मुख्यपृष्ठसंपादकीयसंपादकीय : अलगाववादियों का उत्सव : आजादी का अमृत महोत्सव कहां है?

संपादकीय : अलगाववादियों का उत्सव : आजादी का अमृत महोत्सव कहां है?

पीडीपी की अध्यक्षा और आजाद कश्मीर की समर्थक महबूबा मुफ्ती ने सीधे-सीधे हिंदुस्थान की संप्रभुता को चुनौती दी है। श्रीमती मुफ्ती ने उनके ‘ट्विटर’ अकाउंट पर कश्मीर का ध्वज लहराया। तिरंगे की बगल में कश्मीर का ध्वज, ऐसी यह तस्वीर है। कश्मीर से अनुच्छेद-३७० रद्द कर दिया गया, उसी तरह से यह अलग ध्वज भी रद्द कर दिया गया। मोदी व अमित शाह आदि ने कश्मीर के अब शत-प्रतिशत हिंदुस्थान का अविभाज्य अंग होने का एलान करके आनंदोत्सव भी मनाया। परंतु कश्मीरी पंडितों की अवस्था हो या अलगाववादियों का दुर्भाग्यपूर्ण खेल कुछ भी बदला नजर नहीं आता। अलगाववादी संगठनों का जहरीला नाग फुंफकार मार ही रहा है। मजेदार यह है कि प्रधानमंत्री मोदी ने रविवार को ही ‘मन की बात’ कार्यक्रम में कहा था कि ‘आजादी के अमृत महोत्सव ने जन आंदोलन का रूप धारण कर लिया है।’ इस मौके पर उन्होंने नागरिकों से २ से १५ अगस्त के दौरान अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर तिरंगे की तस्वीर प्रकाशित करने का आह्वान किया था। मोदी ने जो कहा उसके विपरीत बर्ताव महबूबा ने किया तथा हिंदुस्थान सरकार द्वारा प्रतिबंधित किए गए कश्मीर का झंडा फहराकर दिखाया। महबूबा का कहना है कि उनका ध्वज जम्मू-कश्मीर से हटाया गया होगा, परंतु कश्मीरवासियों के मन से व सामूहिक चेतना से यह कश्मीरी ध्वज हटाया नहीं जा सकता। महबूबा का यह कहना मतलब मोदी और उनके लोगों के लिए चुनौती है। इस चुनौती का सामना मोदी और उनकी सरकार किस तरह से करेगी? इसी महबूबा के साथ किसी दौर में भाजपा ने मधुर गुलाबी गृहस्थी बसाई थी और उस दौर में प्रखर हिंदुत्ववाद, राष्ट्रवाद आदि के वस्त्र उन्होंने अंत:पुर की खूंटी पर टांग दिए थे। इन वस्त्रों को घर से बाहर फेंककर महबूबा ने अपनी मूल भूमिका का नगाड़ा बजाना अब शुरू किया है। सवाल इतना ही है कि भारतीय जनता पार्टी व उनकी केंद्र  सरकार कश्मीर में झंडा फहरानेवाली अपनी एक समय की सहयोगी के खिलाफ क्या कार्रवाई करनेवाली है? एक तरफ मोदी सरकार, सोनिया गांधी, राहुल गांधी, संजय राऊत आदि अपने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ झूठी-फर्जी कार्रवाइयां करके कर्तव्य परायण होने का दिखावा कर रही है तो अब स्वतंत्रता संग्राम में बड़ा योगदान देनेवाले ‘नेशनल हेरॉल्ड’ को ही सीलबंद करके ‘ईडी’ वालों ने वहां अपना झंडा फहरा दिया है। इस सीलबंद कार्रवाई के बाद सोनिया गांधी के दिल्ली स्थित निवास स्थान के बाहर पुलिस का पहरा बढ़ गया है। लेकिन कश्मीर का ध्वज फहराकर देश को ही चुनौती देनेवाली श्रीमती महबूबा के संदर्भ में केंद्र सरकार  की दुम दबानेवाली नीति क्यों? इसका जवाब देश को मिलना चाहिए। स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव का फिलहाल जो राजनीतिक उत्सव वाला स्वरूप चलाया जा रहा है, वह उन्हें लाख-लाख मुबारक हो। परंतु मोदी के राज में एक महिला नेता द्वारा अलगाववाद का ध्वज फहराए जाने के बाद भी मोदी-शाह चुप कैसे  हैं? अथवा कानून का डंडा सिर्फ  तुम्हारे