असर नहीं पड़ा है। उल्टे नोटबंदी से अर्थव्यवस्था जो सोई, वह अब तक नहीं उठ पाई है। लाखों लोगों की नौकरियां चली गर्इं। देश के आर्थिक विकास की गति मंद हो गई लेकिन प्रधानमंत्री कहते हैं कि नोटबंदी के निर्णय से पारदर्शिता को बल मिलेगा। आर्थिक व्यवहार ठीक हो गया। यह सब सरकारी ‘वक्तव्य’ है। असल में वस्तुस्थिति कुछ और है। नोटबंदी से अर्थव्यवस्था की कमर झुक गई है। उसमें भी कोरोना और लॉकडाउन के कारण कमर टूट ही चुकी है। देश के चाय टपरी वालों का जीना कठिन हो गया है और चाय उत्पादक तो मर ही गए। चाय का उल्लेख इसलिए क्योंकि एक चाय बेचनेवाला नेता देश का प्रधानमंत्री बना। इससे गरीब जनता की अपेक्षाएं मजबूत हुर्इं लेकिन वो अपेक्षाएं पूर्ण हुर्इं क्या? देश की अर्थव्यवस्था फिलहाल जिस गति से फिसलती जा रही है, वह फिसलन इसी प्रकार जारी रहेगी तो जनता सड़कों पर उतर आएगी और देश में अराजकता भड़क उठेगी, ऐसी चेतावनी रघुराम राजन जैसे जाने-माने वित्त विशेषज्ञ दे रहे हैं। बिहार में विधानसभा चुनाव हुए। वहां राम मंदिर और सुशांत सिंह राजपूत जैसे भौतिक विषय भाजपा की ओर से सामने लाए गए। वो सारे मुद्दे फेल हो गए लेकिन तेजस्वी यादव द्वारा १० लाख रोजगार देने की बात करते ही बिहार का माहौल बदल गया। तेजस्वी की सभाओं में प्रचंड भीड़ उमड़ने लगी। उसमें बेरोजगार युवकों की संख्या अधिक थी। इसे किस बात का लक्षण समझा जाए? मुंबई में खून और आत्महत्या के लिए मजबूर करना, आर्थिक धोखे जैसे अपराधों में गिरफ्तार पतित पत्रकार के लिए भाजपा के लोग छाती पीटते हुए सड़कों पर उतरते हैं। महाराष्ट्र का अपमान करनेवाली अभिनेत्री के समर्थन में जप करते हैं। लेकिन नोटबंदी से लाखों लोग बेसहारा और बेरोजगार हो गए, उनके लिए सहानुभूति के दो शब्द नहीं निकले। इसे पारदर्शिता आदि नहीं कहा जा सकता। ‘नोटबंदी’ को चार वर्ष हो गए। उसका उत्सव मनाना मतलब गलत निर्णय के कारण जो लोग मर गए, जिनकी नौकरियां गर्इं, जिन्होंने आत्महत्या की, व्यापार-उद्योग उद्ध्वस्त हुए, ऐसे सारे उद्ध्वस्त लोगों की लाश पर बैठकर जन्मदिन का केक काटने जैसा है। नोटबंदी और जीएसटी जैसे निर्णय देशहित के लिए खतरनाक साबित हुए। गलती को स्वीकार करके आगे जाना नेतृत्व की धमक होती है। लेकिन गलतियों का समर्थन करने की नई राजनीतिक परंपरा बन गई है। अमेरिका में प्रे. ट्रंप यही कर रहे थे। उनकी क्या हालत हुई? इसका खयाल रखा जाए तो भी काफी है।