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संपादकीय: वास्तव और विसंगति

हिंदुस्थान की तरफ कोई टेढ़ी नजर से देखेगा तो उसे करारा जवाब दिया जाएगा, ऐसी चेतावनी रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने दी है। वहीं चीनी सेना सीमा से हटने को तैयार नहीं है। इसलिए भारत-चीन सीमा पर तनाव बढ़ सकता है, ऐसा चीफ जनरल मनोज पांडेय ने माना है। ये देश के रक्षा मंत्री और सेनाप्रमुख द्वारा एक ही समय पर दिए गए बयान हैं। ये आपस में विरोधाभास है। एक तरफ रक्षा मंत्री देश के साथ छेड़छाड़ करनेवालों को सबक सिखाने की भाषा बोल रहे हैं तो वहीं सीमा पर सैन्य संख्या चीन कम नहीं कर रहा है और निर्माण कार्य करना भी चीन‌ नहीं रोक रहा है, ऐसी खतरे की चिंता आर्मी चीफ ने जताई है।‌ दूसरी ओर पाकिस्तानी सीमा पर भी घुसपैठ बढ़ गई है। सीमा सुरक्षा बल के महानिदेशक पंकज कुमार सिंह ने यह चेतावनी दी है। यानी चीन की सीमा हो या पाकिस्तानी सीमा हो, दोनों ही जगहों पर स्थिति ‘शांत लेकिन तनावपूर्ण’ है। सेनाप्रमुख और सीमा सुरक्षा बल के महानिदेशक दोनों द्वारा दी गई चेतावनी का अर्थ वही है। चीन और पाकिस्तान दोनों की भारत विरोधी खुराफात हमेशा की है, जो हमेशा शुरू रहती है। लिहाजा अब भी जारी है तो इसमें कुछ भी अप्रत्याशित नहीं है। सवाल सिर्फ इतना ही है कि सर्जिकल स्ट्राइक का शंखनाद करनेवाले और खुद को ‘शक्तिमान’ वगैरह कहलवानेवाले सत्ता में हैं फिर भी ये क्यों हो रहा है? कश्मीर का मसला हो या चीन के साथ सीमा विवाद, पाकिस्तान से संबंध हो या बांग्लादेश से… हर बातों का ठीकरा पं. नेहरू पर, पहले की कांग्रेस सरकार पर फोड़ने का एक सूत्रीय कार्यक्रम पिछले सात-आठ वर्षों से चल रहा है; लेकिन अब तो पिछले आठ वर्षों से आपकी ही एकछत्र सरकार केंद्र में है न? फिर भी चीनी ड्रैगन आपके नियंत्रण में क्यों नहीं आ पाया? पाकिस्तान की सीमा पर घुसपैठ, पाक समर्थित आतंकवाद पर अंकुश क्यों नहीं लगाया जा सका? हमारी सेना ने सर्जिकल स्ट्राइक किया, चीनियों को गलवान घाटी की मुठभेड़ में ‘न भूतो’ पाठ पढ़ाया, कभी नहीं हुआ वैसे चीनी बंदर बेहद डर गए, धारा ३७० हटाई गई, ये बातें तो हैं ही। लेकिन चीन और पाकिस्तान की सीमा पर खुराफात जारी है, उसका क्या? ‘जैसे को तैसा’ जवाब देने की गर्जना की जा रही है फिर भी उसका कितना असर चीन और पाकिस्तान पर पड़ा है, यह सवाल ही है। चीन तो हमारा बेहद शक्तिशाली शत्रु है। बीच में उसने सेना पीछे लेने की मंजूरी देते हुए कुछ कदम पीछे हटाए थे। लेकिन चीनी सैनिकों की संख्या कम नहीं हुई है, ऐसा आज खुद हमारे सेनाप्रमुख कह रहे हैं तो चीन के खिलाफ कठोर आदि सरकारी नीतियों का असल में क्या फायदा हुआ, यह सवाल तो उठता ही है। एक तरफ कमांडर स्तर की बैठकों का दौर जारी रखना और दूसरी तरफ हिंदुस्थानी सीमा पर सेना का जमावड़ा कायम रखना, निर्माण कार्य न रोकना, यह चीन की चालबाजी हमेशा की है। लद्दाख के जियानान डाबन क्षेत्र में चीनी और हिंदुस्थानी सेना को योजनाबद्ध तरीके से पीछे हटाया जा रहा है, यह हिंदुस्थान की रणनीति की जीत वगैरह है, ऐसे ढोल दो महीने पहले ही सत्ता पक्ष की ओर से पीटा गया था। फिर अब चीनी सैनिक सीमा से हट ही नहीं रहे हैं, ऐसा खुद सेनाप्रमुख को कहने की नौबत क्यों आई? क्योंकि सरकार चाहे जितना भी कहे फिर भी सीमा पर चीनी सेना पीछे नहीं हटी है यही ‘वास्तविकता’ है। सवाल इतना ही है कि सेनाप्रमुख द्वारा कहा गया ‘सत्य’ और उसी दौरान देश के रक्षा मंत्री द्वारा दी गई ‘जैसे को तैसे’ जवाब देने की चेतावनी को सुसंगत वैâसे माना जाए? अगर आपकी चेतावनी जोरदार, दमदार है तो समझौते के तहत चीन को सीमा से अपने सैनिकों को पीछे हटा लेना चाहिए था। लेकिन वैसा नहीं हुआ। चीन का सीमा पर ‘वास्तव’ और सरकार की कार्रवाई की चेतावनी तथा नगाड़े आज तक कभी सुसंगत नहीं हुए, उसी का यह नतीजा है। कबूली का ‘वास्तव’ और चेतावनी की ‘विसंगति’ देश की सुरक्षा की दृष्टि से हमेशा घातक साबित हुई है। सीमा पर हमारे सैनिक दृढ़ता से लड़ ही रहे हैं, वही दृढ़ता सरकार की नीति में भी होनी चाहिए। अभी भी समय बीता नहीं है!

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