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संपादकीय : फडणवीस, ध्यान रखना!

नींद में सोये हुए लोगों को जगाया जा सकता है, लेकिन सोने का ढोंग करनेवालों को वैâसे जगाया जाए? यह सवाल होता है। महाराष्ट्र में यही भाजपा के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को लेकर सवाल खड़ा हुआ है। एक अपने मुख्यमंत्री हैं, जो सोते नहीं। वहीं उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस हैं, जो सदैव अर्धग्लानि अवस्था में रहते हैं। ‘मैं दोबारा आऊंगा, यह कहा था। कहे अनुसार वैसा हुआ भी था लेकिन कुछ लोगों द्वारा गद्दारी करने के बावजूद भी मैं आया।’ ऐसा कहते हुए श्री फडणवीस ने पुन: फिर से, पुन: फिर से कहा है। बीते साल भर में उनका ‘पुन: फिर से’ प्रकरण इतनी बार हुआ है कि जनता के शब्दकोष से ‘पुन:’ शब्द हट जाने की नौबत आ गई है। फडणवीस मुख्यमंत्री के रूप में दोबारा आनेवाले थे, लेकिन उनके हाईकमान ने उन्हें ‘उप’ के रूप में दोबारा भेजा। आज यही ‘उप’ एक गैर अनुभवी, बेईमान, भ्रष्ट व्यक्ति के मातहत काम कर रहे हैं। मैं आनेवाला ही था, लेकिन कुछ लोगों ने बेईमानी की जिस वजह से मैं बीच में ही लटक गया, लेकिन इसके बावजूद आया हूं। उनके इस बयान में ईमानदारी का जोश नहीं है। संपूर्ण महाराष्ट्र जानता है कि वर्ष २०१९ में बेईमानी किसने की, पूरे महाराष्ट्र को इसकी जानकारी है। फडणवीस और उनकी पार्टी भले अर्धचेतन अवस्था में हो लेकिन महाराष्ट्र की जनता सोई नहीं है। बेईमानी की है तो भाजपा के वर्तमान दिल्लीश्वरों ने। सत्ता का समान बंटवारा करने का वचन देकर वे मुकर गए और फडणवीस इसके गवाह हैं। यह बेईमानी यदि उस वक्त नहीं हुई होती तो महाराष्ट्र में फडणवीस सम्मान के साथ पुन: दोबारा सत्ता में आए होते और फौजदार से जमादार भी नहीं बनते इस सत्य से ‘प्यारे’ फडणवीस इनकार नहीं कर सकते। २०१९ की इसी बेईमानी के चलते शिवसेना-भाजपा का गठबंधन टूट गया। वर्ष २०१४ में ही भाजपा ने इस बेईमानी का बीज बोया था, इसका खुलासा श्री एकनाथ खड़से ने किया है। इसलिए जिन कुछ बेईमान लोगों की वजह से फडणवीस २०१९ में नहीं आ सके, ये सभी बेईमान उनके आसपास ही हैं। श्री फडणवीस कहते हैं कि ‘देखिए, मैं दोबारा आया।’ यह सच नहीं है। वह आए नहीं हैं, बल्कि दिल्ली ने उनका राजनैतिक श्राद्ध करने का प्रयोग किया। फडणवीस जैसे अनुभवी, कर्तव्यशील नेता को ‘बिना तनख्वाह, उप अधिकारी’ बना दिया। इसीलिए महाराष्ट्र में सभी मामलों में और क्षेत्र में चिंता की स्थिति का निर्माण हो गया है। फडणवीस के उदास मूड के कारण राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति गंभीर हो गई है। युवतियों और महिलाओं पर दिन दहाड़े रास्ते पर हमले हो रहे हैं। हत्याओं का सिलसिला जारी है। इन सभी पर बोलने की बजाय गृहमंत्री का ‘पुन:, पुन:, पुन:’ का झुनझुना बजाते रहना सही नहीं है। फडणवीस ‘उप’ के रूप में दोबारा आए। यह ‘उप’ पद भी संपूर्ण नहीं है। अब दिल्लीश्वरों ने अजीत पवार को भी ‘उप’ बनाकर फडणवीस की स्थिति विकट कर दी है। ‘मैं पुन:, पुन:, पुन: ‘उप उप उप उप’ के रूप में आया’ यह नारा अजीत पवार को शोभा देता है। वहीं जिस पवार को फडणवीस चक्की पीसने के लिए भेजना चाहते थे, उन्हीं को बगल में बिठाकर क्या वह सत्यनारायण की कथा सुना रहे हैं? अजीत पवार और मुख्यमंत्री शिंदे के बीच संघर्ष शुरू है। कमजोर, अस्थिर मुख्यमंत्री के हाथों के नीचे मैं काम नहीं करूंगा, ऐसी भूमिका अजीत पवार २०१९ से ले रहे हैं। शिंदे-पवार के विवाद के चलते कई जिलों में अभी तक पालक मंत्री नहीं मिल सके हैं, मंत्रिमंडल विस्तार के लिए कई लोगों द्वारा सिलवाए गए कोट व जैकेट भी व्यर्थ हो गए हैं और फडणवीस इस पर कुछ नहीं कर सके। क्योंकि दोनों के बीच हो रहे झगड़े का मजा देखना, ऐसे लगता है कि उन्होंने मुर्गों की लड़ाई में बाड़ पर बैठने की ‘उप’ रणनीति अपनाई है। भ्रष्टाचार के, महिलाओं पर अत्याचार के आरोपी लोग फडणवीस के मंत्रिमंडल में उनके साथी हैं और इस महान ‘उप’ महोदय को गटर की गंगा को इत्र की नदी कहना पड़ रहा है। आपका इसी तरह पुन:-पुन: आना, दुश्मन के नसीब में भी ऐसा नहीं होना चाहिए। महाराष्ट्र की लूट शुरू है, स्थानीय स्वराज्य संस्थाओं का चुनाव नहीं हो रहा है, स्थानीय स्वराज्य संस्थाओं का चुनाव नहीं करा रहे हैं, उच्च न्यायालय का निर्देश पालने के लिए विधानसभा अध्यक्ष तैयार नहीं हैं, पुलिस का इस्तेमाल गुंडों की रक्षा के लिए हो रहा है, जगह-जगह लोगों की जान जा रही है। ‘पुन: पुन: पुन:’ ‘उप-उप-उप’ के रूप में आए हुए लोगों की नजर के सामने यह हो रहा है। देवेंद्र फडणवीस पहले एक संवेदनशील व्यक्ति थे, लेकिन ‘उप’ होने की विफलता से उनकी संवेदनशीलता समाप्त हो गई और वह अहंकार के ध्रुव बन गए। ‘मुख्य’ से ‘उप’ बनाकर कम आंके जाने के कारण वह बेचैन हो गए हैं। इसलिए उनकी मानसिक स्थिति समझने की जरूरत है। अक्सर अर्धचेतन अवस्था में होने के कारण उन्हें रामप्रहरी का सत्य नहीं समझ आता है व भांग का नशा दोपहर में कुछ ज्यादा चढ़ता है, यही लक्षण उनमें नजर आता है। ‘उप’ का नशा यह स्वदेशी बनावट का है। किसी समय ‘मुख्य’ रहनेवाले को आज ‘देशी’ के रूप में स्वीकार करने का नतीजा सारा महाराष्ट्र देख रहा है। एक भला आदमी पागल हो रहा है। फडणवीस, ध्यान रखना!

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