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संपादकीय : देवड़ा का ‘मिंधे’ विजन!

पूर्व केंद्रीय मंत्री मिलिंद देवड़ा ने कांग्रेस छोड़ दी है। देवड़ा परिवार का कांग्रेस से ५५ साल पुराना नाता रहा। मुरली देवड़ा मुंबई कांग्रेस के बड़े आदमी थे और गांधी परिवार में मुरली देवड़ा का काफी वजन था। कांग्रेस के कारण ही देवड़ा परिवार केंद्र में सर्वोच्च पदों पर आसीन हुआ। लेकिन मिलिंद देवड़ा ने अब कांग्रेस का त्याग कर दिया है और महाराष्ट्र में नवगठित ‘मिंधे’ गुट में शामिल हो गए हैं। कांग्रेस एक विचारधारा है, लेकिन ‘मिंधे’ गुट में कौन सी विचारधारा है कि जिसके लिए उन्हें ५० साल के कांग्रेस के अपने रिश्ते को तोड़ने की जरूरत पड़ी? राहुल गांधी के खास भीतरी गुट में मिलिंद देवड़ा का समावेश था, लेकिन रविवार को गांधी की ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ शुरू होते ही देवड़ा ने कांग्रेस छोड़ दी। यह मुहूर्त भाजपा ने ही निकाला होगा। देवड़ा लगातार दो लोकसभा चुनाव हार चुके हैं और जिस दक्षिण मुंबई से वे तीसरी बार चुनाव लड़ना चाहते थे, उस सीट पर शिवसेना के विद्यमान सांसद अरविंद सावंत मौजूद हैं। ऐसे में मौजूदा महागठबंधन में कांग्रेस के लिए इस सीट पर चुनाव लड़ना संभव नहीं था। देवड़ा ने इस जगह के लिए जिद की और आखिरकार ५० साल का रिश्ता तोड़कर मिंधेवासी बन गए। उनके पिता मुरलीभाई देवड़ा, जो कांग्रेस के प्रति वफादार थे, की आत्मा को अत्यंत कष्ट हुआ होगा। मिलिंद देवड़ा कहते हैं, ‘एकनाथ शिंदे का विजन बहुत बड़ा है। प्रधानमंत्री मोदी और शाह का भी देश के लिए बड़ा विजन है। सिर्फ मोदी विरोध ही कांग्रेस का कार्यक्रम है। मैं इसे स्वीकार नहीं करता।’ कांग्रेस छोड़ते वक्त मिलिंद देवड़ा ने अपना विजन स्पष्ट किया। उनका कहना है कि कांग्रेस ने पिछले ७० साल में देश में कुछ नहीं किया और कांग्रेस के पास न कोई विजन था और न है। लेकिन इसी बिना विजन की पार्टी ने माधवराव शिंदे, मुरली देवड़ा के नेतृत्व को उभारा और उन्हें सत्ता तक पहुंचाया। आज ज्‍योतिरादित्‍य शिंदे भी भाजपा में शामिल हो गए और मिलिंद भाई सीधे मिंधे गुट में चले गए। सिर्फ एक-डेढ़ साल पहले शिवसेना से घात करके खोके के जरिए पैदा हुए मिंधे गुट में विजन है, इसका साक्षात्कार मिलिंद देवड़ा को हुआ। मिंधे गुट द्वारा महाराष्ट्र की जो लूट-खसोट चल रही है अगर यही वो विजन है तो क्या किया जाए? महाराष्ट्र को खत्म कर गुजरात ले जाया जा रहा है और मुख्यमंत्री मिंधे स्वच्छ चमकदार मंदिरों के फर्श पर पोंछा मार रहे हैं। क्या इसे ‘विजन’ कहा जाए? देवड़ा को विजन के बारे में बात करने की बजाय उन्हें मिंधे गुट में जाने की असली वजह बताना चाहिए। कांग्रेस पार्टी छोड़ना और अलग पैâसला लेना उनका निजी मसला है। लेकिन उन्होंने विजन का मुद्दा जानबूझकर निकाला है। देवड़ा का कहना है कि मोदी विरोध यही कांग्रेस का कार्यक्रम है। वे स्वयं भी किसी समय इस कार्यक्रम मैं शामिल हुए थे और उस विजन के समर्थक भी थे। मोदी और उनके लोगों ने देश में संविधान, कानून, नियम और संवैधानिक संस्थाओं को नष्ट कर दिया है। ‘हम करे सो कायदा’ ये उनकी नीति है। उन्होंने अपने पूंजीपति मित्र के लिए देश की सार्वजनिक संपत्ति बेचने के लिए रख दी है। राजनीतिक विरोधियों का मुंह बंद कर दिया जा रहा है। इस भीड़तंत्र के खिलाफ आवाज उठाना देशभक्त राष्ट्रीय दलों का कर्तव्य है। इसी मकसद से श्री राहुल गांधी ने ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ निकाली है। मिलिंद देवड़ा उस न्याय यात्रा में शामिल होने की बजाय मिंधे प्रा. लिमिटेड कंपनी में शामिल हो गए। मोदी-शाह के सहयोग से मिंधे गुट ने शिवसेना में डाका डाला। लोग उस डवैâती का समर्थन नहीं करते। महाराष्ट्र के गौरव और स्वाभिमान को नष्ट करने वाले चोरों की इस मंडली में यदि किसी को कोई विजन नजर आता है तो वह विजन उन्हीं को मुबारक हो। मिलिंद देवड़ा ने कभी इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, मनमोहन सिंह के अद्वितीय नेतृत्व को स्वीकार किया था, लेकिन अब उन्हें मिंधियों के बौने-बचकाने नेतृत्व में काम करना पड़ेगा। मिंधे गुट के लिए देवड़ा का क्या महत्व है? मिलिंद देवड़ा का कोई खास जनाधार नहीं है। उद्योगपतियों के समूह में उनका उठना-बैठना है। मिंधे गुट को उस काम के लिए दिल्ली में एक ‘दूत’ मिल गया और देवड़ा को ज्यादा से ज्यादा मिंधे गुट का दिल्ली का ‘दूत’ के तौर पर काम मिलेगा। बदले में राज्यसभा मिलेगी। उद्योगपतियों की मध्यस्थता से ही देवड़ा मिंधे गुट में पहुंचे। मिंधे गुट को दिल्ली में एक ‘पटेल’ मिला और देवड़ा को एक नया विजन मिला। इसका कोई राष्ट्रीय कारण या सामाजिक कारण है ही नहीं। महाराष्ट्र के हित का तो कोई मुद्दा ही नहीं है। देवड़ा को क्या करना चाहिए यह उनका अपना मामला है, लेकिन यह कहकर कि मिंधे गुट के विजन की वजह से उन्होंने कांग्रेस छोड़ी, वह खुद ही अपना अपमान न करें, बस इतना ही!

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