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संपादकीय : अनशन समाप्त, दुविधा कायम!

सरकार को २ जनवरी तक मोहलत देकर मनोज जरांगे-पाटील ने अनशन वापस ले लिया। जरांगे का स्वास्थ्य खराब होता जा रहा था। उनके स्वास्थ्य के प्रति सभी लोग परेशान थे, लेकिन जरांगे ने अपने हठ के चलते अनशन जारी रखा। अब सर्वदलीय नेताओं की विनती के चलते उन्होंने अनशन वापस ले लिया। यह सच है कि उन्होंने अनशन वापस ले लिया लेकिन ‘दुविधा’ कायम है। बुधवार को सर्वदलीय बैठक के बाद भी कोई समाधान नहीं निकला। लेकिन सरकार का एक शिष्टमंडल अनशन स्थल पर जाकर मनोज जरांगे-पाटील से मिला और उनसे अनशन तोड़ने की विनती की। मराठा आंदोलन की वजह से राज्य लगभग ठप ही हो गया था। इस घटनाक्रम के चलते भी राज्य के हाशिए पर छोड़कर गृहमंत्री का प्रभार संभाल रहे उपमुख्यमंत्री श्री फडणवीस केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक के लिए दिल्ली चले गए। महाराष्ट्र की अराजकता से ज्यादा उन्हें चुनाव समिति की बैठक महत्वपूर्ण लगती है यह दुखद है। जरांगे का अनशन साधारण नहीं। उसकी वजह से राज्य में आगजनी, तोड़फोड़ हुई। विधायकों के घर जलाए गए। राजकीय नेताओं को गांव में घुसने से रोक दिया गया और उनसे सवाल-जवाब किए गए। कई लोगों ने आत्महत्या की। राज्य के कई हिस्सों में इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गर्इं। यह एक भयानक तस्वीर है। जरांगे-पाटील ने कहा, ‘कोई भी राजनीतिक दल हमारा नहीं है। हमारा आंदोलन शांतिपूर्वक चल रहा था, लेकिन सरकार माहौल बिगाड़ रही है।’ जरांगे-पाटील ने अब सरकार के आश्वासनों पर अनशन तोड़ दिया लेकिन ये आश्वासन सिर्फ हवाई न साबित हों। जरांगे ने चेतावनी भी दी कि यदि सरकार अपने वचनों पर कायम नहीं रही तो हम मुंबई का नाक बंद कर देंगे। मुंबई की नाक बंद करना तो ठीक है। लेकिन मराठा आरक्षण के लिए जरांगे को अब दिल्ली की ओर कूच करना चाहिए। मराठा आरक्षण के मुद्दे की चाबी प्रधानमंत्री मोदी की जेब में है और मोदी इन मुद्दों को गंभीरतापूर्वक देखने के लिए तैयार नहीं हैं। जरांगे-पाटील ने अब अनशन वापस ले लिया है। लेकिन इस विषय को लेकर महाराष्ट्र के मन में कुछ सवाल उठ खड़े हुए हैं। राज्य की अवैध सरकार ने जिस तरह से इस सवाल को लंबा खींच दिया उससे यह सवाल उठ खड़े हुए हैं।
१) शिंदे के नेतृत्व वाली ‘घाती’ सरकार हमेशा कहती रही है कि हमारे पीछे एक महाशक्ति है। महाराष्ट्र जल रहा है, ऐसे में क्या महाशक्ति सो रही है?
२) देवेंद्र फडणवीस चुनाव समिति की बैठक के लिए दिल्ली गए। नरेंद्र मोदी और अमित शाह वहां थे। क्या फडणवीस ने प्रधानमंत्री के साथ जरांगे-पाटील का अनशन और महाराष्ट्र की स्थिति पर चर्चा की?
३) क्या भारतीय जनता पार्टी महाराष्ट्र की सामाजिक समरसता में आग लगाना चाहती है? क्या वे मराठा समाज और ‘ओबीसी’ के बीच लड़ाई भड़काना चाहते हैं?
