मुख्यपृष्ठनए समाचारसंपादकीय : कॉर्पोरेट आदिवासी अडानी ! ...जल, जंगल, जमीन की लड़ाई

संपादकीय : कॉर्पोरेट आदिवासी अडानी ! …जल, जंगल, जमीन की लड़ाई

संपूर्ण देश और देश की सार्वजनिक संपत्ति को एक ही मोदी मित्र उद्योगपति के गले उतारने की साजिश का खुलासा होने लगा है। धारावी पुनर्वास परियोजना के साथ-साथ उद्योगपति ‘मोदानी’ को मुंबई के अभ्युदय नगर, वर्ली के आदर्श नगर आदि बड़े भूखंड मिले हैं। राज्य की अन्य खाली जमीनों पर भी इसी औद्योगिक समूह की टेढ़ी नजर है। धारावी परियोजना देश का सबसे बड़ा ‘टीडीआर’ घोटाला है और इस लेन-देन में भाजपा का खुला हाथ है। अब इस ‘मोदानी’ डायनासोर के कदम मुंबई की सुवर्णभूमि बांद्रा रिक्लेमेशन कॉलोनी की ओर बढ़ रहे हैं। यह एक तरह से पूरी मुंबई को निगलने का मामला है, लेकिन देशभर में इस अजगरी प्रवृत्ति के खिलाफ आवाज उठाई जा रही है। धारावी को अडानीr यानी मोदानी के गले उतरने नहीं देंगे, इसके लिए शिवसेना सहित अन्य सभी राजनीतिक दल एक साथ आए और उन्होंने इस ‘मोदानी’ प्रवृत्ति के खिलाफ एक विशाल मोर्चा निकाला। अब इस मोदानी प्रवृत्ति के खिलाफ छत्तीसगढ़ के आदिवासी सड़कों पर उतर आए हैं। मोदानी के खिलाफ सबसे बड़ी लड़ाई देश के आदिवासी लड़ रहे हैं। इस लड़ाई में ‘मीडिया’ उनके साथ नहीं है और खुद को देशभक्त कहने वाली पार्टियां भी उनसे चार हाथ दूर हैं। मोदानी के आक्रमण के खिलाफ छत्तीसगढ़ के जंगलों में सत्याग्रह चल रहा है। छत्तीसगढ़ से कांग्रेस सरकार को योजनाबद्ध तरीके से हटाए जाने के बाद वहां के जंगल के कोयला खदानों और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के धंधों पर अडानी महाशय ने दावा किया। केंद्र की ‘मोदी’ सरकार ने जंगल के पेड़ों और वन्य जीवों की परवाह किए बिना तीन हजार एकड़ वन भूमि अडानीr को दे दी। जंगल में वन्य जीवों की सुरक्षा के लिए काम करने वाले संगठनों के विरोध को नजरअंदाज करते हुए यह वन भूमि अडानी को दे दी गई। हसदेव वन क्षेत्र में पेड़ों की कटाई शुरू हो गई है और लगभग दस हजार पेड़ ‘अडानी’ के उद्योग के लिए कुर्बान कर दिए जाएंगे। आदिवासियों ने इसके खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया। कोयला उत्पादन के लिए आदिवासियों के जंगल को नष्ट करना एक तरह से पर्यावरण को मौत के घाट उतारने के समान ही है। हसदेव वन क्षेत्र के हरिहरपुर, साल्ही, घाटबर्रा, फतेहपुर, बासेन, परसा इलाकों में भारी पुलिस सुरक्षा के बीच पेड़ों की कटाई की जा रही है और विरोध करने वाले आदिवासियों को गिरफ्तार कर जेल में ठूंसा जा रहा है। मोदी सरकार एक आदिवासी व्यक्ति को देश का राष्ट्रपति बनाने का ढिंढोरा पीट रही है, लेकिन हकीकत तो यह है कि जिस वन संपदा और जंगल भूमि पर आदिवासियों का जीवन निर्भर है, उस पर यही सरकार बुलडोजर चला रही है। आदिवासी जल, जंगल और जमीन के मालिक हैं। वे जंगल के स्वामी हैं, लेकिन एक उद्योगपति के फायदे के लिए हजारों पेड़ों को काटकर जंगल