मुख्यपृष्ठनए समाचारसंपादकीय : ‘पीएफआई’ पर कार्रवाई ...‘ईडी’ ने यह ठीक किया!

संपादकीय : ‘पीएफआई’ पर कार्रवाई …‘ईडी’ ने यह ठीक किया!

‘पॉप्युलर फ्रंट ऑफ इंडिया’ पर देशभर में ईडी और एनआईए के छापे पड़े और उससे बहुत सारी बातें बाहर आईं। देशभर में आतंकवाद पैâलाकर अराजकता निर्माण करने की ‘पीएफआई’ संगठन की साजिश थी और उसके लिए बड़े पैमाने पर ‘टेरर फंडिंग’ यानी आर्थिक लेन-देन होने का दावा केंद्रीय जांच एजेंसी ईडी और एनआईए की ओर से किया गया है। इसे सही मान लें तो सबसे पहले ‘ईडी’ का अभिनंदन करना होगा। क्योंकि जिस महान कार्य के लिए ‘ईडी’ की स्थापना हुई, उस कार्यपूर्ति के लिए ‘ईडी’ ने पहली बार आतंकवादियों पर छापे डालकर उनकी आर्थिक कमर तोड़ दी है, ऐसा नजर आ रहा है। देश के आतंकवाद को मिलनेवाली आर्थिक रसद, तस्करी, नशीले पदार्थों के कारोबार से होनेवाले आर्थिक लेन-देन को रोकने के लिए ईडी की स्थापना हुई और उसे अधिकार दिए गए। उसका उपयोग ‘ईडी’ ने पहली बार पॉप्युलर फ्रंट ऑफ इंडिया की नब्ज दबाकर किया है। ‘पीएफआई’ ने प्रधानमंत्री मोदी की हत्या का षड्यंत्र रचा था। पटना में १२ जुलाई को प्रधानमंत्री मोदी की सभा हुई थी। इस सभा में मोदी की हत्या करने की पीएफआई की साजिश थी। हमलावरों के लिए ट्रेनिंग कैंप भी लगाए गए थे। साजिश के लिए बड़े पैमाने पर निधि की व्यवस्था की गई थी, ऐसा दावा राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी एनआईए ने कोर्ट में किया है। देशविरोधी गतिविधियों और हिंदुस्थान का इस्लामीकरण करने की भी नीति थी। ‘पीएफआई’ संगठन के १५ राज्यों के ९३ ठिकानों पर छापे मारकर कई लोगों की गिरफ्तारियां की गईं। ‘पीएफआई’ को हवाला रैकेट से खाड़ी देशों से पैसे उपलब्ध कराए जाते हैं और इस हवाला तरीके से आए पीएफआई के १२० करोड़ रुपए जप्त किए गए। ‘पीएफआई’ की गतिविधियों को लेकर संदेह और रहस्य का वातावरण तो था ही। ‘सिमी’ पर पहले ही प्रतिबंध लगा दिया गया था लेकिन सिमी ने मुखौटा बदलकर ‘पीएफआई’ का रूप धारण कर लिया। सिमी की तरह इस संगठन की स्थापना मुस्लिम समुदाय की शिक्षा में मदद करना, उनका पिछड़ापन दूर करना, उन पर होनेवाले अन्याय से मुक्ति दिलाने के उद्देश्य से की गई थी। लेकिन बाद में उनकी भूमिका कई मामलों में संदेहास्पद रही। वर्ष २०१२ में केरल की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने उच्च न्यायालय में एक हलफनामा दायर करके बताया था कि ‘पीएफआई’ यानी दूसरी-तीसरी कोई नहीं, बल्कि प्रतिबंधित ‘स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया’ ही है। मतलब यह नाम बदलकर उस काम में लगी पुरानी ‘सिमी’ ही है। यानी आज केंद्रीय जांच एजेंसियां जिस ‘पीएफआई’ पर कार्रवाई कर रही हैं, मोदी की हत्या की जिस साजिश का पर्दाफाश किया गया है, उसका श्रेय कांग्रेस द्वारा केरल में ‘पीएफआई’ के खिलाफ की गई कार्रवाई को देना होगा। ऐसे इस्लामिक आतंकवादी संगठन पर कार्रवाई करने के लिए हिम्मत दिखानी पड़ती है। ‘पीएफआई’ के खाते में इतना पैसा कहां से आया और उसके असली आश्रयदाता कौन हैं, यह ढूंढ़कर निकालना होगा। उन्हें किस तरह से हिंदुस्थान का इस्लामीकरण करना था, इस पर भी प्रकाश डालना होगा। ‘पीएफआई’ मामले को वर्ष २०२४ के लोकसभा चुनाव में