" /> मंदिरों को भी खोलें!, माय लॉर्ड, यहां भी आर्थिक कारोबार होता ही है!

मंदिरों को भी खोलें!, माय लॉर्ड, यहां भी आर्थिक कारोबार होता ही है!

विगत ६ महीनों से देशभर के सभी प्रार्थना स्थलों में ‘लॉकडाउन’ है। उनमें मंदिर भी हैं। भगवान को भी कोरोना ने बंदी बना कर रख दिया। अब ये मंदिर, प्रार्थना स्थल, धार्मिक स्थल खोलो, ऐसी मांग जोर पकड़ने लगी है। पर्युषण काल में मंदिरों को खोलने की अनुमति जैन धर्म के भाइयों को मिल गई। यह अनुमति सर्वोच्च न्यायालय ने दी। कोरोना का संकट बड़ा है इसलिए सरकार को कठोर कदम उठाने पड़े। कोरोना का डर न होता तो न्यायालय भी ‘वर्चुअल’ पद्धति से नहीं चल रहे होते। कोरोना के भय के कारण सर्वोच्च न्यायालय का कामकाज भी हमेशा की तरह खुले ढंग से नहीं चला परंतु उसी न्यायालय को ऐसा लगता है कि सरकार को अन्य सभी पाबंदियों को शिथिल करना चाहिए। पर्युषण काल में मुंबई के तीन मंदिर खोलने की अनुमति सर्वोच्च न्यायालय ने दे दी, ये अच्छा ही हुआ। पर्युषण पर्व के आखिरी २ दिन ये तीन जैन मंदिर खोले जाएंगे। उस समय १२ से ६५ उम्र के पांच नागरिकों को एक समय में प्रवेश मिलेगा और दिन भर में सिर्फ २५० श्रद्धालुओं को प्रवेश मिलेगा। ऐसा तय हुआ है। दिन भर में सिर्फ २५० के हिसाब से एक मंदिर में ७५०। अर्थात श्रद्धालुओं का कुल योग २५०० भी नहीं होता है। मुंबई-ठाणे के जैन बंधुओं की जनसंख्या को देखते हुए २५०० श्रद्धालुओं का चुनाव कैसे किया जाए? न्यायालय ने इस संदर्भ में महाराष्ट्र सरकार को फटकार लगाई है। न्यायालय का कहना है कि, ‘एक तरफ राज्य में आर्थिक व्यवहार वाली तमाम गतिविधियों को अनुमति दे दी गई। मतलब पैसों का संबंध होगा तो खतरा मोल लेने को राज्य तैयार हैं लेकिन मंदिर-मस्जिद खोलने का धार्मिक सवाल आता है सिर्फ तब ‘कोरोना’ की याद आती है। यह बेहद अजीबोगरीब है। न्यायालय का हर निर्णय, ‘यस माय लॉर्ड…, ‘जी महाराज’ कहते हुए गर्दन झुकाकर ही स्वीकार करना पड़ता है। उस पर इस निर्णय का स्वरूप धार्मिक होने के कारण इसका सम्मान करना ही होगा लेकिन मंदिरों में फिलहाल गर्दी ना हो यह निर्णय लेने की जिम्मेदारी राज्य पर आ गई है, इसका भी विचार होना चाहिए। कोरोना कोई राज्य अथवा किसी सरकार द्वारा नहीं लाया गया है। इसमें राजनीति का ऐसा कोई संबंध होता तो देश के गृहमंत्री अमित भाई शाह व केंद्रीय कैबिनेट के पांच छह मंत्रियों को ‘कोरोना’ के संक्रमण के कारण अस्पताल नहीं जाना पड़ा होता। सरकार द्वारा लिया गया कठोर निर्णय जनता के स्वास्थ्य हित को ध्यान में रखकर लागू किया गया है। पंढरपुर की यात्रा इस बार नहीं हुई। इसका दुख पूरे महाराष्ट्र को है ही। बकरीद की कुर्बानी के मुद्दे पर विवाद हुआ लेकिन बाद में सभी ने सामंजस्य की भूमिका स्वीकार कर ली। ईसाई बंधुओं ने माउंट मैरी का मेला रद्द कर दिया। मक्का की हज यात्रा भी नहीं हुई और रोम की वेटिकन सिटी में आज भी सन्नाटा है। मुंबई-पुणे के सार्वजनिक गणेशोत्सव मंडल में श्रद्धालु जाना टाल रहे हैं। विसर्जन के नियम भी सख्त कर ही दिए गए हैं। पुणे के महापौर ने विसर्जन के लिए घर-घर पानी की मोबाइल हौद लेकर घूमने का निर्णय लिया है। यह एक प्रकार की मजबूरी ही है। कोरोना है ही तथा और कुछ समय तक रहेगा। फिर भी महाराष्ट्र में धीरे-धीरे कई क्षेत्रों में खुलना और बंद होना जारी ही है। इसमें न्यायालय के कहे अनुसार वित्तीय लेनदेन का सवाल उठता है, ऐसा नहीं है। देश की अर्थव्यवस्था स्पष्ट रूप से डांवांडोल हो रही है। इसलिए राज्य चलाने के लिए वित्तीय मामलों पर विचार करना ही होगा तथा इसमें क्या गलत हुआ है? वे वित्तीय मामले कहें तो कर्मचारियों को पगार मिलती है, छोटे-मोटे दुकानदारों, विक्रेताओं को गुजारेभर का पैसा मिलता है। उनका घर फिलहाल चल रहा है इतना ही है। इसमें किसी का व्यक्तिगत स्वार्थ होने की कोई वजह नहीं है। हम खुद मंदिर, व्यायामशाला खोल दिए जाएं, ऐसा मत रखते हैं। मंदिर की भी एक अर्थनीति होती ही है और उस पर भी कई लोगों की आजीविका निर्भर है। भजन प्रवचन करने वाले महाराज तो हैं ही लेकिन उनके साथ-साथ पेटी, तबला बजाने वाले, कीर्तन गानेवाले भी हैं। इन सभी की आवक ६ महीने से रुकी हुई है। मंदिर के बाहर गाय को चारा खिलाने वाली वृद्ध दंपति प्रतिदिन धार्मिक श्रद्धा के सहारे अपना चूल्हा जलाकर अपने बाल-बच्चों का लालन-पालन करते हैं। सिख समाज का ‘लंगर’ बंद है। इससे कईयों की दुर्दशा हो रही है। कोई भी राज्य लोगों की बदहाली नहीं देख सकता है। यह सब खोल दिए जाएं और लोग काम-धंधे पर जा सकें, यह सभी की चाहत है। मंदिर जनता का श्रद्धास्थल है और मंदिर में बैठे भगवान दुर्बलों को सहारा देते हैं। यह हर किसी के विश्वास पर निर्भर है। करोड़ों लोगों की आजीविका का प्रश्न मंदिर व अन्य प्रार्थनास्थल हल करते हैं। इसलिए मंदिरों का मुद्दा भी वित्तीय कारोबार का ही है माय लॉर्ड। भूल चूक माफ!