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संपादकीय : बढ़ते-बढ़ते वृद्धि!

दिनों-दिन बढ़ रही महंगाई ने देश की आम जनता का जीना मुश्किल कर दिया है। इसी बीच रिजर्व बैंक ने फिर एक बार महंगाई का बम धमाका किया है। देश के सभी बैंकों की ‘महाशक्ति’ रिजर्व बैंक ने शुक्रवार को फिर एक बार रेपो रेट में ०.५० प्रतिशत की बढ़ोतरी की है। रिजर्व बैंक द्वारा पिछले पांच महीने में रेपो रेट में की गई यह चौथी बढ़ोतरी है। हर बार रेपो रेट बढ़ाते समय रिजर्व बैंक ‘महंगाई को नियंत्रण में लाने’ इस मीठे शब्द का उपयोग करती है। लेकिन देश के केंद्रीय बैंक द्वारा बार-बार इस्तेमाल में लाए जानेवाला यह रटा-रटाया शब्द प्रत्यक्ष में कभी भी क्यों नहीं उतरता? महंगाई पर नियंत्रण लाने के लिए रिजर्व बैंक रेपो रेट बढ़ा रही है तो महंगाई कभी कम होती क्यों नहीं दिख रही है? इसके विपरीत रेपो रेट बढ़ने से बैंकों के नए कर्ज महंगे हो जाते हैं और पुराने कर्जों की किश्तें बढ़ जाती हैं। यानी महंगाई कम करने के नाम पर जनता का बाल से गला काटने का यह तरीका है। रेपो रेट में हुई ताजा दर वृद्धि को लेकर पिछले पांच महीनों में लगातार चार बार ब्याज दर में रिजर्व बैंक को वृद्धि करनी पड़ रही है तो इसका मतलब साफ है कि देश की अर्थव्यवस्था चरमरा गई है। बवंडर में फंसी नौका जैसे चक्रवाती तूफान के थपे़ड़ों में दिशाहीन होकर भटकती रहती है, वैसी ही स्थिति देश की अर्थव्यवस्था की हो गई है। अर्थव्यवस्था के बेकाबू हुए जहाज को किनारे पर लगाने का कोई ठोस प्रयास केंद्र सरकार की ओर से होता नहीं दिखाई दे रहा है। देश की केंद्र सरकार ‘महाशक्ति’ के तौर पर खुद की पीठ थपथपा रही है फिर भी दिनों दिन बढ़ती जा रही महंगाई के सामने इस महाशक्ति ने पूरी तरह से आत्म समर्पण कर दिया है। देश के चुनिंदा औद्योगिक घरानों को भरपूर सहूलियतें, उद्योग क्षेत्र की मुट्ठीभर मंडलियों को दी गई कर्जमाफी, धनाढ्यों पर दौलत लुटानेवाली नीति अपनाने पर अर्थव्यवस्था की नौका मार्ग छोड़कर भटकेगी नहीं तो क्या होगा? महंगाई को नियंत्रण में लाने और अर्थव्यवस्था की गाड़ी पटरी पर लाने की पूरी जिम्मेदारी रिजर्व बैंक की है। फिर केंद्रीय वित्त मंत्रालय की जिम्मेदारी क्या है? डॉलर की तुलना में रुपया दिन-ब-दिन गिर रहा है। दुनियाभर के सभी देशों की मुद्रा पर डॉलर की मजबूती के कारण दबाव बना हुआ है। विश्वभर के कई देशों की अर्थव्यवस्था संकट से गुजर रही है। शेयर बाजार में अचानक व अप्रत्याशित बड़ी उथल-पुथल फिर से होते हुए दिखाई दे रही है। आर्थिक उच्चांक पर इस तरह की गंभीर परिस्थिति होते हुए भी उसका मुकाबला करने के लिए केंद्रीय वित्त मंत्रालय असल में क्या कर रहा है? पूरे देश पर आर्थिक मंदी का संकट मंडरा रहा है, केवल वित्त विभाग ही नहीं, बल्कि पूरी सरकार को हड़बड़ाकर जागना चाहिए। आर्थिक संकट का मुकाबला करने के लिए कारगर नीति अथवा कार्य प्रारूप सुनिश्चित करके देश के समक्ष रखना चाहिए। हालांकि दुर्भाग्य से देश की बीमार अर्थव्यवस्था को ठीक करने के लिए प्रभावी रणनीति बनाने की बजाय केंद्र सरकार विपक्षी पार्टियों की सरकारें गिराने, विधायकों-सांसदों को तोड़ने और २४ घंटे चुनाव की रणनीति बनाने में मशगूल है। रिजर्व बैंक द्वारा रेपो रेट बढ़ाने के कारण महंगाई कम नहीं होती, यह पिछले पांच महीने में चार बार साबित हुआ है। खुद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल ही में एक सेमिनार में यह राय व्यक्त की थी कि ‘महंगाई के रौद्र रूप को संभालना रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति के दायरे से बाहर की चीज हो गई है।’ इसी सेमिनार में वित्त मंत्री ने यह भी कहा था कि सरकार की राजकोषीय नीति और रिजर्व बैंक की साख नीति दोनों हाथ से हाथ मिलाकर एक साथ महंगाई का मुकाबला करें। लेकिन भाषण में दिया गया यह बयान प्रत्यक्ष रूप से कब अमल में आएगा? बेलगाम हुई महंगाई की धधक को कौन और वैâसे बुझाए, ये केंद्रीय सरकार और रिजर्व बैंक को साथ बैठकर सुनिश्चित करना चाहिए। रिजर्व बैंक बार-बार रेपो रेट बढ़ाता है और ‘बढ़ते-बढ़ते वृद्धि…’ इस पद्धति से गृह कर्ज, वाहन कर्ज सहित सभी ऋणों की किश्तें बढ़ने से महंगाई की आग में और तेल पड़ता है। अब तो ऐन दशहरा-दिवाली के मुहाने पर रिजर्व बैंक ने रेपो रेट बढ़ाकर कर्जदारों को बड़ा झटका दिया है। मई महीने में रेपो रेट ४ प्रतिशत था, जो पांच महीने में चार बार बढ़ाने से ५.९ प्रतिशत पर पहुंच गया है। दस लाख के कर्ज पर प्रति महीने लगभग एक हजार रुपए इतनी भयंकर यह वृद्धि है। भक्ति रस में नहाकर निकली भक्त मंडली ब्याज दर की यह वृद्धि खुशी से सहन करे लेकिन आम जनता पर महंगाई के साथ-साथ ब्याज दर का यह बोझ किसलिए?

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