भुनाने और राजनीति के लिए सिर्फ रंगने व तूल देने के लिए न छोड़ा जाए। राष्ट्रीय सुरक्षा का यह गंभीर मामला है। नागरिकता संशोधन विधेयक २०२० को लेकर दिल्ली में हुए दंगे, उत्तर प्रदेश के हाथरस में एक दलित युवती पर सामूहिक दुष्कर्म व हत्या और उसके बाद हुए आंदोलन में ‘पीएफआई’ की भूमिका की जांच एजेंसियां कर रही हैं। ‘पीएफआई’ का पुणे जिले में महत्वपूर्ण अड्डा है। गुप्तचर विभाग ने इस मामले में समय-समय पर केंद्र को सूचित किया है। अमरावती में उमेश कोल्हे की निर्मम हत्या हुई। इसके पीछे जमीयत-उलेमा-ए-हिंद नामक ‘पीएफआई’ के छिपे उपसंगठन का हाथ होने की बात सामने आई है। छापेमारी के बाद ‘पीएफआई’ के केरल और महाराष्ट्र के पदाधिकारी पकड़े गए। पुणे में ‘पीएफआई’ की ओर से जिलाधिकारी कार्यालय के सामने आंदोलन किया गया। उसमें ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे लगाए गए और उसे लेकर वातावरण भड़काया जा रहा है। ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे लगाने की हिम्मत पुणे में कोई करे, यह वर्तमान हिंदुत्ववादी वगैरह सरकार की असफलता है। मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री कहते हैं, ऐसा नारा लगानेवालों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। सवाल केवल बर्दाश्त करने का नहीं है बल्कि इस जहर को हमेशा के लिए कुचलने का है। यह कार्रवाई और इसके पीछे की वजह सही है या आगामी चुनाव के लिए कुछ नई साजिशें रची जा रही हैं, यह देखना जरूरी है। राज्य की सरकार के पास न काम है न दाम, इसलिए दंगे भड़काकर चुनाव लड़ने का काम वे करना चाहते हैं तो महाराष्ट्र की जनता को सतर्क रहना होगा। शिवतीर्थ पर दशहरा सम्मेलन के मामले को लेकर दंगा भड़काने का उनका इरादा था। लेकिन हाईकोर्ट ने रामशास्त्री की भूमिका अपनाई, जिससे योजना विफल हो गई। अब ‘पीएफआई’ मामले में जुबनी जमा खर्च करने की बजाय कार्रवाई करनी चाहिए और महाराष्ट्र की भूमि से यह जहर नष्ट करना चाहिए। ‘पीएफआई’ ने कई ठिकानों पर विरोध प्रदर्शन किया। केरल में उनका ‘बंद’ हिंसक हो गया। वहां कन्नूर जिले में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यालय पर ‘पीएफआई’ के कार्यकर्ताओं ने पेट्रोल बम से हमला किया। सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया। शैक्षणिक और सामाजिक काम करनेवाले संगठनों के कार्यकर्ता ऐसी हिंसा नहीं करते, इसे ध्यान में रखा जाए तो ‘पीएफआई’ पर की गई कार्रवाई उचित है। एनआईए और ईडी ने लंबे समय के बाद उन्हें सौंपा गया नियमानुसार काम किया और यह देशहित में है। कपिल सिब्बल ने दो दिन पहले कहा था, ‘हिंदुस्थान में वर्तमान में द्वेष की राजनीति की जा रही है। विपक्षी पार्टियों के नेता सीबीआई, ईडी जैसी केंद्रीय जांच एजेंसियों की दहशत में जी रहे हैं। देश के बहुसंख्य लोग डरे हुए हैं और वे मानसिक रूप से त्रस्त हैं।’ अब उस ईडी जैसी संस्था पर लगा राजनीतिक प्रतिशोध का दाग ‘पीएफआई’ पर हाथ डालने के कारण थोड़ा-सा धुल गया है। इस उपलक्ष्य में प्रधानमंत्री मोदी की हत्या की साजिश का खुलासा हो गया। हम उनके समृद्ध, निरोगी, सुरक्षित दीर्घायु को लेकर मां जगदंबा के चरणों में चिंतित हैं!

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