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संपादकीय : आगे क्या होगा? ..शिवसेना तैयार है!

महाराष्ट्र में सत्तासंघर्ष पर सुप्रीम कोर्ट क्या फैसला करेगा, इस पर सिर्फ राज्य ही नहीं, बल्कि पूरे देश की निगाहें टिकी हुई थीं। मगर हुआ क्या? चुनाव आयोग एक संवैधानिक निकाय है, इसलिए उन्हें कुछ निर्णय और सुनवाई करने दें, ऐसा फैसला सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने मंगलवार को सुनाया। यानी चिह्न के बारे में क्या? असली पार्टी किसकी? इस संबंध में अब चुनाव आयोग में साक्ष्य आदि की जांच की जाएगी। असल में यहां सवाल राज्य में सत्तासंघर्ष का है ही नहीं। यह सत्तासंघर्ष मुद्दा नहीं है। महाराष्ट्र में एक गैरकानूनी सरकार सत्तारूढ़ हुई है। शिवसेना से एक गुट बेईमानी करके टूट गया। मुख्यमंत्री पद, मंत्री पद, खोके का आर्थिक लेन-देन करके उन्होंने विपक्षी दल से हाथ मिलाया और सत्ता स्थापित की। पार्टी आदेश की अवहेलना कर दल-बदल कानून का उल्लंघन किया। इसलिए मुख्यमंत्री समेत १६ विधायकों पर अयोग्यता की कार्रवाई हो, यह मूल विषय है क्योंकि इस गुट द्वारा चुनाव आयोग में याचिका दायर करने से पहले महाराष्ट्र में कई घटनाएं हो चुकी हैं। पहले विधायकों की अयोग्यता के संबंध में निर्णय हो। फिर बाकी के मामले, ऐसा यह सीधा मुकदमा है। नियम, कानून, संविधान और पिछले निर्णयों का अध्ययन करें तो १६ विधायक और उनके मुख्य नेता अयोग्य हो जाएंगे और गैरकानूनी सरकार रेत के महल की तरह ढह जाएगी, लेकिन पिछले कुछ दिनों से ‘मिंधे’ गुट के बेईमान विधायक खुलेआम कह रहे थे, ‘चाहे कुछ भी हो जाए, हमारे गुट की जीत होगी। धनुष-बाण का चिह्न हमें ही मिलेगा। सुप्रीम कोर्ट में ५-१० साल तक कोई पैâसला नहीं होता!’ बागी विधायक सार्वजनिक रूप से इस तरह के बयान देते हैं, तो लोगों के मन में देश की संवैधानिक संस्थाओं के कामकाज को लेकर संदेह पैदा होता है। यह सच है कि इस तरह के संदेह पिछले कुछ वर्षों से निर्माण हुए हैं। मूलरूप से कौन-सी शिवसेना असली, क्या यह महाराष्ट्र में विवाद का विषय बन सकता है? ‘मिंधे’ गुट को आगे करके कमलाबाई इस मुद्दे को नियम और कानून में नचा रही है। सभी संवैधानिक संस्थाओं को कमलाबाई ने अपने ‘आंचल’ में खींच रखा है, जिसके चलते बेईमान गुट को राहत मिल रही है। ऐसा इस गुट को आभास कराया जा रहा है। लेकिन हमारा न्यायालय, देश के संविधान और तमाम जनता पर विश्वास है। महाराष्ट्र में जो घटनाएं घटित कराई गईं वो सीधे-सीधे गैरकानूनी हैं। चुनाव आयोग क्या है? चुनाव आयोग यानी अयाल झड़ा और दांत टूटा शेर नहीं है। यह किसी दौर में टी.एन. शेषन ने दिखा दिया था। बेशक उससे पहले और बाद में सभी घोड़े बारह टके ऐसा भी हुआ है, ये भी है ही। चुनाव आयुक्त से सेवानिवृत्त होकर किसी राजनीतिक पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर राज्यसभा में आते हैं और मंत्री भी बन जाते हैं। ये सब संवैधानिक निष्पक्षता के उदाहरण नहीं हैं! विश्व के किसी भी लोकतांत्रिक देश में ऐसा नहीं होता। लेकिन हमारे यहां सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सेवानिवृत्त होने के बाद राज्यसभा में पहुंच जाते हैं। सेवानिवृत्ति के बाद लाभ के पदों को स्वीकार करते हैं। इसलिए संवैधानिक संस्थाओं की ओर देखने का जनता का नजरिया बदल जाता है। राज्यपाल जैसी संवैधानिक संस्था ने महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में किस तरह से गंदी राजनीति की, उसे पूरे देश ने देखा। यानी ऐसा होगा फिर भी इसके दूसरे पहलू की एक आशादायक तस्वीर भी है। यह नहीं माना जा सकता कि ऐसी संवैधानिक संस्थाओं में सच्चाई और कानून की परवाह करनेवाले लोग नहीं हैं। हमें सुप्रीम कोर्ट पर भरोसा है। वैसे ही ‘संवैधानिक’ चुनाव आयोग पर भी है। श्री शेषन के राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी को समर्थन देकर उन्हें वोट देनेवाली एकमात्र पार्टी यानी शिवसेना, यह इतिहास है। शिवसेना के ५६ वर्ष का ज्वलंत और देदीप्यमान इतिहास है। महाराष्ट्र के करोड़ों लोगों के मन और कलाई में शिवसेना है। शिवसेना एक स्वतंत्र इकाई है और उसके अनुसार निर्णय होते रहते हैं। ‘मिंधे’ गुट को लगे इसलिए कमलाबाई की कोठी पर दौलत लुटाकर वे शिवसेना का सार और पहचान नहीं खरीद सकते। शिवसेना निरंतर आगे बढ़नेवाली उफनती लहर है। लहर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखती। महाराष्ट्र के तमाम मराठी लोगों और हिंदू मन की हुंकार बनकर शिवसेना ५६ वर्षों से कार्य कर रही है। मलंगगढ़ से दुर्गाड़ी किले तक शुरू किए गए आंदोलन अयोध्या के बाबरी तक पहुंचे और शिवसेना ने नया इतिहास रचा। इस इतिहास के मालिक हमारे शिवसैनिक हैं। ५० खोके के बदले में इस इतिहास के पन्ने ‘मिंधे’ गुट नहीं मिटा सकता। मां को मां और बाप को बाप न माननेवाली नई संतान कमलाबाई ने महाराष्ट्र के विरोध में खड़ी की है। सत्तारूढ़ दल के रूप में मिले अधिकारों का बेजा इस्तेमाल कर राजनीतिक स्वार्थ के लिए संवैधानिक संस्थाओं को राजनीतिक अड्डा बनाने का प्रयास करके देशभर में अराजकता निर्माण करनेवाले कितने भी मस्तवाल हो जाएं, फिर भी हम निश्चिंत हैं। इस देश में न्याय है। लोकतंत्र जीवित है। कानून, सबूत और जनभावना को ठेस पहुंचाकर कोई भी संवैधानिक संस्था आगे नहीं जा सकती, जिसका हमें विश्वास है। हम हर तरह की लड़ाई के लिए तैयार हैं। सवाल न्याय और सच्चाई का है! महाराष्ट्र की अस्मिता और अभिमान का भी है। समझनेवालों को इशारा काफी है!

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