राजनीतिक विरोधियों की सांस नली बंद करने के लिए ही है क्या? यह एक बार स्पष्ट कहो। एक देश, एक संविधान, एक निशान, यही आजादी के अमृत महोत्सव का मंत्र होना चाहिए। इसे नाकाम करने का काम कश्मीर में किया गया। भारतीय जनता पार्टी को महबूबा आज भी चलती हैं। परंतु हिंदुत्ववादी-राष्ट्रवादी शिवसेना खत्म हो जाए, ऐसा उनका प्रयास है। कश्मीर में भी अलगाववादियों को बल दे रहे हैं और महाराष्ट्र में भी अलगाववादियों को महाबल दे रहे हैं, वह भी हिंदुत्व के नाम पर। इससे बड़ा ढोंग क्या हो सकता है? आजादी का अमृत महोत्सव भाजपा का निजी आंदोलन बन गया है। वास्तविक अमृत महोत्सव में देश के रोटी-कपड़ा और मकान की समस्या बरकरार है। मुख्यत: व्यक्तिगत आजादी का गला रोज घोंटा जा रहा है। ‘नेशनल हेरॉल्ड’ का कार्यालय सील करना, यह तो आजादी की लड़ाई के महान पर्व की हत्या करने जैसा ही मामला है। कश्मीर में पंडितों का पलायन और हत्या हो रही है। अलगाववादी सोशल मीडिया में अपने झंडे लहरा रहे हैं और दिल्ली में आजादी की मशाल जलानेवाले ‘यंग इंडिया’, ‘नेशनल हेरॉल्ड’ को ही ताला लगा दिया गया है। मुंबई में संजय राऊत को ‘ईडी’ द्वारा फंसाकर ‘सामना’ की आवाज और लड़ाई को रोकने का प्रयास चल रहा है। ‘हेरॉल्ड’ और ‘सामना’ ये दोनों माध्यम प्रखर राष्ट्रवादी हैं और महत्वपूर्ण हैं। परंतु किसी दौर में भाजपा के कंधे से कन्धा  सटाकर राजनीति करनेवाली, अलगाववाद का विष आज भी घोलनेवाली तथा अपने ‘ट्विटर’ अकाउंट पर ‘कश्मीर का ध्वज’ लहरानेवाली महबूबा को हाथ लगाने की हिम्मत केंद्र  सरकार में नहीं है। हिम्मत की बात की जाए तो आजादी के अमृत महोत्सव में प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को पाक द्वारा हथियाए गए हमारे कश्मीर में कदम रखना था। साथ में महाराष्ट्र के नवमर्द शिंदे, केसरकर, सामंत, भुसे को ले जाना चाहिए था। भाजपा के फेर  में पड़कर शिवसेना में फूट डालने के बाद से ‘नवमर्दों’ के इस समूह में भी हिंदुत्व का बड़ा जोश आ रहा है। इसलिए आजादी के अमृत महोत्सव में इस उत्साहित अलगाववादी समूह के साथ पाक व्याप्त कश्मीर में कदम रखकर देश के समक्ष आदर्श निर्माण करने की आवश्यकता है। ऐसा हम क्यों कह रहे हैं? क्योंकि चीन के विरोध के बाद भी अमेरिका की नैंसी पेलोसी ने ताइवान की जमीन पर कदम रखा। ताइवान चीन का हिस्सा है, इस मान्यता को खारिज कर दिया व अमेरिकी लोग ताइवान में घुस गए। चीन ने अमेरिका को चेतावनी देने के अलावा क्या किया? यहां हमारे देश के लद्दाख की जमीन पर चीनी सेना घुसकर बैठी है और ३८ हजार वर्ग किमी की जमीन पर कब्जा कर लिया है। कश्मीर में अलगाववादियों का झंडा लहराया और हम राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ छापेमारी और गिरफ्तारी करने में ही श्रेष्ठता मान रहे हैं। चीनी सेना यहीं है और महबूबा की ‘डीपी’ पर ‘कश्मीर’ का ध्वज भी वैसे ही है। देश में अलगाववादियों का इस तरह से ‘उत्सव’ चल रहा है। आजादी का अमृत महोत्सव केंद्र  के सत्ताधारियों का ‘दलीय’ कार्यक्रम बन गया है। परंतु देश की आम जनता के लिए आजादी का अमृत कहां है? इस सवाल का जवाब ढूंढ़ रहे हैं।

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