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संपादकीय : चींटी ने मेरू पर्वत निगल लिया क्या?

राज्यसभा चुनाव में भाजपा ने छठी सीट जीत ली है। इस परिणाम से महाविकास आघाड़ी को बड़ा झटका लगा है। सरकार में हड़कंप  मच गया है, ऐसा माहौल तैयार किया जा रहा है। निर्दलीय व छोटे दलों की मदद से ही छठी सीट जीती जाए, ऐसी योजना जिस तरह से महाविकास आघाड़ी की थी, उसी तरह भारतीय जनता पार्टी की भी थी। राजनीति में ऐसा होता ही रहा है। चार-पांच निर्दलीय व वसई-विरार की बहुजन विकास आघाड़ीवालों का गणित भाजपा के पक्ष में गया और उनका उम्मीदवार मामूली अंतर से जीत गया। अर्थात जो जीता वही सिकंदर । इस नजरिए से सिकंदरों का उत्सव मनाया जा रहा है, मानो कोई बहुत बड़ा चमत्कार कर दिया है। इस तरह से धूप-अंगारे घुमाए जा रहे हैं। महाविकास आघाड़ी का उम्मीदवार नहीं जीता व फडणवीस का उम्मीदवार जीत गया, इससे राज्य में महाप्रलय तो नहीं आया न? सूर्य पश्चिम में तो नहीं निकला न? चींटी ने सुमेर पर्वत तो नहीं निगल लिया न? श्रीमान आप मतों का जुगाड़ करके जीते, इतना ही इस परिणाम का महत्व है। इस जुगाड़बाजी के गणित में महाविकास आघाड़ी को असफलता मिली। इससे दुनिया तो डूब नहीं गई न? एक साधारण विषय समझ लेना चाहिए। महाविकास आघाड़ी के पास सत्ता स्थापित करते समय १७० विधायकों का बल था। विधानसभा अध्यक्ष को सीधे मतदान में हिस्सा लेने की अनुमति नहीं लेने के कारण यह संख्या १६९ पर आ जाती है। राज्यसभा चुनाव में महाविकास आघा़ड़ी की तरफ से १६१ विधायकों ने मतदान किया। नवाब मलिक, अनिल देशमुख और जिनके वोट ‘रद्द’ कराए गए, उन सुहास कांदे को ले लिया जाए तो आंकड़ा १६४ हो जाता है। शिवसेना के एक विधायक रमेश लटके का निधन हो गया है। पंढरपुर की एक सीट राष्ट्रवादी ने गवां दी है। इन सबका हिसाब किया जाए तो आज विधायकों की संख्या १६६ जितनी है। मतलब विश्वास मत प्रस्ताव से संख्या ३ से ही कम है। इन तीन मतों में से निर्दलियों के २ वोट विश्वासमत प्रस्ताव के समय महाविकास आघाड़ी के समय नहीं थे इसलिए छठी सीट की जीत से महाराष्ट्र में चींटी ने मेरू पर्वत निगल लिया, ऐसी जो आवाज लगाई जा रही है, उसमें दम नहीं है। शिवसेना के सुहास कांदे का वोट रद्द कर दिया गया। ये गड़बड़ ही है लेकिन उसी तरह का आक्षेप सुधीर मुनगंटीवार के मतदान प्रक्रिया पर लिया गया था। चुनाव आयोग ने उसे नजरअंदाज कर दिया, इसे हमारे चुनाव आयोग का ‘स्वतंत्र’ व ‘निष्पक्ष’ बर्ताव माना जाए क्या? सच तो यह है कि चुनाव निर्णय अधिकारियों ने मतदान प्रक्रिया के तमाम आक्षेपों को निरस्त कर दिया। यह उनका अधिकार होने के बावजूद उन अधिकारों पर दिल्ली से अतिक्रमण किया गया। विधान मंडल के किन चेंबर्स से दिल्ली में हॉटलाइन शुरू थी व उसके आदेश पर क्या कराया गया, इसका विस्फोट हुआ तो देश के लोकतंत्र और चुनावी प्रक्रिया का मुखौटा दुनिया के सामने टूटकर गिर जाएगा। राज्यसभा चुनाव की प्रक्रिया लोकतांत्रित व जटिल है, यह सत्य होगा फिर भी शिवसेना-कांग्रेस व राष्ट्रवादी कांग्रेस इन तीनों प्रमुख दलों के वोट पक्के रहे इसलिए इस छठी सीट के जरिए कोई सयाने राज्य की सरकार के अस्थिर होने के सपने देखते होंगे तो वे मूर्खों के नंदनवन में घूम रहे हैं। महाविकास आघाड़ी की सरकार मजबूत है और मजबूत रहेगी। छठी सीट पर जीत के लिए फडणवीस की चतुराई और उनका सूक्ष्म प्रबंधन काम आया, यह सत्य भी होगा। उन्होंने जिस तरह से वोटों की योजना बनाई, इससे दूसरे चक्र में छठी उम्मीदवार के वोटों की संख्या बढ़ गई। यह सच होगा तब भी इसमें राजनीतिक भाग्य का ही महत्व है। पहली पसंद के ३३ वोट शिवसेना के उम्मीदवार संजय पवार को तो २७ वोट धनंजय महाडिक को मिले। फिर भी पवार हार गए। ऐसा गणित अन्य राज्यों में भी लगाया गया। हरियाणा में भी महाराष्ट्र की तरह खेल होने से कांग्रेस के अजय माकन ‘पाव’ वोट से हार गए। उनकी पराजय भी संदिग्ध है। माकन को तो पहले विजयी घोषित कर दिया गया था। राज्यसभा का मतदान राजनीतिक दलों के लिए खुले मतदान पद्धति से होता है। घोड़ाबाजार न हो इसलिए यह तरीका अमल में लाया गया। फिर भी सौदेबाजी होनी है तो होती ही है। अब राज्य में विधान परिषद के चुनाव होंगे और वह मतदान गुप्त पद्धति से होने के कारण कई लोगों की आशा, आकांक्षाओं के नए अंकुर निकल आए हैं। ऐसे चुनावों में ‘विधायक’ के तौर पर लोगों को इकट्ठा करना, उन्हें संभालना, बरकरार रखना, यह लोकतांत्रिक पद्धति में दिव्य होकर रह गया है। जिसके हाथ में खरगोश, वही पारखी है, यह ऐसा ही प्रकार है। केंद्रीय  जांच एजेंसियों का उपयोग इस तरह के चुनाव जीतने के लिए किए जाएं, यह लोकतंत्र के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं। राज्यसभा की छठी सीट भाजपा ने जीतकर दिखाई, इसके लिए उनका अभिनंदन! परंतु इस वजह से आसमान टूटा क्या? चींटी ने मेरू पर्वत निगल लिया क्या? नहीं-नहीं, ऐसा बिल्कुल भी नहीं हुआ!

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