को नष्ट किया जा रहा है। अगर जंगल उजड़ जाएंगे तो आदिवासी कहां जाएंगे? यह सवाल है। कोरबा से लेकर सरगुजा, झारखंड और ओडिशा के अंतिम छोर तक फैला हसदेव जंगल मध्य भारत का ‘फेफड़ा’ माना जाता है। प्राणवायु का सबसे बड़ा भंडार हसदेव अरण्य है। यह विशाल वन क्षेत्र अपनी बायोडायवर्सिटी (जैव विविधता) के कारण मध्य भारत के लिए जीवनदाई रहा है। इसी वन क्षेत्र में मोदी सरकार ने अपने अडानी महाशय को ‘कोल ब्लॉक’ के लिए जमीन दे दी। छत्तीसगढ़ के आदिवासी और यहां के जंगल देश का वैभव हैं। जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने व्यापार के लिए जंगलों पर कब्जा कर लिया, तब देश के पहले जंगल सत्याग्रह का बिगुल गांधीजी की प्रेरणा से छत्तीसगढ़ में ही फूंका गया था। भारत का पहला जंगल सत्याग्रह २१ जनवरी १९२२ को यहीं सिहावा क्षेत्र में शुरू हुआ था। सत्याग्रह का उद्देश्य स्पष्ट था। जल, जंगल और जमीन पर स्थानीय ग्रामीणों और आदिवासियों का ही अधिकार होना चाहिए, यही उस संघर्ष का उद्देश्य था। यह लड़ाई आजादी के इतिहास में छत्तीसगढ़ जंगल सत्याग्रह के नाम से प्रसिद्ध है। आदिवासियों के इस संघर्ष में गांधीजी खुद शामिल हुए थे, लेकिन आज स्वतंत्र भारत में छत्तीसगढ़ के आदिवासियों को अपने अधिकारों के लिए फिर से संघर्ष करना पड़ रहा है। एक उद्योगपति ने वहां के आदिवासियों की जमीन, जंगल और पानी पर कब्जा कर लिया और उस उद्योगपति के लिए हसदेव जंगल के दस हजार पेड़ काटे जा रहे हैं। आंदोलनकारी आदिवासियों को जान से मारने की धमकी दी जा रही है और विरोध किया तो ‘आतंकवादी’ करार देकर जेल में सड़ा दिया जाएगा, ऐसी चेतावनी दी जा रही है। एक उद्योगपति के फायदे के लिए देश की सार्वजनिक संपत्ति को नीलाम कर दिया गया और अब ‘जल, जंगल’ को नष्ट कर आदिवासी जनजाति को ही बर्बाद कर दिया जा रहा है। पहले ही अवैध वनों की कटाई के कारण पर्यावरण का संतुलन बिगड़ गया है। तापमान बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में ‘कॉप-२८’ संयुक्त राष्ट्र विश्व जलवायु सम्मेलन में हाजिरी लगाई। विश्व की १७ फीसदी जनसंख्या भारत में है। लेकिन मोदी ने कहा कि वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में भारत का योगदान केवल ४ प्रतिशत है। मुंबई-दिल्ली जैसे राजधानी शहरों में प्रदूषण खतरे के स्तर को पार कर चुका है। मुंबई में ‘आरे’ जंगल को बेरहमी से खत्म कर दिया गया और अब छत्तीसगढ़ के जंगल को नष्ट किया जा रहा है। २२ जनवरी को प्रधानमंत्री राम मंदिर का उद्घाटन कर रहे हैं। श्रीराम का आधा जीवन वन में ही व्यतीत हुआ। कम से कम उनके लिए तो जंगलों को बचाएं। अडानीr नामक कॉर्पोरेट आदिवासी बनाकर जंगल नष्ट करना, ये जलियांवाला बाग हत्याकांड जितना ही भयानक है। छत्तीसगढ़ के आदिवासी अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं। उनका नेतृत्व करने के लिए महात्मा गांधी नहीं हैं। फिर भी आदिवासियों को लड़ना ही होगा!

अन्य समाचार