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संपादकीय : बेरोजगारी का विस्फोट!

देश में बेरोजगारी की समस्या दिन-ब-दिन उग्र रूप धारण कर रही है। हाथ को काम मिले इसलिए देश का युवा वर्ग दर-दर भटक रहा है, लेकिन सरकार अथवा निजी किसी भी क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर उपलब्ध ही नहीं होने से बेरोजगारों की इस फौज के निराशाग्रस्त होने की नौबत आ गई है। बेरोजगारी के इस बढ़ते संकट और रोजगार की तलाश कर रहे युवकों का आक्रोश सरकार के बहरे हो चुके कानों तक पहुंचेगा क्या? देश की बेरोजगारी के संदर्भ में भयावह स्थिति पेश करनेवाली ताजा रिपोर्ट ‘सीएमआईई’ अर्थात सेंटर फॉर मॉनिटरिंग ऑफ इंडियन इकोनॉमी नामक संस्था ने सार्वजनिक किया है। इस संस्था द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार अगस्त महीने में देश में बेरोजगारी की दर नई ऊंचाई को छूते हुए ८.३ फीसदी पर पहुंच गई है। एक ही महीने की तुलना में जुलाई की अपेक्षा अगस्त महीने में देश में रोजगार करीब २० लाख तक घट गया और ३९.४६ पर खिसक गया। जुलाई महीने में बेरोजगारी की दर ६.८ फीसदी थी और ३९.७ करोड़ लोगों के लिए रोजगार उपलब्ध था। देश की जनसंख्या बढ़ते हुए रोजगार की उपलब्धता का प्रमाण भी बढ़ते रहना चाहिए। हालांकि ऐसा न होते हुए हर महीने में यदि रोजगार के अवसर करीब २० लाख तक कम होते रहे, तो पढ़-लिखकर बाहर आनेवाले शिक्षित युवा कहां जाएंगे? फिर ये संकट केवल महाविद्यालयों एवं विद्यापीठों से डिग्रियों का बंडल लेकर बाहर निकले हुए युवाओं तक ही सीमित नहीं है। युवावर्ग अल्पशिक्षित हो या उच्च शिक्षित, शहरी हो या ग्रामीण, उनके हाथों में एक तो काम ही नहीं मिल रहा अथवा काम मिला भी तो वह उनकी योग्यता के अनुरूप नहीं होता। समझौते के तौर पर अथवा कहीं भी नौकरी में लगना है इसीलिए और परिवार पर अपना बोझ कम करने के लिए मामूली वेतन पर जो मिले, वो काम स्वीकार करता है। लाखों युवाओं के हाथों में तो समझौता व गुजारे के लायक भी काम नहीं मिलता, ये देश में आज की भयानक वास्तविकता है। इससे भागने का कोई मतलब नहीं। क्योंकि कोई भी बीमारी छिपाने से बढ़ती जाती है। अपनी सरकार की भी यही अवस्था हो गई है। बेरोजगारी की दर का लगातार बढ़ता हुआ ग्राफ बड़ी समस्या है और देश आज बेरोजगारी के इस बढ़ते संकट का सामना कर रहा है, ये अगर सरकार को स्वीकार ही नहीं करना है, ऐसा तय कर लिया है तो दिन-प्रतिदिन विकराल रूप धारण कर रही बेरोजगारी की समस्या का सरकार उपाय भी क्या ढूंढ़ेगी? देश में बढ़ती बेरोजगारी की भयावह स्थिति की जनता को खुले दिल से जानकारी देने के बजाय सरकार देश में सब कुछ ऑलवेल है और अब केवल सोने की धूल ही मात्र निकलना बाकी है, ऐसी स्वप्ननगरी की सैर देशवासियों को करा रही है। ‘सीएमआईई’ की रिपोर्ट के अनुसार देश में शहरी बेरोजगारी की दर ८.२ फीसदी से ९.५७ फीसदी बढ़ गई है, तो वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी की दर भी ६.१४ फीसदी से बढ़कर ७.६८ फीसदी पर जा पहुंची है। इसका मतलब साफ है, शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में बेरोजगारी का घोड़ा बेलगाम दौड़ रहा है। बेरोजगारी के इस अनिष्ट को दूर करने के लिए कोई भी ठोस उपाय होता दिखाई ही न देने से इस बेलगाम घोड़े पर काबू कर बेरोजगारी पर लगाम कौन और कैसे लगाए? देश में बेरोजगारों की बढ़ती संख्या विस्फोटक मोड़ पर पहुंच गई है, यह ‘सीएमआईई’ द्वारा सार्वजनिक की गई ताजा रिपोर्ट से साबित हो गया है। हालांकि केंद्र सरकार सिर्फ बेरोजगारी की समस्या पर समाधान तलाशने की बजाय अर्थव्यवस्था का पहिया देखो कैसे तेजी से दौड़ रहा है, ऐसी आभासी तस्वीर रंगने में मशगूल है। जीएसटी का संकलन कैसे नई-नई ऊंचाइयां छू रहा है और देश के औद्योगिक उत्पादन में कैसे तेजी से वृद्धि हो रही है, इसका ढोल पीटनेवाले आंकड़ों को सार्वजनिक करनेवाली सरकार बेरोजगारी के भयावह संकट के विषय में कुछ भी क्यों बोल नहीं रही है? जीएसटी की कमाई और औद्योगिक विकास बढ़ रहा होगा तो देश में बेरोजगारी कम होने की बजाय क्यों बढ़ रही है, इसका जवाब सरकार के पास है क्या?

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