मुख्यपृष्ठसंपादकीयसंपादकीय : दुकान बंद करनी है क्या?

संपादकीय : दुकान बंद करनी है क्या?

मुख्यमंत्री शिंदे यानी क्या अजीब आदमी हैं, ये अब महाराष्ट्र को पता चलने लगा है। महाराष्ट्र को समझ में आने लगा है फिर भी भाजपा को पलटने में समय लगेगा, यह बिल्कुल सही है। वैसे इन मुख्यमंत्री ने महाराष्ट्र का दौरा किया और अपने समर्थक विधायकों के क्षेत्र में वे तुतारी फूंक आए। मुख्यमंत्री के इस दौरे के कुछ बयान मजेदार हैं। उनके मुख से क्रांति और विद्रोह जैसे शब्द निकलने लगे हैं। संभाजीनगर में मुख्यमंत्री ने कहा, ‘ईडी से डरकर कोई हमारे पास न आए।’ मुख्यमंत्री ने स्पष्ट ही कहा, ‘राज्य में हमने नई सरकार बनाई है। इतने विधायक, इतने सांसद हमारे पास आए। उनमें से कोई भी ईडी या अन्य जांच एजेंसियों की कार्रवाई के डर से हमारे पास नहीं आया। मेरी विनती है कि ईडी की कार्रवाई से डरकर कोई हमारे पास न आए। उसी तरह भाजपा के पास भी न जाए।’ मुख्यमंत्री को ४० विधायकों का समर्थन है। मुख्यमंत्री के इस बयान को समर्थक विधायकों ने मन पर लिया तो शिंदेशाही सही अर्थों में एक वास्तविक आपदा होगी। कुछ ही पलों में उनका तंबू खाली हो जाएगा। क्योंकि ‘गांव का बच्चा-बच्चा जानता है’ कि शिंदे समूह के आधे लोग ईडी से घबराकर ही विश्वासघात के रास्ते से गए हैं। खुद शिंदे की यही कहानी है। शिंदे के सचिव और अन्य मित्र मंडली की नब्ज ईडी द्वारा दबाए जाने के बाद उन्होंने यह विद्रोह और क्रांति की है, यही सत्य है। खुद मुख्यमंत्री यानी ४० विधायकों के सेनापति ही ईडी के विरुद्ध लड़े बिना शरणागत हो गए और दिल्लीश्वर के अधीन हो गए। शिंदे ने संभाजीनगर में कहा, ‘राज्य में हमने नई सरकार बनाई है।’ शिंदे किस सरकार के बारे में बोल रहे हैं? राज्य में शिंदे-फडणवीस ने केवल शपथ ली है। उसे एक महीना बीत गया है, फिर भी सरकार का पालना हिला नहीं है। शिंदे और फडणवीस की जोड़ी यानी सरकार, ऐसा किसी को लग रहा है तो वह सही में विचित्र आदमी है। ‘न घर का न घाट का’ ऐसी इन लोगों की अवस्था हो गई है। शिंदे गुट के लिए वर्तमान समय कितना मुश्किल है, यह सर्वोच्च न्यायालय के  फैसले के बाद स्पष्ट होगा। ईडी के डर से ही लोग इधर-उधर भागने लगे और उसी डर के मारे वे शिंदे के जहाज में चढ़ गए। वो जहाज भी अब भटक गया है। उनके विचारों को दिशा नहीं है। कृति और कर्तव्य में सामंजस्य नहीं है। शिवसेना को खत्म करने की राष्ट्रवादी की साजिश को हमने नाकाम कर दिया, ऐसी भाषा शिंदे ने सिल्लोड की सभा में कही। सिल्लोड की भूमि उन्होंने क्रांति की चिंगारी डालने के लिए चुनी लेकिन सिल्लोड के समर्थक विधायक अब्दुल सत्तार पर विश्वास करनेवाले बारह के भाव में जाते हैं। सत्तार ने