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संपादकीय : एडवोकेट प्रकाश आंबेडकर जनभावना भड़का दी, आगे क्या?

भ्रष्टाचार और अत्याचार इन बातों को राजनीति से अलग करके ही इस बारे में सोचने की आदत डालनी चाहिए। लेकिन वर्तमान माहौल में यह संभव नजर नहीं आता है। सर्वोच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र की गैरकानूनी सरकार के संदर्भ में सुनवाई १ नवंबर तक के लिए आगे बढ़ा दी है। उसी समय वास्तविक शिवसेना किसकी व धनुष-बाण को लेकर क्या निर्णय लेना है, यह अधिकार चुनाव आयोग का होने की बात कहने से दुविधा और बढ़ गई है। चुनाव आयोग सहित देश के सभी प्रमुख राष्ट्रीय संस्थानों का फिलहाल किस तरह से राजनीतिक नुकसान हुआ है, यह सब समझ रहे हैं। लेकिन कहे कौन! परंतु साहस करके यह बोलने व सर्वोच्च न्यायालय को खरी-खरी सुनाने का काम एडवोकेट प्रकाश आंबेडकर ने किया है। बीच में सातारा में बोलने के दौरान उन्होंने स्पष्ट कहा कि संविधान ने और संसद ने चुनाव आयोग की तटस्थता को संजोकर रखा था। लेकिन शिवसेना के प्रकरण में दुर्भाग्य से सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की वजह से वह खतरे में पड़ गया है। एडवोकेट आंबेडकर ने आगे ऐसा भी कहा है कि ‘इसके बाद दलगत विवादों के मामले में चुनाव आयोग निर्णय लेगा, यह जो संदेश इस फैसले  के जरिए आया है, वो गलत है। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय अपने निर्णय पर पुनर्विचार करे।’ वर्तमान परिस्थितियों में प्रकाश आंबेडकर का मत महत्वपूर्ण है। एक तो उन्हें राजनीति और कानून की समझ है और मुख्यत: वे संविधान के रचयिता डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की विरासत बताते हैं। देश में ‘ईडी’, ‘सीबीआई’ जैसी केंद्रीय जांच एजेंसियों का दुरुपयोग किया जा रहा है। विरोधियों को जेल में डालने के लिए इन संस्थाओं का राजनीतिक इस्तेमाल किया जा रहा है, ऐसा हमला भी आंबेडकर ने किया और ये सब असंवैधानिक होने की बात उन्होंने जोर देकर कही। परंतु देश की मीडिया ने एडवोकेट आंबेडकर के स्पष्ट विचारों को प्रसारित करना टाल दिया। स्पष्ट व स्वतंत्रता से संबंधित विचारों को महत्व नहीं देना है, ऐसा मानो सरकारी आदेश होगा और उसके अनुसार हमारे चौथे स्तंभ का ‘स्वाभिमानी’ कार्य चल रहा है। एडवोकेट प्रकाश आंबेडकर की राजनीति व उनकी भूमिका के विषय में अलग चर्चा हो सकती है। लेकिन देश की संवैधानिक संस्थाओं के संदर्भ में उनके द्वारा समय-समय पर अपनाई गई भूमिका राष्ट्रहित में ही रही हैं व इस बारे में वे डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के उत्तराधिकारी के रूप में फबते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने विधायकों की अपात्रता के मामले की सुनवाई नवंबर तक आगे बढ़ा दी है। ये ठीक है, परंतु चुनाव चिह्न व पार्टी की वैधता से संबंधित निर्णय न्यायालय द्वारा चुनाव आयोग को सौंपते ही महाराष्ट्र के बेईमान गुट ने ‘वी फॉर विक्ट्री’ का निशान दिखाते हुए खुशी मनाई। यह झकझोरनेवाली बात है! धनुष-बाण चिह्न शिवसेना को नहीं मिलेगा। वो हमें ही मिलेगा, ऐसा बेईमान गुट के लोग पहले से ही कह रहे थे और अभी भी गुलाबराव पाटील जैसे मंत्री सार्वजनिक कार्यक्रमों में बार-बार कह रहे हैं। धनुष-बाण चिह्न शिवसेना को नहीं मिलेगा और उसके बाद शिवसेना के और पांच-छह विधायक हमारे गुट में आएंगे, ऐसा गुलाबराव पाटील कहते हैं। इसका अर्थ ये है कि शिवसेना तोड़ते समय ही यह निर्णय तय हो गया था और चुनाव आयोग यदि संवैधानिक संस्था होगी तो संवैधानिक संस्थाओं की आजादी छीन ली गई है, ऐसा यदि इस पर कोई कहे तो? ठीक इसी वजह से शिवसेना ने सर्वोच्च न्यायालय से न्याय की गुहार लगाई है। सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने सत्य और न्याय की गेंद चुनाव आयोग के पाले में डाल दी है। यह उचित नहीं है, ऐसा मत कई संविधान विशेषज्ञों ने भी व्यक्त किया है। एडवोकेट प्रकाश आंबेडकर ने भी यही कहा है। उन्होंने कहा है कि ‘सर्वोच्च न्यायालय को इसके जरिए एक मौका मिला था, परंतु दुर्भाग्य से पार्टी के चुनाव चिह्न पर निर्णय देने का अधिकार चुनाव आयोग का है या नहीं, इस संदर्भ में संवैधानिक प्रावधानों की जांच नहीं की गई।’ महाराष्ट्र में सत्ता स्थापना के समय राज्यपाल द्वारा अपनाई गई भूमिका पर भी एडवोकेट आंबेडकर ने सवाल खड़े किए। अलगाववादी गुट के विधायकों ने पार्टी आदेश को नजरअंदाज करके मतदान किया। उसी समय उन विधायकों पर अपात्रता की लटकती तलवार राज्यपाल को दिखनी चाहिए थी। इस दौरान राज्यपाल ने संविधान के अनुरूप काम नहीं किया। संविधान, कानून का दुरुपयोग हुआ। अलग हुए गुट के विरोध में दसवें शेड्यूल के अनुसार अपात्रता की कार्रवाई के लिए याचिका दायर की गई है। उस समय जो पीठासीन अधिकारी थे, उन्होंने विधायकों द्वारा ‘व्हिप’ के उल्लंघन का निर्णय सुनाया ही है इसलिए नई सरकार आने पर उसी पीठासीन कुर्सी पर बैठे दूसरे अधिकारी इस अलगाववादी गुट के तारणहार कैसे  बन सकते हैं? संविधान का इस तरह से खिलवाड़ महाराष्ट्र में हुआ इसलिए शिवसेना ने सर्वोच्च न्यायालय में न्याय की गुहार लगाई। गैरकानूनी सरकार के संबंध में समय सीमा में निर्णय होना जरूरी है, परंतु यहां वर्तमान सरकार व उसमें शामिल हुए बेईमान समूह को किस तरह से संरक्षण मिलेगा, इस नजरिए से कुछ तो कराए जाने की तस्वीर तैयार हुई है। यह भारतीय संविधान की हत्या है। इस खून का पर्दाफाश करने का काम संविधान के रचयिता के उत्तराधिकारी एडवोकेट प्रकाश आंबेडकर ने किया। इसके लिए उनका जितना अभिनंदन किया जाए, कम ही है। हमारे न्यायाधीश ‘अव्वल दर्जे’ के और ‘जबरदस्त सत्यनिष्ठा वाले’ लोग होने चाहिए तथा न्यायदान के कार्य में सरकार का अथवा अन्य किसी का अवरोध आए तो उन्हें उसकी परवाह नहीं करनी चाहिए, ऐसा पंडित जवाहरलाल नेहरू ने २४ मई, १९४९ को संविधान समिति में कहा था। परंतु पं. नेहरू के ये मापदंड वर्तमान सरकार को स्वीकार नहीं है। बहुधा उसी वजह से मुकुल रोहतगी ने अटॉर्नी जनरल की जिम्मेदारी अस्वीकार की होगी। सरकार के राजनीतिक प्यादे के रूप में केंद्रीय  जांच एजेंसियां व अन्य प्रमुख स्तंभों का इस्तेमाल होना ‘पीएफआई’ की कार्रवाई जितना ही राष्ट्र विघातक है और इन कार्रवाइयों को रोकने के लिए हमारा सर्वोच्च न्यायालय है। देश में स्वतंत्रता जितना ही लोगों की व्यक्तिगत आजादी भी महत्वपूर्ण है। भारतीय जनता पार्टी को जीतने की व सत्ता हासिल करने की पूरी आजादी है। लेकिन संविधान तथा अन्य संस्थाओं की इस तरह से क्षतिग्रस्त करके वे उसे हासिल न करें, इतनी ही अपेक्षा है। एडवोकेट प्रकाश आंबेडकर ने बीच में सामान्यत: इसी संविधान द्रोह पर उंगली उठाई थी। वे बोले यह महत्वपूर्ण है, परंतु डॉ. आंबेडकर के उत्तराधिकारी की हैसियत से शरीर पर काला कोट चढ़ाकर संविधान की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए उन्हें आगे आना चाहिए। चुनाव आयोग का क्या? देश की कोई भी संस्था आज तटस्थ, स्वतंत्र नहीं बची है। इसलिए चुनाव आयोग में पार्टी के चिह्न की ‘सेटिंग’ हो गई है, ऐसी बातें अलग हुए गुट के मंत्री व विधायक महाराष्ट्र में करने लगे हैं। सर्वोच्च न्यायालय अपने निर्णय पर पुनर्विचार करे, ऐसा एडवोकेट आंबेडकर बोले तो इसी वजह से। आंबेडकर ने जनभावना को प्रज्वलित किया है, यह सत्य ही है लेकिन आगे क्या? यह सवाल है ही।

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