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संपादकीय: ‘बाजारू’ शिक्षा पर अंकुश!

हमारे देश की निजी शिक्षा प्रणाली यानी शिक्षा सम्राटों की चरागाह बन गई है। ये शिक्षा संस्थान मनमाने ढंग से शुल्क वसूल करके लूटपाट करते हैं और सरकारें भी शिक्षा संस्थानों को डकैती का आशीर्वाद देकर शिक्षा सम्राटों के पाप में सहभागी हो जाती हैं। सरकारों एवं संस्थान चालकों की अभद्र मिलीभगत से विद्यार्थियों और अभिभावकों की जो लूट होती है, उसके बारे में कोई विचार नहीं करता। हालांकि सर्वोच्च निर्णय के एक ताजा आदेश से सरकार के समर्थन पर बेरोकटोक लूट करनेवाले शिक्षा सम्राटों को करारा झटका लगा है। यह फैसला आंध्र प्रदेश तक सीमित है फिर भी देश की कुल शिक्षा व्यवस्था और शैक्षणिक संस्थानों के नाम पर दुकानदारी करनेवाले शिक्षा सम्राटों पर दूरगामी असर डालनेवाला यह फैसला है। आंध्र प्रदेश सरकार ने अचानक एक फरमान जारी करके राज्य की मेडिकल शिक्षा तकरीबन सात गुना महंगी कर दी। निजी मेडिकल कॉलेजों को २४ लाख रुपए तक फीस बढ़ाने की छूट देनेवाला यह निर्णय आंध्र प्रदेश सरकार ने लिया था। हालांकि शिक्षा सम्राटों के लिए फायदेमंद और अभिभावकों की आंखें सफेद कर देनेवाला आंध्र सरकार का यह फैसला सर्वोच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया है। दरअसल, आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने इससे पहले आंध्र सरकार की इस बेतहाशा फीस वृद्धि के समझ से परे फैसले को खारिज कर दिया था। एमबीबीएस की पढ़ाई करनेवाले विद्यार्थियों के शैक्षणिक शुल्क एक ही झटके में सात गुना बढ़ाने के आंध्र सरकार के निर्णय को उच्च न्यायालय द्वारा स्थगित किए जाने के बाद भी शिक्षा सम्राटों ने अड़ियल रुख नहीं बदला। संबंधित शिक्षा संस्थान ने इस फैसले के विरोध में अपील करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। ‘नारायणा मेडिकल कॉलेज’ उस संस्थान का नाम है। सरकारी फैसले से मिलनेवाली ‘कमाई’ हाथ से निकलने के कारण ‘नारायणा’ सुप्रीम कोर्ट गया। दुकानदारी करनेवाले शिक्षा संस्थान की यह लालच एक बार समझी जा सकती है। लेकिन उच्च न्यायालय में मुंह जलने के बाद भी आंध्र प्रदेश सरकार ने इन शिक्षा सम्राटों के साथ सुप्रीम कोर्ट में चुनौती याचिका दायर की। बाजारू निजी संस्थान के प्रति सरकार द्वारा इतना अपनापन दिखाने की जरूरत क्या है? आखिर में जो होना था वही हुआ। हाई कोर्ट की तरह ही सुप्रीम कोर्ट में भी सरकार और शिक्षा संस्थान को झटका लगा। सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र सरकार और याचिकाकर्ता की एक भी नहीं सुनी। न्यायाधीश ने आंध्र उच्च न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा ही, लेकिन ‘शिक्षा कोई नफाखोरी का कारोबार नहीं, शिक्षा ये वाजिब होनी चाहिए,’ ऐसी ताकीद अपने पैâसले में दी है। शैक्षणिक फीस में सात गुना बढ़ोतरी कदापि समर्थनीय नहीं है, ऐसा निरीक्षण भी न्यायाधीश ने दर्ज कराया। ‘नारायणा’ जैसे महंगे निजी शिक्षा संस्थान में एमबीबीएस की पढ़ाई करनेवाले विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों को बड़ी राहत इस निर्णय से मिली। ऐसा नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने केवल आंध्र उच्च न्यायालय की पीड़ादायक फीस वृद्धि को रद्द करने के फैसले को बरकरार रखा, बल्कि चुनौती याचिका दायर करनेवाले शिक्षा संस्थान और आंध्र सरकार को पांच-पांच लाख रुपए जुर्माना भी लगाया। निजी शिक्षा संस्थानों की तिजोरियां भरने के लिए ‘सुपारी’ लेने जैसा आंध्र सरकार का यह आचरण आपत्तिजनक था और उसकी उचित सजा सुप्रीम कोर्ट ने दी। मनमाने ढंग से फीस सुनिश्चित करना और जैसा लगे वैसे मनमाने तरीके से वृद्धि करना, यह केवल आंध्र प्रदेश में ही होता है, ऐसा नहीं है। देश के हर राज्यों में निजी शिक्षा संस्थान बड़े पैमाने पर खुल गए हैं और हर तरफ इस तरह की लूट जारी है। मेडिकल, इंजीनियरिंग, प्रबंधन विज्ञान जैसे उच्च शिक्षा में ही नहीं तो बेहद ‘जूनियर केजी’ से ही हर वर्ष लाखों रुपए की फीस वसूलनेवाले शिक्षा सम्राटों की व्हाइट कॉलर टोलियां गल्ली से लेकर दिल्ली तक सक्रिय हैं। किसी भी सरकार का उन पर नियंत्रण नहीं रह गया है। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय के ताजे फैसले से शिक्षा संस्थानों की दुकान खोलकर विद्यार्थियों में ‘ग्राहक’ खोजनेवाले बाजारू संस्थानों और शिक्षा सम्राटों पर अंकुश लगेगा। शिक्षा प्रणाली में उदारीकरण और निजीकरण की नीति अपनाने के बाद से शिक्षा का व्यापार शुरू हो गया। शिक्षा जैसे पवित्र क्षेत्र को मुनाफाखोरी का रोग लग गया। कोर्ट ने अपना काम किया। अब केंद्र और हर राज्य की सरकारों को भी लूटमार करनेवाले देशभर के शिक्षा सम्राटों के कीड़ों की कोई जालिम दवा ढूंढ़नी चाहिए।

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