बारह की कीमत लगाने के लिए इस समय मुख्यमंत्री को ही चुना है, जो प्रशंसनीय है। शिंदे ने राष्ट्रवादी की साजिश को नाकाम किया, यह बयान तर्कसंगत नहीं है। शिवसेना, राष्ट्रवादी और कांग्रेस की महाविकास आघाड़ी सरकार में मुख्यमंत्री पद शिंदे को मिला होता तो राष्ट्रवादी का गुणगान गाते हुए ये महाशय दिखाई देते। शिंदे को येन-केन-प्रकारेण से मुख्यमंत्री पद हड़पना था। भाजपा-ईडी युति ने उन्हें इस काम के लिए ‘समृद्धि का मार्ग’ दिखा दिया। इसलिए राष्ट्रवादी की साजिश को नाकाम करना वगैरह बातें बकवास हैं। ‘पिछले ढाई वर्ष में बालासाहेब के विचारों की अवहेलना हुई और उनके विरोध में भूमिका अपनाई गई।’ ऐसा ‘दिव्य दाहक’ विचार भी शिंदे ने व्यक्त किया। बालासाहेब के किस विचार की अवहेलना हुई और अब शिंदे और उनका गुट बालासाहेब के कौन-से विचार को आगे ले जा रहा है? हिंदुत्व तो महत्वपूर्ण विचार है ही, लेकिन महाराष्ट्र का स्वाभिमान और मराठी अस्मिता की रक्षा के लिए शिवसेना की स्थापना बालासाहेब ने की। उसी मराठी अस्मिता और महाराष्ट्र के स्वाभिमान का अपमान राज्यपाल महोदय ने किया। लेकिन शिंदे ने उस पर चुप रहना ही पसंद किया। महाराष्ट्र का अपमान सहन करो और शांत रहो, यह विचार तो बालासाहेब का कभी नहीं था। महाराष्ट्र के स्वाभिमान पर कोई नाखून लगा रहा है तो उबलकर उठो और अपमान करनेवाले का गला घोंट दो, यही बालासाहेब का विचार है और मुख्यमंत्री पद की कुर्सी पर बैठे शिंदे ने उन विचारों की अवहेलना की। ये सही या झूठा। शिवसेना खत्म करने की राष्ट्रवादी की साजिश को उन्होंने नाकाम कर दिया। मगर महाराष्ट्र की बदनामी, मराठी माणुस को खत्म करने, महाराष्ट्र में हिंदू समाज में फूट डालने के राज्यपाल की साजिश को शिंदे क्यों नाकाम नहीं कर पाए? मैंने इंटरव्यू दिया तो भूकंप  आ जाएगा, ऐसा तंज उन्होंने कसा। लेकिन उनको किसने रोका है? धर्मवीर के वंशज केदार दिघे ने इस पर शिंदे को अच्छी तरह से आड़े हाथों लिया है। दरअसल, भाजपा के मन में बहुत लंबे समय से शिवसेना को समाप्त करने की योजना है। लेकिन उसे मौका नहीं मिल रहा था। आखिर में शिंदे और उनके समर्थकों पर ईडी वगैरह की तलवार लगाकर उन्होंने शिवसेना को खत्म करने की साजिश रची। लेकिन अब यह दांव भी उल्टा पड़ता दिखाई दे रहा है। शिवसेना नई उड़ान ले रही है। वह तेजी से आकाश में मंडराएगी और शिवसेना को समाप्त करने की इच्छा रखनेवालों के उपले सोनापुर में बनाए जाएंगे और इसमें हमारे मन में कोई संदेह नहीं है। ईडी से डरकर हमारे पास या भाजपा के पास न आएं, ऐसा कहना यानी दोनों की दुकान हमेशा के लिए बंद करने जैसी है। क्योंकि चोरी के सामान से शुरू की गई दुकान ज्यादा समय तक नहीं चलती!

अन्य समाचार