४) सर्वदलीय बैठक के बाद फडणवीस ने कहा, ‘मुख्यमंत्री पर विश्वास रखो। सब कुछ ठीक हो जाएगा।’ इसका मतलब क्या है? मराठा आरक्षण से फडणवीस खुद को दूर क्यों रख रहे हैं?
५) मनोज जरांगे-पाटील एक नेक इंसान हैं और उनके खून में कोई स्वार्थ नहीं है। इसलिए दबाव और खोखे से उन्हें नहीं खरीदा जा सकता। क्या यही सरकार की समस्या है?
६) मराठा आरक्षण के मुद्दे पर लोकसभा का विशेष सत्र बुलाकर संविधान में संशोधन करना जरूरी है। राज्य के मुख्यमंत्री ने विशेष सत्र बुलाने की मांग क्यों नहीं की? और क्या यह अब भी विशेष सत्र बुलाएंगे?
७) मनोज जरांगे-पाटील को दिल्ली ले जाकर प्रधानमंत्री से चर्चा क्यों नहीं कराई गई?
८) क्या गुजरात के ‘पटेल’ आंदोलन की तरह ही महाराष्ट्र के ‘मराठा’ आंदोलन को कुचलने की योजना है?
९) किसानों का आंदोलन दिल्ली की सीमा पर साल भर चला, क्या इसी तरह मराठाओं का आंदोलन लंबा खींचने में सरकार की कोई राजनीति है?
१०) सरकार को जरांगे-पाटील के नेतृत्व को खत्म कर उनका अण्णा हजारे करना है क्या?
इन सवालों का जवाब महाराष्ट्र को चाहिए। हल्के-फुल्के बैठक और चर्चा से मराठा आरक्षण का विषय हल नहीं होगा। मराठा आरक्षण की समस्या महाराष्ट्र के गले में लगी फांस है। महाराष्ट्र की राजनीति में दखल देनेवाले भाजपा के दिल्लीश्वर अब इससे किनारा कर रहे हैं। कानूनी पहलुओं को पूर्ण कर न्यायालय में टिकने लायक आरक्षण के लिए एकत्रित प्रयास करने का फैसला सर्वदलीय नेताओं की बैठक में लिया गया। लेकिन ऐसे पैâसले की ‘दहाड़’ से कुछ भी नहीं होगा। २ जनवरी के बाद मराठाओं को सीधे तौर पर कुणबी प्रमाण पत्र दिए जाने की जरांगे-पाटील की यह मांग अब मान्य हुई है। कुणबी प्रमाण पत्र मतलब आरक्षण नहीं है। इसके लिए संसद में संविधान में संशोधन करना जरूरी है। इस दौरान सत्ताधारी दल के विधायकों ने नाटक किया। मंत्रालय में ताला लगाया, आंदोलन किया लेकिन किसी ने भी मोदी से मराठा आरक्षण के लिए विशेष सत्र बुलाने और संविधान में संशोधन करने की मांग नहीं की। इस दौरान मुख्यमंत्री पुलिस सुरक्षा के बीच अपने आवास पर बैठे रहे। गृहमंत्री को राज्य में हो रहे दंगे से ज्यादा दिल्ली में होनेवाले चुनाव समिति की बैठक महत्वपूर्ण लगी। विधायकों की अयोग्यता पर फैसला ३१ दिसंबर तक लिया जाएगा। इसका मतलब सरकार जाएगी, यह तय है। तो फिर शिवछत्रपति की शपथ लेकर मराठाओं को आरक्षण देने का बीड़ा मुख्यमंत्री ने उठाया था वह किसके भरोसे पर? शिवछत्रपति की शपथ झूठी साबित न हो यही हम कहना चाहते हैं। जरांगे-पाटील का अनशन टूट गया, यह अच्छा ही हुआ। लेकिन मराठों को आरक्षण वैâसे मिलेगा, यह दुविधा बनी हुई है?

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